भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1990, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1990

अतिकायके उस बाणकी चोट खाकर सुमित्राकुमार युद्धस्थलमें अपने वक्षःस्थलसे तीव्रगतिसे रक्त बहाने लगे, मानो कोऽइ मतवाला हाथी मस्तकसे मदकी वर्षा कर रहा हो॥ ८२ ॥

फिर सामर्थ्यशाली लक्ष्मणने सहसा अपनी छातीसे उस बाणको निकाल दिया और एक तीखा सायक हाथमें लेकर उसे दिव्यास्त्रसे संयोजित किया॥ ८३ ॥

उस समय अपने उस सायकको उन्होंने आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित होते ही महात्मा लक्ष्मणके धनुषपर रखा हुआ वह बाण तत्काल प्रज्वलित हो उठा॥ ८४ ॥

उधर अत्यन्त तेजस्वी अतिकायने भी रौद्रास्त्रको एक सुवर्णमय पंखवाले सर्पाकार बाणपर समायोजित किया॥ ८५ ॥

इतनेहीमें लक्ष्मणने दिव्यास्त्रकी शक्तिसे सम्पन्न उस प्रज्वलित एवं भयंकर बाणको अतिकायके ऊपर चलाया, मानो यमराजने अपने कालदण्डका प्रयोग किया हो॥ ८६ ॥

आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित हुए उस बाणको अपनी ओर आते देख निशाचर अतिकायने तत्काल ही अपने भयंकर बाणको सूर्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया॥ ८७ ॥

उन दोनों सायकोंके अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। आकाशमें पहुँचकर वे दोनों कुपित हुए दो सर्पोंकी भाँति आपसमें टकरा गये और एक-दूसरेको दग्ध करके पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८८-८९ ॥

वे दोनों ही बाण उत्तम कोटिके थे और अपनी दीप्तिसे प्रकाशित हो रहे थे, तथापि एक-दूसरेके तेजसे भस्म होकर अपना-अपना तेज खो बैठे। इसलिये भूतलपर निष्प्रभ होनेके कारण उनकी शोभा नहीं हो रही थी॥

तदनन्तर अतिकायने अत्यन्त कुपित हो त्वष्टा देवताके मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके एक सींकका बाण छोड़ा; परंतु पराक्रमी लक्ष्मणने उस अस्त्रको ऐन्द्रास्त्रसे काट दिया॥ ९१ ॥

सींकके बाणको नष्ट हुआ देख रावणपुत्र कुमार अतिकायके क्रोधकी सीमा न रही। उस राक्षसने एक सायकको याम्यास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया; परंतु लक्ष्मणने वायव्यास्त्रद्वारा उसको भी नष्ट कर दिया॥ ९२-९३ ॥

तत्पश्चात् जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार अत्यन्त कुपित हुए लक्ष्मणने रावणकुमार अतिकायपर बाणधाराकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ९४ ॥