श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘राक्षसो! तुमलोग हर समय सावधान रहकर सैनिकोंसहित इस पुरीकी और जहाँ सीता रखी गयी हैं, उस अशोक-शिविर वाटिकाकी भी विशेषरूपसे रक्षा करो॥ १२ १/२ ॥
‘अशोक-वाटिकामें कब कौन प्रवेश करता है और कब वहाँसे बाहर निकलता है, इसकी हमें सदा ही जानकारी रखनी चाहिये। जहाँ-जहाँ सैनिकोंके शिविर हों, वहाँ बारम्बार देखभाल करना, सब ओर अपने-अपने सैनिकोंके साथ पहरेपर रहना॥ १३-१४ ॥
‘निशाचरो! प्रदोषकाल, आधी रात तथा प्रातःकालमें भी सर्वथा वानरोंके आने-जानेपर दृष्टि रखना॥ १५ ॥
‘वानरोंकी ओरसे कभी उपेक्षाभाव नहीं रखना चाहिये और सदा इस बातपर दृष्टि रखनी चाहिये कि शत्रुओंकी सेना युद्धके लिये उद्यमशील तो नहीं है? आक्रमण तो नहीं कर रही है अथवा पूर्ववत् जहाँ-कीतहाँ खड़ी है न?’॥ १६ ॥
लङ्कापतिका यह आदेश सुनकर समस्त महाबली राक्षस उन सारी बातोंका यथावत् रूपसे पालन करने लगे॥ १७ ॥
उन सबको पूर्वोक्त आदेश देकर राक्षसराज रावण अपने हृदयमें चुभे हुए दुःख और क्रोधरूपी काँटेकी पीड़ाका भार वहन करता हुआ दीनभावसे अपने महलमें गया॥ १८ ॥
महाबली निशाचरराज रावणकी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। वह अपने पुत्रकी उस मृत्युको ही याद करके उस समय बारम्बार लंबी साँस खींच रहा था॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२ ॥