भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1991

अतिकायने एक दिव्य कवच बाँध रखा था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे। लक्ष्मणके बाण अतिकायतक पहुँचकर उसके कवचसे टकराते और नोक टूट जानेके कारण सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ९५ ॥

उन बाणोंको असफल हुआ देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महायशस्वी लक्ष्मणने पुनः सहस्रों बाणोंकी वर्षा की॥ ९६ ॥

महाबली अतिकायका कवच अभेद्य था, इसलिये युद्धस्थलमें बाण-समूहोंकी वर्षा होनेपर भी वह राक्षस व्यथित नहीं होता था॥ ९७ ॥

उसने लक्ष्मणपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण चलाया। उस बाणसे सुमित्राकुमारके मर्मस्थलमें चोट पहुँची॥ ९८ ॥

अतः शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण दो घड़ीतक अचेत-अवस्थामें पड़े रहे। फिर होशमें आनेपर उन महाबली शत्रुदमन वीरने बाणोंकी वर्षासे शत्रुके रथकी ध्वजाको नष्ट कर दिया और चार उत्तम सायकोंसे रणभूमिमें उसके घोड़ों तथा सारथिको भी यमलोक पहुँचा दिया॥ ९९-१०० ॥

तत्पश्चात् सम्भ्रमरहित नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसके वधके लिये जाँचे-बूझे हुए बहुत-से अमोघ बाण छोड़े, तथापि वे समराङ्गणमें उस निशाचरके शरीरको वेध न सके॥ १०१ १/२ ॥

तदनन्तर वायुदेवताने उनके पास आकर कहा— 'सुमित्रानन्दन! इस राक्षसको ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हुआ है। यह अभेद्य कवचसे ढका हुआ है। अतः इसको ब्रह्मास्त्रसे विदीर्ण कर डालो; अन्यथा यह नहीं मारा जा सकेगा। यह कवचधारी बलवान् निशाचर अन्य अस्त्रोंके लिये अवध्य है'॥ १०२-१०३ ॥

लक्ष्मण इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने वायुदेवताका उपर्युक्त वचन सुनकर एक भयंकर वेगवाले बाणको सहसा ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर रखा॥ १०४ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणके द्वारा तेज धारवाले उस श्रेष्ठ बाणमें ब्रह्मास्त्रकी संयोजना की जानेपर उस समय सम्पूर्ण दिशाएँ, चन्द्रमा और सूर्य आदि बड़े-बड़े ग्रह तथा अन्तरिक्षलोकके प्राणी थर्रा उठे और भूमण्डलमें महान् कोलाहल मच गया॥ १०५ ॥