श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1965, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंअड़सठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णके वधका समाचार सुनकर रावणका विलाप
महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा कुम्भकर्णको मारा गया देख राक्षसोंने अपने राजा रावणसे जाकर कहा— ॥ १ ॥
‘महाराज! कालके समान भयंकर पराक्रमी कुम्भकर्ण वानरसेनाको भगाकर तथा बहुत-से वानरोंको अपना आहार बनाकर स्वयं भी कालके गालमें चले गये॥ २ ॥
‘वे दो घड़ीतक अपने प्रतापसे तपकर अन्तमें श्रीरामके तेजसे शान्त हो गये। उनका आधा शरीर (धड़) भयानक दिखायी देनेवाले समुद्रमें घुस गया और आधा शरीर (मस्तक) नाक-कान कट जानेसे खून बहाता हुआ लङ्काके द्वारपर पड़ा है। उस शरीरके द्वारा आपके भाई पर्वताकार कुम्भकर्ण लङ्काका द्वार रोककर पड़े हैं। वे श्रीरामके बाणोंसे पीड़ित हो हाथ, पैर और मस्तकसे हीन नंग-धड़ंग धड़के रूपमें परिणत हो दावानलसे दग्ध हुए वृक्षकी भाँति नष्ट हो गये’॥ ३–५ ॥
‘महाबली कुम्भकर्ण युद्धस्थलमें मारा गया’ यह सुनकर रावण शोकसे संतप्त एवं मूर्च्छित हो गया और तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६ ॥
अपने चाचाके निधनका समाचार सुनकर देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय दुःखसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे॥ ७ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा भाई कुम्भकर्ण मारे गये, यह सुनकर उसके सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व शोकसे व्याकुल हो गये॥ ८ ॥
तदनन्तर बड़े कष्टसे होशमें आनेपर राक्षसराज रावण कुम्भकर्णके वधसे दुःखी हो विलाप करने लगा। उसकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं॥ ९ ॥
(वह रो-रोकर कहने लगा—) ‘हा वीर! हा महाबली कुम्भकर्ण! तुम शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाले थे; किंतु दुर्भाग्यवश मुझे असहाय छोड़कर यमलोकको चल दिये॥ १० ॥
‘महाबली वीर! तुम मेरा तथा इन भाई-बन्धुओंका कण्टक दूर किये बिना शत्रुसेनाको संतप्त करके मुझे छोड़ अकेले कहाँ चले जा रहे हो?॥ ११ ॥