भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1895

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उनसठवाँ सर्ग

प्रहस्तके मारे जानेसे दुःखी हुए रावणका स्वयं ही युद्धके लिये पधारना, उसके साथ आये हुए मुख्य वीरोंका परिचय, रावणकी मारसे सुग्रीवका अचेत होना, लक्ष्मणका युद्धमें आना, हनुमान् और रावणमें थप्पड़ोंकी मार, रावणद्वारा नीलका मूर्च्छित होना, लक्ष्मणका शक्तिके आघातसे मूर्च्छित एवं सचेत होना तथा श्रीरामसे परास्त होकर रावणका लङ्कामें घुस जाना

वानरश्रेष्ठ नीलके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षस-सेनापति प्रहस्तके मारे जानेपर समुद्रके समान वेगशालिनी और भयानक आयुधोंसे युक्त वह राक्षसराजकी सेना भाग चली॥ १ ॥

राक्षसोंने निशाचरराज रावणके पास जाकर अग्निपुत्र नीलके हाथसे प्रहस्तके मारे जानेका समाचार सुनाया। उनकी वह बात सुनकर राक्षसराज रावणको बड़ा क्रोध हुआ॥ २ ॥

‘युद्धस्थलमें प्रहस्त मारा गया’ यह सुनते ही वह क्रोधसे तमतमा उठा; किंतु थोड़ी ही देरमें उसका चित्त उसके लिये शोकसे व्याकुल हो गया। अतः वह मुख्य-मुख्य देवताओंसे बातचीत करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षससेनाके मुख्य अधिकारियोंसे बोला—॥ ३ ॥

‘शत्रुओंको नगण्य समझकर उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। मैं जिन्हें बहुत छोटा समझता था, उन्हीं शत्रुओंने मेरे उस सेनापतिको सेवकों और हाथियोंसहित मार गिराया, जो इन्द्रकी सेनाका भी संहार करनेमें समर्थ था॥ ४ ॥

‘अब मैं शत्रुओंके संहार और अपनी विजयके लिये बिना कोऽइ विचार किये स्वयं ही उस अद्भुत युद्धके मुहानेपर जाऊँगा॥ ५ ॥

‘जैसे प्रज्वलित आग वनको जला देती है, उसी तरह आज अपने बाणसमूहोंसे वानरोंकी सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामको मैं भस्म कर डालूँगा। आज वानरोंके रक्तसे मैं इस पृथ्वीको तृप्त करूँगा’॥ ६ ॥

ऐसा कहकर वह देवराजका शत्रु रावण अग्निके समान प्रकाशमान रथपर सवार हुआ। उसके रथमें उत्तम घोड़ोंके समूह जुते हुए थे। वह अपने शरीरसे भी प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रहा था॥ ७ ॥

उसके प्रस्थान करते समय शङ्ख, भेरी और पणव आदि बाजे बजने लगे। योद्धालोग ताल ठोकने, गर्जने और सिंहनाद करने लगे। वन्दीजन पवित्र स्तुतियोंद्वारा राक्षसराज शिरोमणि रावणकी भलीभाँति समाराधना करने लगे। इस प्रकार उसने यात्रा की॥ ८ ॥