भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1979, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1979

बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमान्‌जीने उस समय देवान्तकके मस्तकपर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जनासे राक्षसोंको कम्पित कर दिया॥ २५ ॥

उनके मुष्टि-प्रहारसे देवान्तकका मस्तक फट गया और पिस उठा। दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं तथा वह राक्षसराजकुमार प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २६ ॥

राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महाबली देवद्रोही देवान्तकके युद्धमें मारे जानेपर त्रिशिराको बड़ा क्रोध हुआ और उसने नीलकी छातीपर पैने बाणोंकी भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी॥ २७ ॥

तदनन्तर अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथीपर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दराचलपर आरूढ हुए हों॥ २८ ॥

हाथीपर चढ़कर उसने नीलके ऊपर बाणोंकी विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डलसे युक्त मेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा कर रहा हो॥

बाण-समूहोंकी निरन्तर वर्षा होनेसे वानरसेनापति नीलके सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। उनका शरीर शिथिल हो गया। इस प्रकार महाबली महोदरने उन्हें मूर्च्छित करके उनके बल-विक्रमको कुण्ठित कर दिया॥

तत्पश्चात् होशमें आनेपर नीलने वृक्ष-समूहोंसे युक्त एक शैल-शिखरको उखाड़ लिया। उनका वेग बड़ा भयंकर था। उन्होंने उछलकर उस वृक्षको महोदरके मस्तकपर दे मारा॥ ३१ ॥

उस पर्वत-शिखरके आघातसे महोदर उस महान् गजराजके साथ ही चूर-चूर हो गया और मूर्च्छित एवं प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३२ ॥

पिताके भाईको मारा गया देख त्रिशिराके क्रोधकी सीमा न रही। उसने धनुष हाथमें ले लिया और हनुमान्‌जीको पैने बाणोंसे बींधना आरम्भ किया॥ ३३ ॥

तब पवनकुमारने कुपित होकर उस राक्षसके ऊपर पर्वतका शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिराने अपने तीखे सायकोंसे उसके कई टुकड़े कर डाले॥

उस पर्वतशिखरके प्रहारको व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान्ने उस रणभूमिमें रावणपुत्र त्रिशिराके ऊपर वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की॥ ३५ ॥

किंतु प्रतापी त्रिशिराने आकाशमें होनेवाली वृक्षोंकी उस वृष्टिको अपने पैने बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ३६ ॥