श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1945, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘तुम सब लोग महान् और बहुत दूरतक फैले हुए श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए हो। फिर साधारण वानरोंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो ? यदि तुम पराक्रम छोड़कर भयके कारण भागते हो तो निश्चय ही अनार्य समझे जाओगे॥ २१ ॥
‘तुम जन-समुदायमें बैठकर जो डींग हाँका करते थे कि हम बड़े प्रचण्ड वीर हैं और स्वामीके हितैषी हैं, तुम्हारी वे सब बातें आज कहाँ चली गयीं?॥ २२ ॥
‘जो सत्पुरुषोंद्वारा धिक्कृत होकर भी जीवन धारण करता है, उसके उस जीवनको धिक्कार है, इस तरहके निन्दात्मक वचन कायरोंको सदा सुनने पड़ते हैं। इसलिये तुमलोग भय छोड़ो और सत्पुरुषोंद्वारा सेवित मार्गका आश्रय लो॥ २३ ॥
‘यदि हमलोग अल्पजीवी हों और शत्रुके द्वारा मारे जाकर रणभूमिमें सो जायँ तो हमें उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होगी, जो कुयोगियोंके लिये परम दुर्लभ है॥ २४ ॥
‘वानरो! यदि युद्धमें हमने शत्रुको मार गिराया तो हमें उत्तम कीर्ति मिलेगी और यदि स्वयं ही मारे गये तो हम वीरलोकके वैभवका उपभोग करेंगे॥ २५ ॥
‘श्रीरघुनाथजीके सामने जानेपर कुम्भकर्ण जीवित नहीं लौट सकेगा; ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निके पास पहुँचकर पतङ्ग भस्म हुए बिना नहीं रह सकता॥ २६ ॥
‘यदि हमलोग प्रख्यात वीर होकर भी भागकर अपने प्राण बचायेंगे और अधिक संख्यामें होकर भी एक योद्धाका सामना नहीं कर सकेंगे तो हमारा यश मिट्टीमें मिल जायगा’॥ २७ ॥
सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले शूरवीर अङ्गद जब ऐसा कह रहे थे, उस समय उन भागते हुए वानरोंने उन्हें ऐसा उत्तर दिया, जिसकी शौर्य-सम्पन्न योद्धा सदा निन्दा करते हैं॥ २८ ॥
वे बोले—‘राक्षस कुम्भकर्णने हमारा घोर संहार मचा रखा है; अतः यह ठहरनेका समय नहीं है। हम जा रहे हैं; क्योंकि हमें अपनी जान प्यारी है’॥ २९ ॥
इतनी बात कहकर भयानक नेत्रवाले भीषण कुम्भकर्णको आते देख उन सब वानर-यूथपतियोंने विभिन्न दिशाओंकी शरण ली॥ ३० ॥
तब उन भागते हुए सभी वीर वानरोंको अङ्गदने सान्त्वना और आदर-सम्मानके द्वारा लौटाया॥ ३१ ॥
बुद्धिमान् वालिपुत्रने उन सबको प्रसन्न कर लिया। वे सब वानरयूथपति सुग्रीवकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये॥ ३२ ॥