श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1943, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछाछठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णके भयसे भागे हुए वानरोंका अङ्गदद्वारा प्रोत्साहन और आवाहन, कुम्भकर्णद्वारा वानरोंका संहार, पुनः वानर-सेनाका पलायन और अङ्गदका उसे समझा-बुझाकर लौटाना
महाबली कुम्भकर्ण पर्वत-शिखरके समान ऊँचा और विशालकाय था। वह परकोटा लाँघकर बड़ी तेजीके साथ नगरसे बाहर निकला॥ १ ॥
बाहर आकर पर्वतोंको कँपाता और समुद्रको गुँजाता हुआ-सा वह उच्चस्वरसे गम्भीर नाद करने लगा। उसकी वह गर्जना बिजलीकी कड़कको भी मात कर रही थी॥
इन्द्र, यम अथवा वरुणके द्वारा भी उसका वध होना असम्भव था। उस भयानक नेत्रवाले निशाचरको आते देख सभी वानर भाग खड़े हुए॥ ३ ॥
उन सबको भागते देख राजकुमार अङ्गदने नल, नील, गवाक्ष और महाबली कुमुदको सम्बोधित करके कहा— ॥ ४ ॥
'वानर वीरो! अपने उत्तम कुलों और उन अलौकिक पराक्रमोंको भुलाकर साधारण बंदरोंकी भाँति भयभीत हो तुम कहाँ भागे जा रहे हो?॥ ५ ॥
'सौम्य स्वभाववाले बहादुरो! अच्छा होगा कि तुम लौट आओ। क्यों जान बचानेके फेरमें पड़े हो? यह राक्षस हमारे साथ युद्ध करनेकी शक्ति नहीं रखता। यह तो इसकी बड़ी भारी विभीषिका है— इसने मायासे विशाल रूप धारण करके तुम्हें डरानेके लिये व्यर्थ घटाटोप फैला रखा है॥ ६ ॥
'अपने सामने उठी हुई राक्षसोंकी इस बड़ी भारी विभीषिकाको हम अपने पराक्रमसे नष्ट कर देंगे। अतः वानरवीरो! लौट आओ'॥ ७ ॥
तब वानरोंने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण किया और जहाँ-तहाँसे एकत्र हो हाथोंमें वृक्ष लेकर वे रणभूमिकी ओर चले॥ ८ ॥
लौटनेपर वे महाबली वानर मतवाले हाथियोंकी भाँति अत्यन्त क्रोध और रोषसे भर गये और कुम्भकर्णके ऊपर ऊँचे-ऊँचे पर्वतीय-शिखरों, शिलाओं तथा खिले हुए वृक्षोंसे प्रहार करने लगे। उनकी मार खाकर भी कुम्भकर्ण विचलित नहीं होता था॥ ९-१० ॥