श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमान्जीने उस समय देवान्तकके मस्तकपर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जनासे राक्षसोंको कम्पित कर दिया॥ २५ ॥
उनके मुष्टि-प्रहारसे देवान्तकका मस्तक फट गया और पिस उठा। दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं तथा वह राक्षसराजकुमार प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २६ ॥
राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महाबली देवद्रोही देवान्तकके युद्धमें मारे जानेपर त्रिशिराको बड़ा क्रोध हुआ और उसने नीलकी छातीपर पैने बाणोंकी भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी॥ २७ ॥
तदनन्तर अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथीपर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दराचलपर आरूढ हुए हों॥ २८ ॥
हाथीपर चढ़कर उसने नीलके ऊपर बाणोंकी विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डलसे युक्त मेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा कर रहा हो॥
बाण-समूहोंकी निरन्तर वर्षा होनेसे वानरसेनापति नीलके सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। उनका शरीर शिथिल हो गया। इस प्रकार महाबली महोदरने उन्हें मूर्च्छित करके उनके बल-विक्रमको कुण्ठित कर दिया॥
तत्पश्चात् होशमें आनेपर नीलने वृक्ष-समूहोंसे युक्त एक शैल-शिखरको उखाड़ लिया। उनका वेग बड़ा भयंकर था। उन्होंने उछलकर उस वृक्षको महोदरके मस्तकपर दे मारा॥ ३१ ॥
उस पर्वत-शिखरके आघातसे महोदर उस महान् गजराजके साथ ही चूर-चूर हो गया और मूर्च्छित एवं प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३२ ॥
पिताके भाईको मारा गया देख त्रिशिराके क्रोधकी सीमा न रही। उसने धनुष हाथमें ले लिया और हनुमान्जीको पैने बाणोंसे बींधना आरम्भ किया॥ ३३ ॥
तब पवनकुमारने कुपित होकर उस राक्षसके ऊपर पर्वतका शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिराने अपने तीखे सायकोंसे उसके कई टुकड़े कर डाले॥
उस पर्वतशिखरके प्रहारको व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान्ने उस रणभूमिमें रावणपुत्र त्रिशिराके ऊपर वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की॥ ३५ ॥
किंतु प्रतापी त्रिशिराने आकाशमें होनेवाली वृक्षोंकी उस वृष्टिको अपने पैने बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ३६ ॥
तब हनुमान्जी कूदकर त्रिशिराके पास जा पहुँचे और जैसे कुपित सिंह गजराजको अपने पंजोंसे चीर डालता है, उसी प्रकार रोषसे भरे हुए उन पवनकुमारने त्रिशिराके घोड़ेको अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला॥ ३७ ॥
यह देख रावणकुमार त्रिशिराने शक्ति हाथमें ली, मानो यमराजने कालरात्रिको साथ ले लिया हो, वह शक्ति लेकर उसने पवनकुमार हनुमान्पर चलायी॥ ३८ ॥
जैसे आकाशसे उल्कापात हुआ हो, उसी प्रकार वह शक्ति, जिसकी गति कहीं कुण्ठित नहीं होती थी, चली; परंतु वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने उसे अपने शरीरमें लगनेसे पहले ही हाथसे पकड़ लिया और तोड़ डाला, तोड़नेके बाद उन्होंने भयंकर गर्जना की॥ ३९ ॥
हनुमान्जीने वह भयानक शक्ति तोड़ दी, यह देख वानरवृन्द अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे॥ ४० ॥
तब राक्षसशिरोमणि त्रिशिराने तलवार उठायी और कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीकी छातीपर उसकी भरपूर चोट की॥ ४१ ॥
तलवारकी चोटसे घायल हो पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्ने त्रिशिराकी छातीमें एक तमाचा जड़ दिया॥
उनका थप्पड़ लगते ही महातेजस्वी त्रिशिरा अपनी चेतना खो बैठा। उसके हाथसे हथियार खिसक गया और वह स्वयं भी पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४३ ॥
गिरते समय उस राक्षसके खड्गको छीनकर पर्वताकार महाकपि हनुमान्जी सब राक्षसोंको भयभीत करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४४ ॥
उनकी वह गर्जना उस निशाचरसे सही नहीं गयी, अतः वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उठते ही उसने हनुमान्जीको एक मुक्का मारा॥ ४५ ॥
उसके मुक्केकी चोट खाकर महाकपि हनुमान्जीको बड़ा क्रोध हुआ। कुपित होनेपर उन्होंने उस राक्षसका मुकुटमण्डित मस्तक पकड़ लिया॥ ४६ ॥
फिर तो जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके तीनों मस्तकोंको वज्रसे काट गिराया था, उसी प्रकार कुपित हुए पवनपुत्र हनुमान्ने रावणपुत्र त्रिशिराके किरीट और कुण्डलोंसहित तीनों मस्तकोंको तीखी तलवारसे काट डाला॥ ४७ ॥
उन मस्तकोंकी सभी इन्द्रियाँ विशाल थीं। उनकी आँखें प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रही थीं। उस इन्द्रद्रोही त्रिशिराके वे तीनों सिर उसी प्रकार पृथ्वीपर गिरे, जैसे आकाशसे तारे टूटकर गिरते हैं॥ ४८ ॥
देवद्रोही त्रिशिरा जब इन्द्रतुल्य पराक्रमी हनुमान्जीके हाथसे मारा गया, तब समस्त वानर हर्षनाद करने लगे, धरती काँपने लगी तथा राक्षस चारों दिशाओंकी ओर भाग चले॥ ४९ ॥
त्रिशिरा तथा महोदरको मारा गया देख और दुर्जय वीर देवान्तक एवं नरान्तकको भी कालके गालमें गया हुआ जान अत्यन्त अमर्षशील राक्षसशिरोमणि मत्त (महापार्श्व) कुपित हो उठा। उसने एक तेजस्विनी गदा हाथमें ली, जो सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी॥
उसपर सोनेका पत्र जड़ा हुआ था। युद्धस्थलमें पहुँचनेपर वह शत्रुओंके रक्त और मांसमें सन जाती थी। उसका आकार विशाल था। वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न तथा शत्रुओंके रक्तसे तृप्त होनेवाली थी॥ ५२ ॥
उसका अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित होता था। वह लाल रंगके फूलोंसे सजायी गयी थी तथा ऐरावत, पुण्डरीक और सार्वभौम नामक दिग्गजोंको भी भयभीत करनेवाली थी॥ ५३ ॥
उस गदाको हाथमें लेकर क्रोधसे भरा हुआ राक्षस-शिरोमणि मत्त (महापार्श्व) प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा और वानरोंकी ओर दौड़ा॥ ५४ ॥
तब ऋषभ नामक बलवान् वानर उछलकर रावणके छोटे भाई मत्तानीक (महापार्श्व)-के पास आ पहुँचे और उसके सामने खड़े हो गये॥ ५५ ॥
पर्वताकार वानरवीर ऋषभको सामने खड़ा देख कुपित हुए महापार्श्वने अपनी वज्रतुल्य गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया॥ ५६ ॥
उसकी उस गदाके आघातसे वानरशिरोमणि ऋषभका वक्षःस्थल क्षत-विक्षत हो गया। वे काँप उठे और अधिक मात्रामें खूनकी धारा बहाने लगे॥ ५७ ॥
बहुत देरके बाद होशमें आनेपर वानरराज ऋषभ कुपित हो उठे और महापार्श्वकी ओर देखने लगे। उस समय उनके ओठ फड़क रहे थे॥ ५८ ॥
वानरवीरोंमें प्रधान ऋषभका रूप पर्वतके समान जान पड़ता था। वे बड़े वेगशाली थे। उन्होंने वेगपूर्वक उस राक्षसके पास पहुँचकर मुक्का ताना और सहसा उसकी छातीपर प्रहार किया॥ ५९ ॥
फिर तो महापार्श्व जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे। इधर ऋषभ उस निशाचरकी यमदण्डके समान भयंकर गदाको शीघ्र ही हाथमें लेकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ६० ॥
देवद्रोही महापार्श्व दो घड़ीतक मुर्देकी भाँति पड़ा रहा। फिर होशमें आनेपर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उसका रक्तरंजित शरीर संध्याकालके बादलोंके समान लाल दिखायी देता था। उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी॥ ६१ ॥
उस चोटसे ऋषभ मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थलमें महापार्श्वकी उसी गदाको, जो किसी पर्वतराजकी चट्टानके समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचरपर दे मारा॥ ६२ ॥
उसकी उस भयंकर गदाने देवता, यज्ञ और ब्राह्मणसे शत्रुता रखनेवाले उस रौद्र-राक्षसके शरीरपर चोट करके उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया। फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओंसे मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगा॥ ६३ ॥
उस समय उस राक्षसने महामना ऋषभके हाथसे अपनी गदा लेनेके लिये उनपर धावा किया; किंतु ऋषभने उस भयानक गदाको हाथमें लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेगसे महापार्श्वपर आक्रमण किया। इस तरह उन महामनस्वी वानर-वीरने युद्धके मुहानेपर उस निशाचरकी जीवन-लीला समाप्त कर दी थी॥ ६४ १/२ ॥
अपनी ही गदाकी चोट खाकर महापार्श्वके दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं। वह वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया॥ ६५ १/२ ॥
जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसोंकी सेना सब ओर भाग चली॥ ६६ ॥
रावणके भा०इ महापार्श्वका वध हो जानेपर राक्षसोंकी वह समुद्रके समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचानेके लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
७० ॥
इकहत्तरवाँ सर्ग
इकहत्तरवाँ सर्ग
अतिकायका भयंकर युद्ध और लक्ष्मणके द्वारा उसका वध
अतिकायने देखा, शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली मेरी भयंकर सेना व्यथित हो उठी है, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी मेरे भाइयोंका संहार हो गया है तथा मेरे चाचा—दोनों भाई युद्धोन्मत्त (महोदर) और मत्त (महापार्श्व) भी समराङ्गणमें मार गिराये गये हैं, तब उस महातेजस्वी निशाचरको बड़ा क्रोध हुआ। उसे ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हो चुका था। अतिकाय पर्वतके समान विशालकाय तथा देवता और दानवोंके दर्पका दलन करनेवाला था॥ १—३ ॥
वह इन्द्रका शत्रु था। उसने सहस्रों सूर्योंके समूहकी भाँति देदीप्यमान तेजस्वी रथपर आरूढ़ होकर वानरोंपर धावा किया॥ ४ ॥
उसके मस्तकपर किरीट और कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे। उसने धनुषकी टङ्कार करके अपना नाम सुनाया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ५ ॥
उस सिंहनादसे, अपने नामकी घोषणासे और प्रत्यञ्चाकी भयानक टङ्कारसे उसने वानरोंको भयभीत कर दिया॥ ६ ॥
उसके शरीरकी विशालता देखकर वे वानर ऐसा मानने लगे कि यह कुम्भकर्ण ही फिर उठकर खड़ा हो गया। यह सोचकर सब वानर भयसे पीड़ित हो एक-दूसरेका सहारा लेने लगे॥ ७ ॥
त्रिविक्रम-अवतारके समय बढ़े हुए भगवान् विष्णुके विराट् रूपकी भाँति उसका शरीर देखकर वे वानर-सैनिक भयके मारे इधर-उधर भागने लगे॥ ८ ॥
अतिकायके निकट जाते ही वानरोंके चित्तपर मोह छा गया। वे युद्धस्थलमें लक्ष्मणके बड़े भाई शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये॥ ९ ॥
रथपर बैठे हुए पर्वताकार अतिकायको श्रीरामचन्द्रजीने भी देखा। वह हाथमें धनुष लिये कुछ दूरपर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना कर रहा था॥ १० ॥
उस महाकाय निशाचरको देखकर श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने वानरोंको सान्त्वना देकर विभीषणसे पूछा—॥ ११ ॥
‘विभीषण! हजार घोड़ोंसे जुते हुए विशाल रथपर बैठा हुआ वह पर्वताकार निशाचर कौन है? उसके हाथमें धनुष है और आँखें सिंहके समान तेजस्विनी दिखायी देती हैं॥ १२ ॥
‘यह भूतोंसे घिरे हुए भूतनाथ महादेवजीके समान तीखे शूल तथा अत्यन्त तेजधारवाले तेजस्वी प्रासों और तोमरोंसे घिरकर अद्भुत शोभा पा रहा है॥ १३ ॥
‘इतना ही नहीं, कालकी जिह्वाके समान प्रकाशित होनेवाली रथशक्तियोंसे घिरा हुआ यह वीर निशाचर विद्युन्मालाओंसे आवृत मेघके समान प्रकाशित हो रहा है॥ १४ ॥
‘जिनके पृष्ठभागमें सोने मढ़े हुए हैं, ऐसे अनेकानेक सुसज्जित धनुष उसके श्रेष्ठ रथकी सब ओरसे उसी तरह शोभा बढ़ा रहे हैं, जैसे इन्द्रधनुष आकाशको सुशोभित करता है॥ १५ ॥
‘यह राक्षसोंमें सिंहके समान पराक्रमी और रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रणभूमिकी शोभा बढ़ाता हुआ मेरे सामने आ रहा है॥ १६ ॥
‘इसके ध्वजके शिखरपर पताकामें राहुका चिह्न अङ्कित है, जिससे रथकी बड़ी शोभा हो रही है। यह सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणोंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहा है॥ १७ ॥
‘इसके धनुषका पृष्ठभाग सोनेसे मढ़ा हुआ तथा पुष्प आदिसे अलंकृत है। वह आदि, मध्य और अन्त तीन स्थानोंमें झुका हुआ है। उसकी प्रत्यञ्चासे मेघोंकी गर्जनाके समान टंकार-ध्वनि प्रकट होती है। इस निशाचरका धनुष इन्द्र-धनुषके समान शोभा पाता है॥ १८ ॥
‘इसका विशाल रथ ध्वजा, पताका और अनुकर्ष (रथके नीचे लगे हुए आधारभूत काष्ठ)-से युक्त, चार सारथियोंसे नियन्त्रित और मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाला है॥ १९ ॥
‘इसके रथपर बीस तरकस, दस भयंकर धनुष और आठ सुनहरे एवं पिङ्गलवर्णकी प्रत्यञ्चाएँ रखी हुई हैं॥ २० ॥
‘दोनों बगलमें दो चमकीली तलवारें शोभा पा रही हैं, जिनकी मूँठें चार हाथकी और लंबाई दस हाथकी है॥ २१ ॥
‘गलेमें लाल रंगकी माला धारण किये महान् पर्वतके समान आकारवाला यह धीरवीर निशाचर काले रंगका दिखायी देता है। इसका विशाल मुख कालके मुखके समान भयंकर है तथा यह मेघोंकी ओटमें स्थित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता है॥ २२ ॥
‘इसकी बाँहोंमें सोनेके बाजूबंद बँधे हुए हैं। उन भुजाओंके द्वारा यह विशालकाय निशाचर दो ऊँचे शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पाता है॥ २३ ॥
‘इसका अत्यन्त भीषण मुखमण्डल दोनों कुण्डलोंसे मण्डित हो पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रोंके बीच स्थित हुए परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा है॥ २४ ॥
‘महाबाहो! तुम मुझे इस श्रेष्ठ राक्षसका परिचय दो, जिसे देखते ही सब वानर भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं’॥ २५ ॥
अमित तेजस्वी राजकुमार श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी विभीषणने रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ २६ ॥
‘भगवन्! जो कुबेरका छोटा भाई, महातेजस्वी, महाकाय, भयानक कर्म करनेवाला तथा राक्षसोंका स्वामी दशमुख राजा रावण है, उसके एक बड़ा पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बलमें रावणके ही समान है। वह वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाला, वेद-शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है॥ २७-२८ ॥
‘हाथी-घोड़ोंकी सवारी करने, तलवार चलाने, धनुषपर बाणोंका संधान करने, प्रत्यञ्चा खींचने, लक्ष्य बेधने, साम और दानका प्रयोग करने तथा न्याययुक्त बर्ताव एवं मन्त्रणा देनेमें वह सबके द्वारा सम्मानित है॥ २९ ॥
‘उसीके बाहुबलका आश्रय लेकर लङ्कापुरी सदा निर्भय रहती आयी है। वही यह वीर निशाचर है। यह रावणकी दूसरी पत्नी धान्यमालिनीका पुत्र है। इसे लोग अतिकायके नामसे जानते हैं॥ ३० ॥
‘तपस्यासे विशुद्ध अन्तःकरणवाले इस अतिकायने दीर्घकालतक ब्रह्माजीकी आराधना की थी। इसने ब्रह्माजीसे अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं और उनके द्वारा बहुत-से शत्रुओंको पराजित किया है॥ ३१ ॥
‘ब्रह्माजीने इसे देवताओं और असुरोंसे न मारे जानेका वरदान दिया है। ये दिव्य कवच और सूर्यके समान तेजस्वी रथ भी उन्हींके दिये हुए हैं॥ ३२ ॥
‘इसने देवता और दानवोंको सैकड़ों बार पराजित किया है, राक्षसोंकी रक्षा की है और यक्षोंको मार भगाया है॥ ३३ ॥
‘इस बुद्धिमान् राक्षसने अपने बाणोंद्वारा इन्द्रके वज्रको भी कुण्ठित कर दिया है तथा युद्धमें जलके स्वामी वरुणके पाशको भी सफल नहीं होने दिया है॥
‘राक्षसोंमें श्रेष्ठ यह बुद्धिमान् रावणकुमार अतिकाय बड़ा बलवान् तथा देवताओं और दानवोंके दर्पको भी दलन करनेवाला है॥ ३५ ॥
‘पुरुषोत्तम! अपने सायकोंसे यह सारी वानर-सेनाका संहार कर डाले, इसके पहले ही आप इस राक्षसको परास्त करनेका शीघ्र प्रयत्न कीजिये’॥ ३६ ॥
विभीषण और भगवान् श्रीराममें इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि बलवान् अतिकाय वानरोंकी सेनामें घुस आया और बारम्बार गर्जना करता हुआ अपने धनुषपर टंकार देने लगा॥ ३७ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ और भयंकर शरीरवाले उस राक्षसको रथपर बैठकर आते देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ आदि जो प्रधान-प्रधान महामनस्वी वानर थे, वे वृक्ष तथा पर्वतशिखर धारण किये एक साथ ही उसपर टूट पड़े॥ ३८-३९ ॥
परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी अतिकायने अपने सुवर्णभूषित बाणोंसे वानरोंके चलाये हुए वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको काट गिराया॥ ४० ॥
साथ ही उस बलवान् और भीमकाय निशाचरने युद्धस्थलमें सामने आये हुए उन समस्त वानरोंको लोहेके बाणोंसे बींध डाला॥ ४१ ॥
उसकी बाणवर्षासे आहत हो सबके शरीर क्षतवि क्षत हो गये। सबने हार मान ली और कोर्इ भी उस महासमरमें अतिकायका सामना करनेमें समर्थ न हो सके॥ ४२ ॥
जैसे जवानीके जोशसे भरा हुआ कुपित सिंह मृगोंके झुण्डको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार वह राक्षस वानरवीरोंकी उस सेनाको त्रास देने लगा॥ ४३ ॥
वानरोंके झुण्डमें विचरते हुए राक्षसराज अतिकायने किसी भी ऐसे योद्धाको नहीं मारा, जो उसके साथ युद्ध न कर रहा हो। धनुष और तरकस धारण किये वह निशाचर उछलकर श्रीरामके पास आ गया तथा बड़े गर्वसे इस प्रकार बोला—॥ ४४ ॥
‘मैं धनुष और बाण लेकर रथपर बैठा हूँ। किसी साधारण प्राणीसे युद्ध करनेका मेरा विचार नहीं है। जिसके अंदर शक्ति हो, साहस और उत्साह हो, वह शीघ्र यहाँ आकर मुझे युद्धका अवसर दे’॥ ४५ ॥
उसके ये अहंकारपूर्ण वचन सुनकर शत्रुहन्ता सुमित्राकुमार लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ। उसकी बातोंको सहन न कर सकनेके कारण वे आगे बढ़ आये और किंचित् मुसकराकर उन्होंने अपना धनुष उठाया॥
कुपित हुए लक्ष्मण उछलकर आगे आये और तरकससे बाण खींचकर अतिकायके सामने आ अपने विशाल धनुषको खींचने लगे॥ ४७ ॥
लक्ष्मणके धनुषकी प्रत्यञ्चाका वह शब्द बड़ा भयंकर था। वह सारी पृथ्वी, आकाश, समुद्र तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा और निशाचरोंको त्रास देने लगा॥ ४८ ॥
सुमित्राकुमारके धनुषकी वह भयानक टंकार सुनकर उस समय महातेजस्वी बलवान् राक्षसराजकुमार अतिकायको बड़ा विस्मय हुआ॥ ४९ ॥
लक्ष्मणको अपना सामना करनेके लिये उठा देख अतिकाय रोषसे भर गया और तीखा बाण हाथमें लेकर इस प्रकार बोला—॥ ५० ॥
‘सुमित्राकुमार! तुम अभी बालक हो। पराक्रम करनेमें कुशल नहीं हो, अतः लौट जाओ। मैं तुम्हारे लिये कालके समान हूँ। मुझसे जूझनेकी इच्छा क्यों करते हो?॥ ५१ ॥
‘मेरे हाथसे छूटे हुए बाणोंका वेग गिरिराज हिमालय भी नहीं सह सकता। पृथ्वी और आकाश भी उसे नहीं सहन कर सकते॥ ५२ ॥
‘तुम सुखसे सोयी (शान्त) हुई प्रलयाग्निको क्यों जगाना (प्रज्वलित करना) चाहते हो? धनुषको यहीं छोड़कर लौट जाओ। मुझसे भिड़कर अपने प्राणोंका परित्याग न करो॥ ५३ ॥
‘अथवा तुम बड़े अहंकारी हो, इसीलिये लौटना नहीं चाहते। अच्छा, खड़े रहो। अभी अपने प्राणोंसे हाथ धोकर यमलोककी यात्रा करोगे॥ ५४ ॥
‘शत्रुओंका दर्प चूर्ण करनेवाले मेरे इन तीखे बाणोंको, जो तपे हुए सुवर्णसे भूषित हैं, देखो; ये भगवान् शंकरके त्रिशूलकी समानता करते हैं॥ ५५ ॥
‘जैसे कुपित हुआ सिंह गजराजका खून पीता है, उसी प्रकार यह सर्पके समान भयंकर बाण तुम्हारे रक्तका पान करेगा।' ऐसा कहकर अतिकायने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुषपर बाणका संधान किया॥ ५६ ॥
युद्धस्थलमें अतिकायके रोष और गर्वसे भरे हुए इस वचनको सुनकर अत्यन्त बलशाली एवं मनस्वी राजकुमार लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ। वे यह महान् अर्थसे युक्त वचन बोले—॥
५७ ॥
‘दुरात्मन्! केवल बातें बनानेसे तू बड़ा नहीं हो सकता। सिर्फ डींग हाँकनेसे को◌ंऽ श्रेष्ठ पुरुष नहीं होते। मैं हाथमें धनुष और बाण लेकर तेरे सामने खड़ा हूँ। तू अपना सारा बल मुझे दिखा॥ ५८ ॥
‘पराक्रमके द्वारा अपनी वीरताका परिचय दे। झूठी शेखी बघारना तेरे लिये उचित नहीं है। शूर वही माना गया है, जिसमें पुरुषार्थ हो॥ ५९ ॥
‘तेरे पास सब तरहके हथियार मौजूद हैं। तू धनुष लेकर रथपर बैठा हुआ है; अतः बाणों अथवा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा पहले अपना पराक्रम दिखा ले॥ ६० ॥
‘उसके बाद मैं अपने तीखे बाणोंसे तेरा मस्तक उसी तरह काट गिराऊँगा, जैसे वायु कालक्रमसे पके हुए ताड़के फलको उसके वृन्त (बोंडी)-से नीचे गिरा देती है॥ ६१ ॥
‘आज तपे हुए सुवर्णसे विभूषित मेरे बाण अपनी नोंकद्वारा किये गये छिद्रसे निकले हुए तेरे शरीरके रक्तका पान करेंगे॥ ६२ ॥
‘तू मुझे बालक जानकर मेरी अवहेलना न कर। मैं बालक होऊँ अथवा वृद्ध, संग्राममें तो तू मुझे अपना काल ही समझ ले॥ ६३ ॥
‘वामनरूपधारी भगवान् विष्णु देखनेमें बालक ही थे; किंतु अपने तीन ही पगोंसे उन्होंने समूची त्रिलोकी नाप ली थी।’ लक्ष्मणकी वह परम सत्य और युक्तियुक्त बात सुनकर अतिकायके क्रोधकी सीमा न रही। उसने एक उत्तम बाण अपने हाथमें ले लिया॥ ६४ ॥
तदनन्तर विद्याधर, भूत, देवता, दैत्य, महर्षि तथा महामना गुह्यकगण उस युद्धको देखनेके लिये आये॥
उस समय अतिकायने कुपित हो धनुषपर वह उत्तम बाण चढ़ाया और आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए-से उसे लक्ष्मणपर चला दिया॥ ६६ ॥
किंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने एक अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा अपनी ओर आते हुए उस विषधर सर्पके तुल्य भयंकर एवं तीखे बाणको काट डाला॥ ६७ ॥
जैसे सर्पका फन कट जाय, उसी प्रकार उस बाणको खण्डित हुआ देख अत्यन्त कुपित हुए अतिकायने पाँच बाणोंको धनुषपर रखा॥ ६८ ॥
फिर उस निशाचरने लक्ष्मणपर ही वे पाँचों बाण चला दिये। वे बाण उनके समीप अभी आने भी नहीं पाये थे कि लक्ष्मणने तीखे सायकोंसे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ ६९ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपने पैने सायकोंसे उन बाणोंका खण्डन करनेके पश्चात् एक तेज बाण हाथमें लिया, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था॥ ७० ॥
उसे लेकर लक्ष्मणने अपने श्रेष्ठ धनुषपर रखा, उसकी प्रत्यञ्चाको खींचा और बड़े वेगसे वह सायक अतिकायपर छोड़ दिया॥ ७१ ॥
धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये तथा झुकी हुई गाँठवाले उस बाणके द्वारा पराक्रमी लक्ष्मणने राक्षसश्रेष्ठ अतिकायके ललाटमें गहरा आघात किया॥
वह बाण उस भयानक राक्षसके ललाटमें धँस गया और रक्तसे भींगकर पर्वतसे सटे हुए किसी नागराजके समान दिखायी देने लगा॥ ७३ ॥
लक्ष्मणके बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो वह राक्षस काँप उठा। ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् रुद्रके बाणोंसे आहत हो त्रिपुरका भयंकर गोपुर हिल उठा था। फिर थोड़ी ही देरमें सँभलकर महाबली अतिकाय बड़ी चिन्तामें पड़ गया और कुछ सोच-विचारकर बोला—॥ ७४ १/२ ॥
‘शाबाश! इस प्रकार अमोघ बाणका प्रयोग करनेके कारण तुम मेरे स्पृहणीय शत्रु हो।’ मुँह फैलाकर ऐसा कहनेके पश्चात् अतिकाय अपनी दोनों विशाल भुजाओंको काबूमें करके रथके पिछले भागमें बैठकर उस रथके द्वारा ही आगे बढ़ा॥ ७५-७६ ॥
उस राक्षसशिरोमणि वीरने क्रमशः एक, तीन, पाँच और सात सायकोंको लेकर उन्हें धनुषपर चढ़ाया और वेगपूर्वक खींचकर चला दिया॥ ७७ ॥
उस राक्षसराजके धनुषसे छूटे हुए उन सुवर्णभूषित, सूर्यतुल्य तेजस्वी तथा कालके समान भयंकर बाणोंने आकाशको प्रकाशसे पूर्ण-सा कर दिया॥ ७८ ॥
परंतु रघुनाथजीके छोटे भाई लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके उस निशाचरद्वारा चलाये हुए उन बाणसमूहोंको तेज धारवाले बहुसंख्यक सायकोंद्वारा काट गिराया॥ ७९ ॥
उन बाणोंको कटा हुआ देख इन्द्रद्रोही रावणकुमारको बड़ा क्रोध हुआ और उसने एक तीखा बाण हाथमें लिया॥ ८० ॥
उसे धनुषपर रखकर उस महातेजस्वी वीरने सहसा छोड़ दिया और उसके द्वारा सामने आते हुए सुमित्राकुमारकी छातीमें आघात किया॥ ८१ ॥
अतिकायके उस बाणकी चोट खाकर सुमित्राकुमार युद्धस्थलमें अपने वक्षःस्थलसे तीव्रगतिसे रक्त बहाने लगे, मानो कोऽइ मतवाला हाथी मस्तकसे मदकी वर्षा कर रहा हो॥ ८२ ॥
फिर सामर्थ्यशाली लक्ष्मणने सहसा अपनी छातीसे उस बाणको निकाल दिया और एक तीखा सायक हाथमें लेकर उसे दिव्यास्त्रसे संयोजित किया॥ ८३ ॥
उस समय अपने उस सायकको उन्होंने आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित होते ही महात्मा लक्ष्मणके धनुषपर रखा हुआ वह बाण तत्काल प्रज्वलित हो उठा॥ ८४ ॥
उधर अत्यन्त तेजस्वी अतिकायने भी रौद्रास्त्रको एक सुवर्णमय पंखवाले सर्पाकार बाणपर समायोजित किया॥ ८५ ॥
इतनेहीमें लक्ष्मणने दिव्यास्त्रकी शक्तिसे सम्पन्न उस प्रज्वलित एवं भयंकर बाणको अतिकायके ऊपर चलाया, मानो यमराजने अपने कालदण्डका प्रयोग किया हो॥ ८६ ॥
आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित हुए उस बाणको अपनी ओर आते देख निशाचर अतिकायने तत्काल ही अपने भयंकर बाणको सूर्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया॥ ८७ ॥
उन दोनों सायकोंके अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। आकाशमें पहुँचकर वे दोनों कुपित हुए दो सर्पोंकी भाँति आपसमें टकरा गये और एक-दूसरेको दग्ध करके पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८८-८९ ॥
वे दोनों ही बाण उत्तम कोटिके थे और अपनी दीप्तिसे प्रकाशित हो रहे थे, तथापि एक-दूसरेके तेजसे भस्म होकर अपना-अपना तेज खो बैठे। इसलिये भूतलपर निष्प्रभ होनेके कारण उनकी शोभा नहीं हो रही थी॥
तदनन्तर अतिकायने अत्यन्त कुपित हो त्वष्टा देवताके मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके एक सींकका बाण छोड़ा; परंतु पराक्रमी लक्ष्मणने उस अस्त्रको ऐन्द्रास्त्रसे काट दिया॥ ९१ ॥
सींकके बाणको नष्ट हुआ देख रावणपुत्र कुमार अतिकायके क्रोधकी सीमा न रही। उस राक्षसने एक सायकको याम्यास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया; परंतु लक्ष्मणने वायव्यास्त्रद्वारा उसको भी नष्ट कर दिया॥ ९२-९३ ॥
तत्पश्चात् जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार अत्यन्त कुपित हुए लक्ष्मणने रावणकुमार अतिकायपर बाणधाराकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ९४ ॥
अतिकायने एक दिव्य कवच बाँध रखा था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे। लक्ष्मणके बाण अतिकायतक पहुँचकर उसके कवचसे टकराते और नोक टूट जानेके कारण सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ९५ ॥
उन बाणोंको असफल हुआ देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महायशस्वी लक्ष्मणने पुनः सहस्रों बाणोंकी वर्षा की॥ ९६ ॥
महाबली अतिकायका कवच अभेद्य था, इसलिये युद्धस्थलमें बाण-समूहोंकी वर्षा होनेपर भी वह राक्षस व्यथित नहीं होता था॥ ९७ ॥
उसने लक्ष्मणपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण चलाया। उस बाणसे सुमित्राकुमारके मर्मस्थलमें चोट पहुँची॥ ९८ ॥
अतः शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण दो घड़ीतक अचेत-अवस्थामें पड़े रहे। फिर होशमें आनेपर उन महाबली शत्रुदमन वीरने बाणोंकी वर्षासे शत्रुके रथकी ध्वजाको नष्ट कर दिया और चार उत्तम सायकोंसे रणभूमिमें उसके घोड़ों तथा सारथिको भी यमलोक पहुँचा दिया॥ ९९-१०० ॥
तत्पश्चात् सम्भ्रमरहित नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसके वधके लिये जाँचे-बूझे हुए बहुत-से अमोघ बाण छोड़े, तथापि वे समराङ्गणमें उस निशाचरके शरीरको वेध न सके॥ १०१ १/२ ॥
तदनन्तर वायुदेवताने उनके पास आकर कहा— 'सुमित्रानन्दन! इस राक्षसको ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हुआ है। यह अभेद्य कवचसे ढका हुआ है। अतः इसको ब्रह्मास्त्रसे विदीर्ण कर डालो; अन्यथा यह नहीं मारा जा सकेगा। यह कवचधारी बलवान् निशाचर अन्य अस्त्रोंके लिये अवध्य है'॥ १०२-१०३ ॥
लक्ष्मण इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने वायुदेवताका उपर्युक्त वचन सुनकर एक भयंकर वेगवाले बाणको सहसा ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर रखा॥ १०४ ॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मणके द्वारा तेज धारवाले उस श्रेष्ठ बाणमें ब्रह्मास्त्रकी संयोजना की जानेपर उस समय सम्पूर्ण दिशाएँ, चन्द्रमा और सूर्य आदि बड़े-बड़े ग्रह तथा अन्तरिक्षलोकके प्राणी थर्रा उठे और भूमण्डलमें महान् कोलाहल मच गया॥ १०५ ॥
सुमित्राकुमारने धनुषपर रखे हुए उस सुन्दर पंखवाले बाणको जब ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किया, तब वह यमदूतके समान भयंकर और वज्रके समान अमोघ हो गया। उन्होंने युद्धस्थलमें उस बाणको इन्द्रद्रोही रावणके बेटे अतिकायको लक्ष्य करके चला दिया॥ १०६ ॥
लक्ष्मणके चलाये हुए उस बाणका वेग बहुत बढ़ा हुआ था। उसके पंख गरुड़के समान थे और उनमें हीरे जड़े हुए थे; इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। अतिकायने समराङ्गणमें उस बाणको उस समय वायुके समान भयंकर वेगसे अपनी ओर आते देखा॥ १०७ ॥
उसे देखकर अतिकायने सहसा उसके ऊपर बहुत-से पैने बाण चलाये तो भी वह गरुड़के समान वेगशाली सायक बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचा॥
प्रलयङ्कर कालके समान प्रज्वलित हुए उस बाणको अत्यन्त निकट आया देखकर भी अतिकायकी युद्धविषयक चेष्टा नष्ट नहीं हुई। उसने शक्ति, ऋष्टि, गदा, कुठार, शूल तथा बाणोंद्वारा उसे नष्ट करनेका प्रयत्न किया॥ १०९ ॥
परंतु अग्निके समान प्रज्वलित हुए उस बाणने उन अद्भुत अस्त्रोंको व्यर्थ करके अतिकायके मुकुटमण्डित मस्तकको धड़से अलग कर दिया॥ ११० ॥
लक्ष्मणके बाणसे कटा हुआ राक्षसका वह शिरस्त्राणसहित मस्तक हिमालयके शिखरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर जा पड़ा॥ १११ ॥
उसके वस्त्र और आभूषण सब ओर बिखर गये। उसे धरतीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए समस्त निशाचर व्यथित हो उठे॥ ११२ ॥
उनके मुखपर विषाद छा गया। उनपर जो मार पड़ी थी, उससे थक जानेके कारण वे और भी दुःखी हो गये थे। अतः वे बहुसंख्यक राक्षस सहसा विकृत स्वरमें जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगे॥ ११३ ॥
सेनानायकके मारे जानेपर निशाचरोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया, अतः वे भयभीत हो तुरंत ही लङ्कापुरीकी ओर भाग चले॥ ११४ ॥
इधर उस भयंकर बलशाली दुर्जय शत्रुके मारे जानेपर बहुसंख्यक वानर हर्ष और उत्साहसे भर गये। उनके मुख प्रफुल्ल कमलोंके समान खिल उठे और वे अभीष्ट विजयके भागी वीरवर लक्ष्मणकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ११५ ॥
युद्धस्थलमें अत्यन्त बलशाली और मेघके समान विशाल अतिकायको धराशायी करके लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए। वे उस समय वानर-समूहोंसे सम्मानित हो तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीके पास गये॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१ ॥
बहत्तरवाँ सर्ग
बहत्तरवाँ सर्ग
रावणकी चिन्ता तथा उसका राक्षसोंको पुरीकी रक्षाके लिये सावधान रहनेका आदेश
महात्मा लक्ष्मणके द्वारा अतिकायको मारा गया सुनकर राजा रावण उद्विग्न हो उठा और इस प्रकार बोला—॥ १ ॥
‘अत्यन्त अमर्षशील धूम्राक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अकम्पन, प्रहस्त तथा कुम्भकर्ण—ये महाबली वीर राक्षस सदा युद्धकी अभिलाषा रखते थे। ये सब-के-सब शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाते और स्वयं विपक्षियोंसे कभी पराजित नहीं होते थे॥ २-३ ॥
‘परंतु अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रामने नाना प्रकारके शस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण उन विशालकाय वीर राक्षसोंका सेनासहित संहार कर डाला॥ ४ ॥
‘और भी बहुत-से महामनस्वी शूरवीर राक्षस उनके द्वारा मार गिराये गये। जिसके बल और पराक्रम सर्वत्र विख्यात हैं, उस मेरे बेटे इन्द्रजित्ने उन दोनों भाइयोंको वरदानप्राप्त घोर नागस्वरूप बाणोंसे बाँध लिया था। वह घोर बन्धन समस्त देवता और महाबली असुर भी नहीं खोल सकते थे। यक्ष, गन्धर्व और नागोंके लिये भी उस बन्धनसे छुटकारा दिलाना असम्भव था, तो भी ये दोनों भाई राम और लक्ष्मण उस बाण-बन्धनसे मुक्त हो गये। न जाने कौन-सा प्रभाव था, कैसी माया थी अथवा किस तरहकी मोहिनी ओषधि आदिका प्रयोग किया गया था, जिससे वे उस बन्धनसे छूट गये॥ ५—७ १/२ ॥
‘मेरी आज्ञासे जो-जो शूरवीर योद्धा राक्षस युद्धके लिये निकले, उन सबको समराङ्गणमें महाबली वानरोंने मार डाला॥ ८ १/२ ॥
‘मैं आज ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें लक्ष्मणसहित रामको और सेना तथा सुग्रीवसहित वीर विभीषणको नष्ट कर दे॥ ९ १/२ ॥
‘अहो! राम बड़े बलवान् हैं, निश्चय ही उनका अस्त्र-बल महान् है; जिनके बल-विक्रमका सामना करके असंख्य राक्षस कालके गालमें चले गये॥ १० १/२ ॥
‘मैं उन वीर रघुनाथको रोग-शोकसे रहित साक्षात् नारायणरूप मानता हूँ; क्योंकि उन्हींके भयसे लङ्कापुरीके सभी दरवाजे और सदर फाटक सदा बंद रहते हैं॥ ११ १/२ ॥
‘राक्षसो! तुमलोग हर समय सावधान रहकर सैनिकोंसहित इस पुरीकी और जहाँ सीता रखी गयी हैं, उस अशोक-शिविर वाटिकाकी भी विशेषरूपसे रक्षा करो॥ १२ १/२ ॥
‘अशोक-वाटिकामें कब कौन प्रवेश करता है और कब वहाँसे बाहर निकलता है, इसकी हमें सदा ही जानकारी रखनी चाहिये। जहाँ-जहाँ सैनिकोंके शिविर हों, वहाँ बारम्बार देखभाल करना, सब ओर अपने-अपने सैनिकोंके साथ पहरेपर रहना॥ १३-१४ ॥
‘निशाचरो! प्रदोषकाल, आधी रात तथा प्रातःकालमें भी सर्वथा वानरोंके आने-जानेपर दृष्टि रखना॥ १५ ॥
‘वानरोंकी ओरसे कभी उपेक्षाभाव नहीं रखना चाहिये और सदा इस बातपर दृष्टि रखनी चाहिये कि शत्रुओंकी सेना युद्धके लिये उद्यमशील तो नहीं है? आक्रमण तो नहीं कर रही है अथवा पूर्ववत् जहाँ-कीतहाँ खड़ी है न?’॥ १६ ॥
लङ्कापतिका यह आदेश सुनकर समस्त महाबली राक्षस उन सारी बातोंका यथावत् रूपसे पालन करने लगे॥ १७ ॥
उन सबको पूर्वोक्त आदेश देकर राक्षसराज रावण अपने हृदयमें चुभे हुए दुःख और क्रोधरूपी काँटेकी पीड़ाका भार वहन करता हुआ दीनभावसे अपने महलमें गया॥ १८ ॥
महाबली निशाचरराज रावणकी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। वह अपने पुत्रकी उस मृत्युको ही याद करके उस समय बारम्बार लंबी साँस खींच रहा था॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ सर्ग
तिहत्तरवाँ सर्ग
इन्द्रजित्के ब्रह्मास्त्रसे वानरसेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणका मूर्च्छित होना
संग्रामभूमिमें जो निशाचर मरनेसे बच गये थे, उन्होंने तुरंत रावणके पास जाकर उसे देवान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय आदि राक्षसपुङ्गवोंके मारे जानेका समाचार सुनाया॥ १ ॥
उनके वधकी बात सुनकर राजा रावणके नेत्रोंमें सहसा आँसुओंकी बाढ़ आ गयी। पुत्रों और भाइयोंके भयानक वधकी बात सोचकर उसको बड़ी चिन्ता हुई॥
राजा रावणको शोकके समुद्रमें निमग्न एवं दीन हुआ देख रथियोंमें श्रेष्ठ राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्ने यह बात कही—॥ ३ ॥
‘तात! राक्षसराज! जबतक इन्द्रजित् जीवित है तबतक आप चिन्ता और मोहमें न पड़िये। इस इन्द्रशत्रुके बाणोंसे घायल होकर कोई भी समराङ्गणमें अपने प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता॥ ४ ॥
‘देखिये, आज मैं राम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे छिन्न-भिन्न करके उनके सारे अङ्गोंको तीखे सायकोंसे भर देता हूँ, और वे दोनों भाई गतायु होकर सदाके लिये धरतीपर सो जाते हैं॥ ५ ॥
‘आप मुझ इन्द्रशत्रुकी इस सुनिश्चित प्रतिज्ञाको, जो मेरे पुरुषार्थसे और दैवबल (ब्रह्माजीकी कृपा)-से भी सिद्ध होनेवाली है, सुन लीजिये—मैं आज ही लक्ष्मणसहित रामको अपने अमोघ बाणोंसे पूर्णतः तृप्त करूँगा—उनकी युद्धविषयक पिपासाको बुझा दूँगा॥ ६ ॥
‘आज इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, साध्य, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा बलिके यज्ञमण्डपमें भगवान् विष्णुके भयंकर विक्रमकी भाँति मेरे अपार पराक्रमको देखेंगे’॥ ७ ॥
ऐसा कहकर उदारचेता इन्द्रशत्रु इन्द्रजित्ने राजा रावणसे आज्ञा ली और अच्छे गदहोंसे जुते हुए, युद्धसामग्रीसे सम्पन्न एवं वायुके समान वेगशाली रथपर वह सवार हुआ॥ ८ ॥
उसका रथ इन्द्रके रथके समान जान पड़ता था। उसपर आरूढ़ हो शत्रुओंका दमन करनेवाला वह महातेजस्वी निशाचर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ युद्ध हो रहा था॥ ९ ॥
उस महामनस्वी वीरको प्रस्थान करते देख बहुत-से महाबली राक्षस हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष लिये हर्ष और उत्साहके साथ उसके पीछे-पीछे चले॥ १० ॥
कोर्इ हाथीपर बैठकर चले तो कोर्इ उत्तम घोड़ोंपर। इनके सिवा बाघ, बिच्छू, बिलाव, गदहे, ऊँट, सर्प, सूअर, अन्य हिंसक जन्तु, सिंह, पर्वताकार गीदड़, कौआ, हंस और मोर आदिकी सवारियोंपर चढ़े हुए भयानक पराक्रमी राक्षस वहाँ युद्धके लिये आये॥
उन सबने प्रास, पट्टिश, खड्ग, फरसे, गदा, भुशुण्डि, मुद्गर, डंडे, शतघ्नी और परिघ आदि आयुध धारण कर रखे थे॥ १३ ॥
शङ्खोंकी ध्वनिके साथ मिली हुर्इ भेरियोंकी भयानक आवाज सब ओर गूँज उठी। उस तुमुलनादके साथ इन्द्रद्रोही पराक्रमी इन्द्रजितने बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर प्रस्थान किया॥ १४ ॥
जैसे पूर्ण चन्द्रमासे उपलक्षित आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार ऊपर तने हुए शङ्ख और शशिके समान वर्णवाले श्वेत छत्रसे वह शत्रुसूदन इन्द्रजित् सुशोभित हो रहा था॥ १५ ॥
सोनेके आभूषणोंसे विभूषित और समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ उस वीर निशाचरको दोनों ओरसे सुवर्णनिर्मित उत्तम एवं मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे॥ १६ ॥
विशाल सेनासे घिरे हुए अपने पुत्र इन्द्रजित्को प्रस्थान करते देख राक्षसोंके राजा श्रीमान् रावणने उससे कहा— ॥ १७ ॥
‘बेटा! कोर्इ भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके। तुमने देवराज इन्द्रको भी पराजित किया है। फिर आसानीसे जीत लेने योग्य एक मनुष्यको परास्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है? तुम अवश्य ही रघुवंशी रामका वध करोगे’॥ १८ ॥
राक्षसराजके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने उसके उस महान् आशीर्वादको सिर झुकाकर ग्रहण किया। फिर तो जैसे अनुपम तेजस्वी सूर्यसे आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार अप्रतिम शक्तिशाली और सूर्यतुल्य तेजस्वी इन्द्रजित्से लङ्कापुरी सुशोभित होने लगी॥ १९ १/२ ॥
महातेजस्वी शत्रुदमन इन्द्रजित्ने रणभूमिमें पहुँचकर अपने रथके चारों ओर राक्षसोंको खड़ा कर दिया॥ २० १/२ ॥
फिर बीचमें रथसे उतरकर पृथ्वीपर अग्निकी स्थापना करके अग्नितुल्य तेजस्वी उस राक्षसशिरोमणि वीरने चन्दन, फूल तथा लावा आदिके द्वारा अग्निदेवका पूजन किया। उसके बाद उस प्रतापी राक्षसराजने विधिपूर्वक श्रेष्ठ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उस अग्निमें हविष्यकी आहुति दी॥ २१-२२ १/२ ॥
उस समय शस्त्र ही अग्निवेदीके चारों ओर बिछानेके लिये कुश या कासके पत्ते थे। बहेड़ेकी लकड़ीसे ही समिधाका काम लिया गया था। लाल रंगके वस्त्र उपयोगमें लाये गये और उस आभिचारिक यज्ञमें जो स्रुवा था, वह लोहेका बना हुआ था॥ २३ १/२ ॥
उसने वहाँ तोमरसहित शस्त्ररूपी कासके पत्तोंको अग्निके चारों ओर फैलाकर होमके लिये काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़ा॥ २४ १/२ ॥
एक ही बार दी हुई उस आहुतिसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उसमें धूम नहीं दिखायी देता था और आगकी बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। उस समय उस अग्निसे वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो पूर्वकालमें उसे अपनी विजय दिखा चुके थे—युद्धस्थलमें उसको विजयकी प्राप्ति करा चुके थे॥ २५ १/२ ॥
अग्निदेवकी शिखा दक्षिणावर्त दिखायी देने लगी। उनका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर था। इस रूपमें वे स्वयं प्रकट होकर उसके दिये हुए हविष्यको ग्रहण कर रहे थे॥ २६ १/२ ॥
तदनन्तर अस्त्रविद्याविशारद इन्द्रजित्ने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया और अपने धनुष तथा रथ आदि सब वस्तुओंको वहाँ सिद्ध ब्रह्मास्त्रमन्त्रसे अभिमन्त्रित किया॥ २७ १/२ ॥
जब अग्निमें आहुति देकर उसने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया, तब सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह तथा नक्षत्रोंके साथ अन्तरिक्षलोकके सभी प्राणी भयभीत हो गये॥
जिसका तेज अग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था तथा जो देवराज इन्द्रके समान अनुपम प्रभावसे युक्त था; उस अचिन्त्य पराक्रमी इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् धनुष, बाण, रथ, खड्ग, घोड़े और सारथिसहित अपने-आपको आकाशमें अदृश्य कर लिया॥ २९ ॥
इसके बाद वह घोड़े और रथोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राक्षससेनामें गया, जो युद्धकी इच्छासे गर्जना कर रही थी॥ ३० ॥
वे राक्षस दुःसह वेगवाले, सुवर्णभूषित, विचित्र एवं बहुसंख्यक बाणों, तोमरों और अंकुशोंद्वारा रणभूमिमें वानरोंपर प्रहार कर रहे थे॥ ३१ ॥
रावणपुत्र इन्द्रजित् शत्रुओंके प्रति अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ था। उसने निशाचरोंकी ओर देखकर कहा— 'तुमलोग वानरोंको मार डालनेकी इच्छासे हर्ष और उत्साहपूर्वक युद्ध करो'॥ ३२ ॥