भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1994

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बहत्तरवाँ सर्ग

रावणकी चिन्ता तथा उसका राक्षसोंको पुरीकी रक्षाके लिये सावधान रहनेका आदेश

महात्मा लक्ष्मणके द्वारा अतिकायको मारा गया सुनकर राजा रावण उद्विग्न हो उठा और इस प्रकार बोला—॥ १ ॥

‘अत्यन्त अमर्षशील धूम्राक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अकम्पन, प्रहस्त तथा कुम्भकर्ण—ये महाबली वीर राक्षस सदा युद्धकी अभिलाषा रखते थे। ये सब-के-सब शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाते और स्वयं विपक्षियोंसे कभी पराजित नहीं होते थे॥ २-३ ॥

‘परंतु अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रामने नाना प्रकारके शस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण उन विशालकाय वीर राक्षसोंका सेनासहित संहार कर डाला॥ ४ ॥

‘और भी बहुत-से महामनस्वी शूरवीर राक्षस उनके द्वारा मार गिराये गये। जिसके बल और पराक्रम सर्वत्र विख्यात हैं, उस मेरे बेटे इन्द्रजित्ने उन दोनों भाइयोंको वरदानप्राप्त घोर नागस्वरूप बाणोंसे बाँध लिया था। वह घोर बन्धन समस्त देवता और महाबली असुर भी नहीं खोल सकते थे। यक्ष, गन्धर्व और नागोंके लिये भी उस बन्धनसे छुटकारा दिलाना असम्भव था, तो भी ये दोनों भाई राम और लक्ष्मण उस बाण-बन्धनसे मुक्त हो गये। न जाने कौन-सा प्रभाव था, कैसी माया थी अथवा किस तरहकी मोहिनी ओषधि आदिका प्रयोग किया गया था, जिससे वे उस बन्धनसे छूट गये॥ ५—७ १/२ ॥

‘मेरी आज्ञासे जो-जो शूरवीर योद्धा राक्षस युद्धके लिये निकले, उन सबको समराङ्गणमें महाबली वानरोंने मार डाला॥ ८ १/२ ॥

‘मैं आज ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें लक्ष्मणसहित रामको और सेना तथा सुग्रीवसहित वीर विभीषणको नष्ट कर दे॥ ९ १/२ ॥

‘अहो! राम बड़े बलवान् हैं, निश्चय ही उनका अस्त्र-बल महान् है; जिनके बल-विक्रमका सामना करके असंख्य राक्षस कालके गालमें चले गये॥ १० १/२ ॥

‘मैं उन वीर रघुनाथको रोग-शोकसे रहित साक्षात् नारायणरूप मानता हूँ; क्योंकि उन्हींके भयसे लङ्कापुरीके सभी दरवाजे और सदर फाटक सदा बंद रहते हैं॥ ११ १/२ ॥