श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1947, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरसठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णका भयंकर युद्ध और श्रीरामके हाथसे उसका वध
अङ्गदके पूर्वोक्त वचन सुनकर वे सब विशालकाय वानर मरने-मारनेका निश्चय करके युद्धकी इच्छासे लौटे थे॥ १ ॥
महाबली अङ्गदने उनके पूर्व-पराक्रमोंका वर्णन करके अपने वचनोंद्वारा उन्हें सुदृढ़ एवं बल-विक्रमसम्पन्न बनाकर खड़ा कर दिया था॥ २ ॥
अब वे वानर मरनेका निश्चय करके बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े और जीवनका मोह छोड़कर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे॥ ३ ॥
उन विशालकाय वानर-वीरोंने वृक्ष तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर लेकर तुरंत ही कुम्भकर्णपर धावा किया॥
परंतु अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए विक्रमशाली महाकाय कुम्भकर्णने गदा उठाकर शत्रुओंको घायल करके उन्हें चारों ओर बिखेर दिया॥ ५ ॥
कुम्भकर्णकी मार खाकर आठ हजार सात सौ वानर तत्काल धराशायी हो गये॥ ६ ॥
वह सोलह, आठ, दस, बीस और तीस-तीस वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंसे समेट लेता और जैसे गरुड़ सर्पोंको खाता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक उनका भक्षण करता हुआ सब ओर दौड़ता-फिरता था॥ ७ ॥
उस समय वानर बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके इधर-उधरसे एकत्र हुए और वृक्ष तथा पर्वतशिखर हाथमें लेकर संग्रामभूमिमें डटे रहे॥ ८ ॥
तत्पश्चात् मेघके समान विशाल शरीरवाले वानरशिरोमणि द्विविदने एक पर्वत उखाड़कर पर्वतशिखरके समान ऊँचे कुम्भकर्णपर आक्रमण किया॥ ९ ॥
उस पर्वतको उखाड़कर द्विविदने कुम्भकर्णके ऊपर फेंका; किंतु वह उस विशालकाय राक्षसतक न पहुँचकर उसकी सेनामें जा गिरा॥ १० ॥
उस पर्वत-शिखरने राक्षससेनाके कितने ही घोड़ों, हाथियों, रथों, गजराजों तथा दूसरे-दूसरे राक्षसोंको भी कुचल डाला॥ ११ ॥