श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1944, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसके अङ्गोंपर गिरी हुई बहुतेरी शिलाएँ चूरचूर हो जाती थीं और वे खिले हुए वृक्ष भी उसके शरीरसे टकराते ही टूक-टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ११ ॥
उधर क्रोधसे भरा हुआ कुम्भकर्ण भी अत्यन्त सावधान हो महाबली वानरोंकी सेनाओंको उसी प्रकार रौंदने लगा, जैसे बढ़ा हुआ दावानल बड़े-बड़े जंगलोंको जलाकर भस्म कर देता है॥ १२ ॥
बहुत-से श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ हो धरतीपर सो गये। जिन्हें उठाकर उसने ऊपर फेंक दिया, वे लाल फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १३ ॥
वानर ऊँची-नीची भूमिको लाँघते हुए जोर-जोरसे भागने लगे। वे आगे-पीछे और अगल-बगलमें कहीं भी दृष्टि नहीं डालते थे। कोई समुद्रमें गिर पड़े और कोई आकाशमें ही उड़ते रह गये॥ १४ ॥
उस राक्षसने खेल-खेलमें ही जिन्हें मारा, वे वीर वानर जिस मार्गसे समुद्र पार करके लङ्कामें आये थे, उसी मार्गसे भागने लगे॥ १५ ॥
भयके मारे वानरोंके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे नीची जगह देख-देखकर भागने और छिपने लगे। कितने ही रीछ वृक्षोंपर जा चढ़े और कितनोंने पर्वतोंकी शरण ली॥ १६ ॥
कितने ही वानर और भालू समुद्रमें डूब गये। कितनोंने पर्वतोंकी गुफाओंका आश्रय लिया। कोई गिरे, कोई एक स्थानपर खड़े न रह सके, इसलिये भागे। कुछ धराशायी हो गये और कोई-कोई मुर्दोंके समान साँस रोककर पड़ गये॥ १७ ॥
उन वानरोंको भागते देख अङ्गदने इस प्रकार कहा— ‘वानरवीरो! ठहरो, लौट आओ। हम सब मिलकर युद्ध करेंगे॥ १८ ॥
‘यदि तुम भाग गये तो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके भी कहीं तुम्हें ठहरनेके लिये स्थान मिल सके, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (सुग्रीवकी आज्ञाके बिना कहीं भी जानेपर तुम जीवित नहीं बच सकोगे)। इसलिये सब लोग लौट आओ। क्यों अपने ही प्राण बचानेकी फिक्रमें पड़े हो?॥ १९ ॥
‘तुम्हारे वेग और पराक्रमको कोई रोकनेवाला नहीं है। यदि तुम हथियार डालकर भाग जाओगे तो तुम्हारी स्त्रियाँ ही तुमलोगोंका उपहास करेंगी और वह उपहास जीवित रहनेपर भी तुम्हारे लिये मृत्युके समान दुःखदायी होगा॥ २० ॥