भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1992

सुमित्राकुमारने धनुषपर रखे हुए उस सुन्दर पंखवाले बाणको जब ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किया, तब वह यमदूतके समान भयंकर और वज्रके समान अमोघ हो गया। उन्होंने युद्धस्थलमें उस बाणको इन्द्रद्रोही रावणके बेटे अतिकायको लक्ष्य करके चला दिया॥ १०६ ॥

लक्ष्मणके चलाये हुए उस बाणका वेग बहुत बढ़ा हुआ था। उसके पंख गरुड़के समान थे और उनमें हीरे जड़े हुए थे; इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। अतिकायने समराङ्गणमें उस बाणको उस समय वायुके समान भयंकर वेगसे अपनी ओर आते देखा॥ १०७ ॥

उसे देखकर अतिकायने सहसा उसके ऊपर बहुत-से पैने बाण चलाये तो भी वह गरुड़के समान वेगशाली सायक बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचा॥

प्रलयङ्कर कालके समान प्रज्वलित हुए उस बाणको अत्यन्त निकट आया देखकर भी अतिकायकी युद्धविषयक चेष्टा नष्ट नहीं हुई। उसने शक्ति, ऋष्टि, गदा, कुठार, शूल तथा बाणोंद्वारा उसे नष्ट करनेका प्रयत्न किया॥ १०९ ॥

परंतु अग्निके समान प्रज्वलित हुए उस बाणने उन अद्भुत अस्त्रोंको व्यर्थ करके अतिकायके मुकुटमण्डित मस्तकको धड़से अलग कर दिया॥ ११० ॥

लक्ष्मणके बाणसे कटा हुआ राक्षसका वह शिरस्त्राणसहित मस्तक हिमालयके शिखरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर जा पड़ा॥ १११ ॥

उसके वस्त्र और आभूषण सब ओर बिखर गये। उसे धरतीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए समस्त निशाचर व्यथित हो उठे॥ ११२ ॥

उनके मुखपर विषाद छा गया। उनपर जो मार पड़ी थी, उससे थक जानेके कारण वे और भी दुःखी हो गये थे। अतः वे बहुसंख्यक राक्षस सहसा विकृत स्वरमें जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगे॥ ११३ ॥

सेनानायकके मारे जानेपर निशाचरोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया, अतः वे भयभीत हो तुरंत ही लङ्कापुरीकी ओर भाग चले॥ ११४ ॥

इधर उस भयंकर बलशाली दुर्जय शत्रुके मारे जानेपर बहुसंख्यक वानर हर्ष और उत्साहसे भर गये। उनके मुख प्रफुल्ल कमलोंके समान खिल उठे और वे अभीष्ट विजयके भागी वीरवर लक्ष्मणकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ११५ ॥