श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ बीसवाँ सर्ग
एक सौ बीसवाँ सर्ग
श्रीरामके अनुरोधसे इन्द्रका मरे हुए वानरोंको जीवित करना, देवताओंका प्रस्थान और वानरसेनाका विश्राम
महाराज दशरथके लौट जानेपर पाकशासन इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़े खड़े हुए श्रीरघुनाथजीसे कहा— ॥ १ ॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुमपर बहुत प्रसन्न हैं। इसलिये तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह मुझसे कहो’॥
महात्मा इन्द्रने जब प्रसन्न होकर ऐसी बात कही, तब श्रीरघुनाथजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हर्षसे भरकर कहा— ॥ ३ ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक प्रार्थना करूँगा। आप मेरी उस प्रार्थनाको सफल करें॥ ४ ॥
‘मेरे लिये युद्धमें पराक्रम करके जो यमलोकको चले गये हैं, वे सब वानर नया जीवन पाकर उठ खड़े हों॥ ५ ॥
‘मानद! जो वानर मेरे लिये अपने स्त्री-पुत्रोंसे बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं प्रसन्नचित्त देखना चाहता हूँ॥ ६ ॥
‘पुरंदर! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्युको कुछ भी नहीं गिनते थे। उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयत्न किया है और अन्तमें कालके गालमें चले गये हैं। आप उन सबको जीवित कर दें॥ ७ ॥
‘जो वानर सदा मेरा प्रिय करनेमें लगे रहते थे और मौतको कुछ नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपासे फिर मुझसे मिलें—यह वर मैं चाहता हूँ॥ ८ ॥
‘दूसरोंको मान देनेवाले देवराज! मैं उन वानर, लंगूर और भालुओंको नीरोग, व्रणहीन और बल-पौरुषसे सम्पन्न देखना चाहता हूँ॥ ९ ॥
‘ये वानर जिस स्थानपर रहें, वहाँ असमयमें भी फल-मूल और पुष्पोंकी भरमार रहे तथा निर्मल जलवाली नदियाँ बहती रहें’॥ १० ॥
महात्मा श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर महेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक यों उत्तर दिया—॥ ११ ॥
‘तात! रघुवंशविभूषण! आपने जो वर माँगा है, यह बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरहकी बात नहीं की है; इसलिये यह वर अवश्य सफल होगा॥ १२ ॥
‘जो युद्धमें मारे गये हैं और राक्षसोंने जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठें॥ १३ ॥
‘नींद टूटनेपर सोकर उठे हुए मनुष्योंकी भाँति वे सभी वानर नीरोग, व्रणहीन तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न होकर उठ बैठेंगे॥ १४ ॥
‘सभी परमानन्दसे युक्त हो अपने सुहृदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा स्वजनोंसे मिलेंगे॥ १५ ॥
‘महाधनुर्धर वीर! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमयमें भी वृक्ष फल-फूलोंसे लद जायँगे और नदियाँ जलसे भरी रहेंगी’॥ १६ ॥
इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अङ्ग पहले घावोंसे भरे थे, उस समय घावरहित हो गये और सभी सोकर जगे हुएकी भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये॥ १७ ॥
उन्हें इस प्रकार जीवित होते देख सब वानर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि यह क्या बात हो गयी? श्रीरामचन्द्रजीको सफलमनोरथ हुआ देख समस्त श्रेष्ठ देवता अत्यन्त प्रसन्न हो लक्ष्मणसहित श्रीरामकी स्तुति करके बोले—‘राजन्! अब आप यहाँसे अयोध्याको पधारें और समस्त वानरोंको बिदा कर दें॥ १८-१९ ॥
‘ये मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता सदा आपमें अनुराग रखती हैं। इन्हें सान्त्वना दीजिये और भाई भरत आपके शोकसे पीड़ित हो व्रत कर रहे हैं, अतः उनसे जाकर मिलिये॥ २० ॥
‘परंतप! आप महात्मा शत्रुघ्नसे और समस्त माताओंसे भी जाकर मिलें, अपना अभिषेक करावें और पुरवासियोंको हर्ष प्रदान करें’॥ २१ ॥
श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर देवराज इन्द्र सब देवताओंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको चले गये॥ २२ ॥
उन समस्त श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने सबको विश्राम करनेकी आज्ञा दी॥ २३ ॥
श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सुरक्षित तथा हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंसे भरी हुई वह यशस्विनी विशाल सेना चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्रकाशित होनेवाली रात्रिके समान अद्भुत शोभासे उद्भासित होती हुई विराज रही थी॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२० ॥
एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग
एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग
श्रीरामका अयोध्या जानेके लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञासे विभीषणका पुष्पकविमानको मँगाना
उस रात्रिको विश्राम करके जब शत्रुसूदन श्रीराम दूसरे दिन प्रातःकाल सुखपूर्वक उठे, तब कुशल-प्रश्नके पश्चात् विभीषणने हाथ जोड़कर कहा—॥ १ ॥
‘रघुनन्दन! स्नानके लिये जल, अङ्गराग, वस्त्र, आभूषण, चन्दन और भाँति-भाँतिकी दिव्य मालाएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं॥ २ ॥
‘रघुवीर! शृङ्गारकलाको जाननेवाली ये कमलनयनी नारियाँ भी सेवाके लिये प्रस्तुत हैं, जो आपको विधिपूर्वक स्नान करायेंगी’॥ ३ ॥
विभीषणके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—‘मित्र! तुम सुग्रीव आदि वानरवीरोंसे स्नानके लिये अनुरोध करो॥ ४ ॥
‘मेरे लिये तो इस समय सत्यका आश्रय लेनेवाले धर्मात्मा महाबाहु भरत बहुत कष्ट सह रहे हैं। वे सुकुमार हैं और सुख पानेके योग्य हैं॥ ५ ॥
‘उन धर्मपरायण कैकेयीकुमार भरतसे मिले बिना न तो मुझे स्नान अच्छा लगता है, न वस्त्र और आभूषणोंको धारण करना ही॥ ६ ॥
‘अब तो तुम इस बातकी ओर ध्यान दो कि हम किस तरह जल्दी-से-जल्दी अयोध्यापुरीको लौट सकेंगे; क्योंकि वहाँतक पैदल यात्रा करनेवालेके लिये यह मार्ग बहुत ही दुर्गम है’॥ ७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर विभीषणने श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘राजकुमार! आप इसके लिये चिन्तित न हों। मैं एक ही दिनमें आपको उस पुरीमें पहुँचा दूँगा॥ ८ ॥
‘आपका कल्याण हो। मेरे यहाँ मेरे बड़े भार्ऽइ कुबेरका सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान मौजूद है, जिसे महाबली रावणने संग्राममें कुबेरको हराकर छीन लिया था। अतुल पराक्रमी श्रीराम! वह इच्छानुसार चलनेवाला, दिव्य एवं उत्तम विमान मैंने यहाँ आपहीके लिये रख छोड़ा है॥ ९-१० ॥
‘मेघ-जैसा दिखायी देनेवाला वह दिव्य विमान यहाँ विद्यमान है, जिसके द्वारा निश्चिन्त होकर आप अयोध्यापुरीको जा सकेंगे॥ ११ ॥
‘श्रीराम! यदि मुझे आप अपना कृपापात्र समझते हैं, मुझमें कुछ गुण देखते या मानते हैं और मेरे प्रति आपका सौहार्द है तो अभी भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताजीके साथ कुछ दिन यहीं विराजिये। मैं सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा आपका सत्कार करूँगा। मेरे उस सत्कारको ग्रहण कर लेनेके पश्चात् अयोध्याको पधारियेगा॥ १२-१३ ॥
‘रघुनन्दन! मैं प्रसन्नतापूर्वक आपका सत्कार करना चाहता हूँ। मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये उस सत्कारको आप सुहृदों तथा सेनाओंके साथ ग्रहण करें॥ १४ ॥
‘रघुवीर! मैं केवल प्रेम, सम्मान और सौहार्दके कारण ही आपसे यह प्रार्थना कर रहा हूँ। आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं आपका सेवक हूँ। इसलिये आपसे विनय करता हूँ, आपको आज्ञा नहीं देता हूँ’॥ १५ ॥
जब विभीषणने ऐसी बात कही, तब श्रीराम समस्त राक्षसों और वानरोंके सुनते हुए ही उनसे बोले— ॥ १६ ॥
‘वीर! मेरे परम सुहृद् और उत्तम सचिव बनकर तुमने सब प्रकारकी चेष्टाओंद्वारा मेरा सम्मान और पूजन किया है॥ १७ ॥
‘राक्षसेश्वर! तुम्हारी इस बातको मैं निश्चय ही अस्वीकार नहीं कर सकता हूँ; परंतु इस समय मेरा मन अपने उन भाई भरतको देखनेके लिये उतावला हो उठा है, जो मुझे लौटा ले जानेके लिये चित्रकूटतक आये थे और मेरे चरणोंमें सिर झुकाकर याचना करनेपर भी जिनकी बात मैंने नहीं मानी थी॥ १८-१९ ॥
‘उनके सिवा माता कौसल्या, सुमित्रा, यशस्विनी कैकेयी, मित्रवर गुह और नगर एवं जनपदके लोगोंको देखनेके लिये भी मुझे बड़ी उत्कण्ठा हो रही है॥ २० ॥
‘सौम्य विभीषण! अब तो तुम मुझे जानेकी ही अनुमति दो। मैं तुम्हारे द्वारा बहुत सम्मानित हो चुका हूँ। सखे! मेरे इस हठके कारण मुझपर क्रोध न करना। इसके लिये मैं तुमसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ॥ २१ ॥
‘राक्षसराज! अब शीघ्र मेरे लिये पुष्पकविमानको यहाँ मँगाओ। जब मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया, तब यहाँ ठहरना मेरे लिये कैसे ठीक हो सकता है?’॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर राक्षसराज विभीषणने बड़ी उतावलीके साथ उस सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानका आवाहन किया॥ २३ ॥
उस विमानका एक-एक अङ्ग सोनेसे जड़ा हुआ था, जिससे उसकी विचित्र शोभा होती थी। उसके भीतर वैदूर्य मणि (नीलम)-की वेदियाँ थीं, जहाँ-तहाँ गुप्त गृह बने हुए थे और वह सब ओर चाँदीके समान चमकीला था॥ २४ ॥
वह श्वेत-पीत वर्णवाली पताकाओं तथा ध्वजोंसे अलंकृत था। उसमें सोनेके कमलोंसे सुसज्जित स्वर्णमयी अट्टालिकाएँ थीं, जो उस विमानकी शोभा बढ़ाती थीं॥
सारा विमान छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे व्याप्त था। उसमें मोती और मणियोंकी खिड़कियाँ लगी थीं। सब ओर घंटे बँधे थे, जिससे मधुर ध्वनि होती रहती थी॥ २६ ॥
वह विश्वकर्माका बनाया हुआ विमान सुमेरु-शिखरके समान ऊँचा तथा मोती और चाँदीसे सुसज्जित बड़े-बड़े कमरोंसे विभूषित था॥ २७ ॥
उसकी फर्श विचित्र स्फटिकमणिसे जड़ी हुई थी। उसमें नीलमके बहुमूल्य सिंहासन थे, जिनपर महामूल्यवान् बिस्तर बिछे हुए थे॥ २८ ॥
उसका मनके समान वेग था और उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह विमान सेवामें उपस्थित हुआ। विभीषण श्रीरामको उसके आनेकी सूचना देकर वहाँ खड़े हो गये॥ २९ ॥
पर्वतके समान ऊँचे और इच्छानुसार चलनेवाले उस पुष्पकविमानको तत्काल उपस्थित देख लक्ष्मणसहित उदारचेता भगवान् श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२१ ॥
एक सौ बाईसवाँ सर्ग
एक सौ बाईसवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणद्वारा वानरोंका विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषणसहित वानरोंको साथ लेकर श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान करना
फूलोंसे सजे हुए पुष्पकविमानको वहाँ उपस्थित करके पास ही खड़े हुए विभीषणने श्रीरामसे कुछ कहनेका विचार किया॥ १ ॥
राक्षसराज विभीषणने दोनों हाथ जोड़कर बड़ी विनय और उतावलीके साथ श्रीरघुनाथजीसे पूछा— ‘प्रभो! अब मैं क्या सेवा करूँ?’॥ २ ॥
तब महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने कुछ सोचकर लक्ष्मणके सुनते हुए यह स्नेहयुक्त वचन कहा— ॥ ३ ॥
‘विभीषण! इन सारे वानरोंने युद्धमें बड़ा यन्त एवं परिश्रम किया है; अतः तुम नाना प्रकारके रत्न और धन आदिके द्वारा इन सबका सत्कार करो॥ ४ ॥
‘राक्षसेश्वर! ये वीर वानर संग्रामसे कभी पीछे नहीं हटते हैं और सदा हर्ष एवं उत्साहसे भरे रहते हैं। प्राणोंका भय छोड़कर लड़नेवाले इन वानरोंके सहयोगसे तुमने लङ्कापर विजय पायी है॥ ५ ॥
‘ये सभी वानर इस समय अपना काम पूरा कर चुके हैं, अतः इन्हें रत्न और धन आदि देकर तुम इनके इस कर्मको सफल करो॥ ६ ॥
‘तुम कृतज्ञ होकर जब इनका इस प्रकार सम्मान और अभिनन्दन करोगे, तब ये वानरयूथपति बहुत संतुष्ट होंगे॥ ७ ॥
‘ऐसा करनेसे सब लोग यह जानेंगे कि विभीषण उचित अवसरपर धनका त्याग एवं दान करते हैं, यथासमय न्यायोचित रीतिसे धन और रत्न आदिका संग्रह करते रहते हैं, दयालु हैं और जितेन्द्रिय हैं; इसलिये तुम्हें ऐसा करनेके लिये समझा रहा हूँ॥ ८ ॥
‘नरेश्वर! जो राजा सेवकोंमें प्रेम उत्पन्न करनेवाले दान-मान आदि सब गुणोंसे रहित होता है, उसे युद्धके अवसरपर उद्विग्न हुई सेना छोड़कर चल देती है, वह समझती है कि यह व्यर्थ ही हमारा वध करा रहा है— हमारे भरण-पोषणका या योग-क्षेमकी चिन्ता इसे बिलकुल नहीं है’॥ ९ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषणने उन सब वानरोंको रत्न और धन देकर सभीका पूजन (सत्कार) किया॥ १० ॥
उन वानरयूथपतियोंको रत्न और धनसे पूजित हुआ देख उस समय भगवान् श्रीराम लजाती हुई मनस्विनी विदेहकुमारीको अङ्कमें लेकर पराक्रमी धनुर्धर बन्धु लक्ष्मणके साथ उस उत्तम विमानपर आरूढ हुए॥
विमानपर बैठकर समस्त वानरोंका समादर करते हुए उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने विभीषणसहित महापराक्रमी सुग्रीवसे कहा—॥ १३ ॥
‘वानरश्रेष्ठ वीरो! आपलोगोंने अपने इस मित्रका कार्य मित्रोचित रीतिसे ही भलीभाँति सम्पन्न किया। अब आप सब अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको चले जायँ॥
‘सखे सुग्रीव! एक हितैषी एवं प्रेमी मित्रको जो काम करना चाहिये, वह सब तुमने पूरा-पूरा कर दिखाया; क्योंकि तुम अधर्मसे डरनेवाले हो॥ १५ ॥
‘वानरराज! अब तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र ही किष्किन्धापुरीको चले जाओ। विभीषण! तुम भी लङ्कामें मेरे दिये हुए अपने राज्यपर स्थिर रहो; अब इन्द्र आदि देवता भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं॥ १६ ॥
‘अब इस समय मैं अपने पिताकी राजधानी अयोध्याको जाऊँगा। इसके लिये आप सब लोगोंसे पूछता हूँ और सबकी अनुमति चाहता हूँ’॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी वानर-सेनापति तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर कहने लगे—॥
‘भगवन्! हम भी अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, आप हमें भी अपने साथ ले चलिये। वहाँ हम प्रसन्नतापूर्वक वनों और उपवनोंमें विचरेंगे॥ १९ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! राज्याभिषेकके समय मन्त्रपूत जलसे भीगे हुए आपके श्रीविग्रहकी झाँकी करके माता कौसल्याके चरणोंमें मस्तक झुकाकर हम शीघ्र अपने घर लौट आयेंगे’॥ २० ॥
विभीषणसहित वानरोंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर श्रीरामने सुग्रीव तथा विभीषणसहित उन वानरोंसे कहा—॥ २१ ॥
‘मित्रो! यह तो मेरे लिये प्रियसे भी प्रिय बात होगी—परम प्रिय वस्तुका लाभ होगा, यदि मैं आप सभी सुहृदोंके साथ अयोध्यापुरीको चल सकूँ। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी॥
२२ ॥
‘सुग्रीव! तुम सब वानरोंके साथ शीघ्र ही इस विमानपर चढ़ जाओ। राक्षसराज विभीषण! तुम भी मन्त्रियोंके साथ विमानपर आरूढ़ हो जाओ’॥ २३ ॥
तब वानरोंसहित सुग्रीव और मन्त्रियोंसहित विभीषण बड़ी प्रसन्नताके साथ उस दिव्य पुष्पकविमानपर चढ़ गये॥ २४ ॥
उन सबके चढ़ जानेपर कुबेरका वह उत्तम आसन पुष्पकविमान श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर आकाशको उड़ चला॥ २५ ॥
आकाशमें पहुँचे हुए उस हंसयुक्त तेजस्वी विमानसे यात्रा करते हुए पुलकित एवं प्रसन्नचित्त श्रीराम साक्षात् कुबेरके समान शोभा पा रहे थे॥ २६ ॥
वे सब वानर, भालू और महाबली राक्षस उस दिव्य विमानमें बड़े सुखसे फैलकर बैठे हुए थे। किसीको किसीसे धक्का नहीं खाना पड़ता था॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ सर्ग
एक सौ तेईसवाँ सर्ग
अयोध्याकी यात्रा करते समय श्रीरामका सीताजीको मार्गके स्थान दिखाना
श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह हंसयुक्त उत्तम विमान महान् शब्द करता हुआ आकाशमें उड़ने लगा॥ १ ॥
उस समय रघुकुलनन्दन श्रीरामने सब ओर दृष्टि डालकर चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली मिथिलेश-कुमारी सीतासे कहा— ॥ २ ॥
‘विदेहराजनन्दिनि! कैलास-शिखरके समान सुन्दर त्रिकूट पर्वतके विशाल शृङ्गपर बसी हुई विश्वकर्माकी बनायी लङ्कापुरीको देखो, कैसी सुन्दर दिखायी देती है!॥
‘इधर इस युद्धभूमिको देखो। यहाँ रक्त और मांसकी कीच जमी हुई है। सीते! इस युद्धक्षेत्रमें वानरों और राक्षसोंका महान् संहार हुआ है॥ ४ ॥
‘विशाललोचने! यह राक्षसराज रावण राखका ढेर बनकर सो रहा है। यह बड़ा भारी हिंसक था और इसे ब्रह्माजीने वरदान दे रखा था; किंतु तुम्हारे लिये मैंने इसका वध कर डाला है॥ ५ ॥
‘यहींपर मैंने कुम्भकर्णको मारा था, यहीं निशाचर प्रहस्त मारा गया है और इसी समराङ्गणमें वानरवीर हनुमान्ने धूम्राक्षका वध किया है॥ ६ ॥
‘यहीं महामना सुषेणने विद्युन्मालीको मारा था और इसी रणभूमिमें लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजित्का संहार किया था॥ ७ ॥
‘यहीं अङ्गदने विकट नामक राक्षसका वध किया था। जिसकी ओर देखना भी कठिन था, वह विरूपाक्ष तथा महापार्श्व और महोदर भी यहीं मारे गये हैं॥ ८ ॥
‘अकम्पन तथा दूसरे बलवान् राक्षस यहीं मौतके घाट उतारे गये थे। त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी यहीं मार डाले गये थे॥ ९ ॥
‘युद्धोन्मत्त और मत्त—ये दोनों श्रेष्ठ राक्षस तथा बलवान् कुम्भ और निकुम्भ—ये कुम्भकर्णके दोनों पुत्र भी यहीं मृत्युको प्राप्त हुए॥ १० ॥
‘वज्रदंष्ट्र और दंष्ट्र आदि बहुत-से राक्षस यहीं कालके ग्रास बन गये। दुर्धर्ष वीर मकराक्षको इसी युद्धस्थलमें मैंने मार गिराया था॥ ११ ॥
‘अकम्पन और पराक्रमी शोणिताक्षका भी यहीं काम तमाम हुआ था। यूपाक्ष और प्रजङ्घ भी इसी महासमरमें मारे गये थे॥ १२ ॥
‘जिसकी ओर देखनेसे भी भय होता था, वह राक्षस विद्युज्जिह्व यहीं मौतका ग्रास बन गया। यज्ञशत्रु और महाबली सुप्तघ्नको भी यहीं मारा गया था॥ १३ ॥
‘सूर्यशत्रु और ब्रह्मशत्रु नामक निशाचरोंका भी यहीं वध किया गया था। यहीं रावणकी भार्या मन्दोदरीने उसके लिये विलाप किया था। उस समय वह अपनी हजारोंसे भी अधिक सौतोंसे घिरी हुई थी॥ १४ १/२ ॥
‘सुमुखि! यह समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जहाँ समुद्रको पार करके हमलोगोंने वह रात बितायी थी॥ १५ १/२ ॥
‘विशाललोचने! खारे पानीके समुद्रमें यह मेरा बँधवाया हुआ पुल है, जो नलसेतुके नामसे विख्यात है। देवि! तुम्हारे लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर सेतु बाँधा गया था॥ १६ १/२ ॥
‘विदेहनन्दिनि! इस अक्षोभ्य वरुणालय समुद्रको तो देखो, जो अपार-सा दिखायी देता है। शङ्ख और सीपियोंसे भरा हुआ यह सागर कैसी गर्जना कर रहा है॥ १७ १/२ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! इस सुवर्णमय पर्वतराज हिरण्यनाभको तो देखो, जो हनुमान्जीको विश्राम देनेके लिये समुद्रकी जलराशिको चीरकर ऊपरको उठ गया था॥ १८ १/२ ॥
‘यह समुद्रके उदरमें ही विशाल टापू है, जहाँ मैंने सेनाका पड़ाव डाला था। यहीं पूर्वकालमें भगवान् महादेवने मुझपर कृपा की थी—सेतु बाँधनेसे पहले मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे॥ १९ १/२ ॥
‘इस पुण्यस्थलमें विशालकाय समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जो सेतुनिर्माणका मूलप्रदेश होनेके कारण सेतुबन्ध नामसे विख्यात तथा तीनों लोकोंद्वारा पूजित होगा॥ २० १/२ ॥
‘यह तीर्थ परम पवित्र और महान् पातकोंका नाश करनेवाला होगा। यहीं ये राक्षसराज विभीषण आकर मुझसे मिले थे॥ २१ १/२ ॥
‘सीते! यह विचित्र वनप्रान्तसे सुशोभित किष्किन्धा दिखायी देती है, जो वानरराज सुग्रीवकी सुरम्य नगरी है। यहीं मैंने वालीका वध किया था’॥ २२ १/२ ॥
तदनन्तर वालिपालित किष्किन्धापुरीका दर्शन करके सीताने प्रेमसे विह्वल हो श्रीरामसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २३ १/२ ॥
‘महाराज! मैं सुग्रीवकी तारा आदि प्रिय भार्याओं तथा अन्य वानरेश्वरोंकी स्त्रियोंको साथ लेकर आपके साथ अपनी राजधानी अयोध्यामें चलना चाहती हूँ,’*॥
विदेहनन्दिनी सीताके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा— ‘ऐसा ही हो।’ फिर किष्किन्धामें पहुँचनेपर उन्होंने विमान ठहराया और सुग्रीवकी ओर देखकर कहा— ॥ २६ १/२ ॥
‘वानरश्रेष्ठ! तुम समस्त वानरयूथपतियोंसे कहो कि वे सब लोग अपनी-अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर सीताके साथ अयोध्या चलें तथा महाबली वानरराज सुग्रीव! तुम भी अपनी सब स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो, जिससे हम सब लोग जल्दी वहाँ पहुँचें’॥ २७-२८ १/२ ॥
अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर उन सब वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही अन्तःपुरमें प्रवेश करके तारासे भेंट की और इस प्रकार कहा— ॥ २९-३० ॥
‘प्रिये! तुम मिथिलेशकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाके अनुसार सभी प्रधान-प्रधान महात्मा वानरोंकी स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो। हमलोग इन वानर-पत्नियोंको साथ लेकर चलेंगे और उन्हें अयोध्यापुरी तथा महाराज दशरथकी सब रानियोंका दर्शन करायेंगे’॥ ३१-३२ ॥
सुग्रीवकी यह बात सुनकर सर्वाङ्गसुन्दरी ताराने समस्त वानर-पत्नियोंको बुलाकर कहा— ॥ ३३ ॥
‘सखियो! सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार तुम सब लोग अपने पतियों— समस्त वानरोंके साथ अयोध्या चलनेके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ। अयोध्याका दर्शन करके तुमलोग मेरा भी प्रिय कार्य करोगी। वहाँ पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंके साथ श्रीरामका जो अपने नगरमें प्रवेश होगा, वह उत्सव हमें देखनेको मिलेगा। हम वहाँ महाराज दशरथकी समस्त रानियोंके वैभवका भी दर्शन करेंगी’॥ ३४-३५ ॥
ताराकी यह आज्ञा पाकर सारी वानर-पत्नियोंने शृङ्गार करके उस विमानकी परिक्रमा की और सीताजीके दर्शनकी इच्छासे वे उसपर चढ़ गयीं॥ ३६ १/२ ॥
उन सबके साथ विमानको शीघ्र ही ऊपर उठा देख श्रीरघुनाथजीने ऋष्यमूकके निकट आनेपर पुनः विदेहनन्दिनीसे कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
‘सीते! वह जो बिजलीसहित मेघके समान सुवर्णमय धातुओंसे युक्त श्रेष्ठ एवं महान् पर्वत दिखायी देता है, उसका नाम ऋष्यमूक है॥ ३८ १/२ ॥
‘सीते! यहीं मैं वानरराज सुग्रीवसे मिला था और मित्रता करनेके पश्चात् वालीका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की थी॥ ३९ १/२ ॥
‘यही वह पम्पा नामक पुष्करिणी है, जो तटवर्ती विचित्र काननोंसे सुशोभित हो रही है। यहाँ तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त दुःखी होकर मैंने विलाप किया था॥
‘इसी पम्पाके तटपर मुझे धर्मपरायणा शबरीका दर्शन हुआ था। इधर वह स्थान है, जहाँ एक योजन लम्बी भुजावाले कबन्ध नामक असुरका मैंने वध किया था॥
‘विलासशालिनी सीते! जनस्थानमें वह शोभाशाली विशाल वृक्ष दिखायी दे रहा है, जहाँ बलवान् एवं महातेजस्वी पक्षिप्रवर जटायु तुम्हारी रक्षा करनेके कारण रावणके हाथसे मारे गये थे॥ ४२-४३ ॥
‘यह वह स्थान है, जहाँ मेरे सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा खर मारा गया, दूषण धराशायी किया गया और महापराक्रमी त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया गया॥ ४४ ॥
‘वरवर्णिनि! शुभदर्शने! यह हमलोगोंका आश्रम है तथा वह विचित्र पर्णशाला दिखायी देती है, जहाँ आकर राक्षसराज रावणने बलपूर्वक तुम्हारा अपहरण किया था॥
‘यह स्वच्छ जलराशिसे सुशोभित मङ्गलमयी रमणीय गोदावरी नदी है तथा वह केलेके कुञ्जोंसे घिरा हुआ महर्षि अगस्त्यका आश्रम दिखायी देता है॥ ४६ १/२ ॥
‘यह महात्मा सुतीक्ष्णका दीप्तिमान् आश्रम है और विदेहनन्दिनि! वह शरभङ्ग मुनिका महान् आश्रम दिखायी देता है, जहाँ सहस्रनेत्रधारी पुरंदर इन्द्र पधारे थे॥
‘यह वह स्थान है, जहाँ मैंने विशालकाय विराधका वध किया था। देवि! तनुमध्यमे! ये वे तापस दिखायी देते हैं, जिनका दर्शन हमलोगोंने पहले किया था॥ ४९ ॥
‘सीते! इस तापसाश्रमपर ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कुलपति अत्रि मुनि निवास करते हैं। यहीं तुमने धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयादेवीका दर्शन किया था॥
‘सुतनु! वह गिरिराज चित्रकूट प्रकाशित हो रहा है। वहीं कैकेयीकुमार भरत मुझे प्रसन्न करके लौटा लेनेके लिये आये थे॥ ५१ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! यह विचित्र काननोंसे सुशोभित रमणीय यमुना नदी दिखायी देती है और यह शोभाशाली भरद्वाजाश्रम दृष्टिगोचर हो रहा है॥ ५२ ॥
‘ये पुण्यसलिला त्रिपथगा गङ्गा नदी दीख रही हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते हैं और द्विजवृन्द पुण्यकर्मोंमें रत हैं। इनके तटवर्ती वनके वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे हुए हैं॥ ५३ ॥
‘यह शृङ्गवेरपुर है, जहाँ मेरा मित्र गुह रहता है। सीते! यह यूपमालाओंसे अलंकृत सरयू दिखायी देती है, जिसके तटपर मेरे पिताजीकी राजधानी है। विदेहनन्दिनि! तुम वनवासके बाद फिर लौटकर अयोध्याको आयी हो। इसलिये इस पुरीको प्रणाम करो’॥ ५४-५५ ॥
तब विभीषणसहित वे सब राक्षस और वानर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उछल-उछलकर उस पुरीका दर्शन करने लगे॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् वे वानर और राक्षस श्वेत अट्टालिकाओंसे अलंकृत और विशाल भवनोंसे विभूषित अयोध्यापुरीको, जो हाथी-घोड़ोंसे भरी थी और देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान शोभित होती थी, देखने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२३ ॥
* सीताजीने जो यहाँ वानरोंकी स्त्रियोंको साथ ले चलनेकी इच्छा प्रकट की है, इसके लिये किष्किन्धामें विमानको रोककर सबको एक दिन रुकना पड़ा। ऐसा रामायण-तिलककारका मत है। उनके कथनानुसार आश्विन शुक्ला चतुर्थीको किष्किन्धामें रहकर पञ्चमीको वहाँसे प्रस्थान किया गया था। भगवान् रामने वहाँ रुककर उसी दिन अङ्गदका किष्किन्धाके युवराजपदपर अभिषेक करवाया था, जैसा कि महाभारत, वनपर्व अध्याय २९१ श्लोक ५८-५९ से सूचित होता है।
एक सौ चौबीसवाँ सर्ग
एक सौ चौबीसवाँ सर्ग
श्रीरामका भरद्वाज-आश्रमपर उतरकर महर्षिसे मिलना और उनसे वर पाना
श्रीरामचन्द्रजीने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर पञ्चमी तिथिको भरद्वाज-आश्रममें पहुँचकर मनको वशमें रखते हुए मुनिको प्रणाम किया॥ १ ॥
तपस्याके धनी भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके श्रीरामने उनसे पूछा—‘भगवन्! आपने अयोध्यापुरीके विषयमें भी कुछ सुना है? वहाँ सुकाल और कुशल-मङ्गल तो है न? भरत प्रजापालनमें तत्पर रहते हैं न? मेरी माताएँ जीवित हैं न?’॥ २ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि भरद्वाजने मुस्कराकर उन रघुश्रेष्ठ श्रीरामसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ३ ॥
‘रघुनन्दन! भरत आपकी आज्ञाके अधीन हैं। वे जटा बढ़ाये आपके आगमनकी प्रतीक्षा करते हैं। आपकी चरणपादुकाओंको सामने रखकर सारा कार्य करते हैं। आपके घरपर और नगरमें भी सब कुशल हैं॥ ४ ॥
‘पहले जब आप महान् वनकी यात्रा कर रहे थे, उस समय आपने चीरवस्त्र धारण कर रखा था और आप दोनों भाइयोंके साथ तीसरी केवल आपकी स्त्री थी। आप राज्यसे वञ्चित किये गये थे और केवल धर्मपालनकी इच्छा मनमें ले सर्वस्व त्यागकर पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये पैदल ही जा रहे थे। सारे भोगोंसे दूर हो स्वर्गसे भूतलपर गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे। शत्रुविजयी वीर! आप कैकेयीके आदेशके पालनमें तत्पर हो जंगली फल-मूलका आहार करते थे, उस समय आपको देखकर मेरे मनमें बड़ी करुणा हुई थी॥ ५–७ ॥
‘परंतु इस समय तो सारी स्थिति ही बदल गयी है। आप शत्रुपर विजय पाकर सफलमनोरथ हो मित्रों तथा बान्धवोंके साथ लौट रहे हैं। इस रूपमें आपको देखकर मुझे बड़ा सुख मिला—मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई॥
‘रघुवीर! आपने जनस्थानमें रहकर जो विपुल सुख-दुःख उठाये हैं, वे सब मुझे मालूम हैं॥ ९ ॥
‘वहाँ रहकर आप ब्राह्मणोंके कार्यमें संलग्न हो समस्त तपस्वी मुनियोंकी रक्षा करते थे। उस समय रावण आपकी इन सती-साध्वी भार्याको हर ले गया॥
‘धर्मवत्सल! मारीचका कपटमृगके रूपमें दिखायी देना, सीताका बलपूर्वक अपहरण होना, इनकी खोज करते समय आपके मार्गमें कबन्धका मिलना, आपका पम्पासरोवरके तटपर जाना, सुग्रीवके साथ आपकी मैत्रीका होना, आपके हाथसे वालीका मारा जाना, सीताकी खोज, पवनपुत्र हनुमान्का अद्भुत कर्म, सीताका पता लग जानेपर नलके द्वारा समुद्रपर सेतुका निर्माण, हर्ष और उत्साहसे भरे हुए वानर-यूथपतियोंद्वारा लङ्कापुरीका दहन, पुत्र, बन्धु, मन्त्री, सेना और सवारियोंसहित बलाभिमानी रावणका आपके द्वारा युद्धमें वध होना, उस देवकण्टक रावणके मारे जानेपर देवताओंके साथ आपका समागम होना तथा उनका आपको वर देना— ये सारी बातें मुझे तपके प्रभावसे ज्ञात हैं॥ ११—१५ १/२ ॥
‘मेरे प्रवृत्ति नामक शिष्य यहाँसे अयोध्यापुरीको जाते रहते हैं (अतः मुझे वहाँका वृत्तान्त मालूम होता रहता है), शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! यहाँ मैं भी आपको एक वर देता हूँ (आपकी जो इच्छा हो, उसे माँग लें)। आज मेरा अर्घ्य और आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें। कल सबेरे अयोध्याको जाइयेगा’॥ १६-१७ ॥
मुनिके उस वचनको शिरोधार्य करके हर्षसे भरे हुए श्रीमान् राजकुमार श्रीरामने कहा—‘बहुत अच्छा’। फिर उन्होंने उनसे यह वर माँगा—॥ १८ ॥
‘भगवन्! यहाँसे अयोध्या जाते समय मार्गके सब वृक्षोंमें समय न होनेपर भी फल उत्पन्न हो जायँ और वे सब-के-सब मधुकी धारा टपकानेवाले हों। उनमें नाना प्रकारके बहुत-से अमृतोपम सुगन्धित फल लग जायँ’॥ १९ १/२ ॥
भरद्वाजजीने कहा—‘ऐसा ही होगा’। उनके इस प्रकार प्रतिज्ञा करते ही—उनकी उस वाणीके निकलते ही तत्काल वहाँके सारे वृक्ष स्वर्गीय वृक्षोंके समान हो गये॥ २० १/२ ॥
जिनमें फल नहीं थे, उनमें फल आ गये। जिनमें फूल नहीं थे, वे फूलोंसे सुशोभित होने लगे। सूखे हुए वृक्षोंमें भी हरे-हरे पत्ते निकल आये और सभी वृक्ष मधुकी धारा बहाने लगे। अयोध्या जानेका जो मार्ग था, उसके आस-पास तीन योजनतकके वृक्ष ऐसे ही हो गये॥ २१-२२ ॥
फिर तो वे सहस्रों श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर स्वर्गवासी देवताओंके समान अपनी रुचिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक उन बहुसंख्यक दिव्य फलोंका आस्वादन करने लगे॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२४ ॥
एक सौ पचीसवाँ सर्ग
एक सौ पचीसवाँ सर्ग
हनुमान्जीका निषादराज गुह तथा भरतजीको श्रीरामके आगमनकी सूचना देना और प्रसन्न हुए भरतका उन्हें उपहार देनेकी घोषणा करना
(भरद्वाज-आश्रमपर उतरनेसे पहले) विमानसे ही अयोध्यापुरीका दर्शन करके अयोध्यावासियों तथा सुग्रीव आदिका प्रिय करनेकी इच्छावाले शीघ्रपराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने यह विचार किया कि कैसे इन सबका प्रिय हो?॥ १ ॥
विचार करके तेजस्वी एवं बुद्धिमान् श्रीरामने वानरोंपर दृष्टि डाली और वानर-वीर हनुमान्जीसे कहा—॥ २ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! तुम शीघ्र ही अयोध्यामें जाकर पता लो कि राजभवनमें सब लोग सकुशल तो हैं न?॥ ३ ॥
‘शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर वनवासी निषादराज गुहसे भी मिलना और मेरी ओरसे कुशल कहना॥ ४ ॥
‘मुझे सकुशल, नीरोग और चिन्तारहित सुनकर निषादराज गुहको बड़ी प्रसन्नता होगी; क्योंकि वह मेरा मित्र है। मेरे लिये आत्माके समान है॥ ५ ॥
‘निषादराज गुह प्रसन्न होकर तुम्हें अयोध्याका मार्ग और भरतका समाचार बतायेगा॥ ६ ॥
‘भरतके पास जाकर तुम मेरी ओरसे उनका कुशल पूछना और उन्हें सीता एवं लक्ष्मणसहित मेरे सफलमनोरथ होकर लौटनेका समाचार बताना॥ ७ ॥
‘बलवान् रावणके द्वारा सीताजीके हरे जानेका, सुग्रीवसे बातचीत होनेका, रणभूमिमें वालीके वधका, सीताजीकी खोजका, तुमने जो महान् जलराशिसे भरे हुए अपार महासागरको लाँघकर जिस तरह सीताका पता लगाया था उसका, फिर समुद्रतटपर मेरे जानेका, सागरके दर्शन देनेका, उसपर पुल बनानेका, रावणके वधका, इन्द्र, ब्रह्मा और वरुणसे मिलने एवं वरदान पानेका और महादेवजीके प्रसादसे पिताजीके दर्शन होनेका वृत्तान्त उन्हें सुनाना॥ ८—११ ॥
‘सौम्य! फिर भरतसे यह भी निवेदन करना कि श्रीराम शत्रुओंको जीतकर, परम उत्तम यश पाकर, सफलमनोरथ हो राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अपने अन्य महाबली
मित्रोंके साथ आ रहे हैं और प्रयागतक आ पहुँचे हैं॥ १२-१३ ॥
‘यह बात सुनकर भरतकी जैसी मुख-मुद्रा हो, उसपर ध्यान रखना और समझना तथा भरतका मेरे प्रति जो कर्तव्य या बर्ताव हो, उसको भी जाननेका प्रयत्न करना॥ १४ ॥
‘वहाँके सारे वृत्तान्त तथा भरतकी चेष्टाएँ तुम्हें यथार्थरूपसे जाननी चाहिये। मुखकी कान्ति, दृष्टि और बातचीतसे उनके मनोभावको समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये॥ १५ ॥
‘समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे भरपूर बाप-दादोंका राज्य सुलभ हो तो वह किसके मनको नहीं पलट देता?॥ १६ ॥
‘यदि कैकेयीकी संगति अथवा चिरकालतक राज्यवैभवका संसर्ग होनेसे श्रीमान् भरत स्वयं ही राज्य पानेकी इच्छा रखते हों तो वे रघुकुलनन्दन भरत बेखटके समस्त भूमण्डलका राज्य करें (मुझे उस राज्यको नहीं लेना है। उस दशामें हम कहीं अन्यत्र रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे)॥ १७ ॥
‘वानरवीर! तुम भरतके विचार और निश्चयको जानकर जबतक हमलोग इस आश्रमसे दूर न चले जायँ तभीतक शीघ्र लौट आओ’॥ १८ ॥
श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी मनुष्यका रूप धारण करके तीव्रगतिसे अयोध्याकी ओर चल दिये॥ १९ ॥
जैसे गरुड़ किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़नेके लिये बड़े वेगसे झपट्टा मारते हैं, उसी तरह पवनपुत्र हनुमान् तीव्र वेगसे उड़ चले॥ २० ॥
अपने पिता वायुके मार्ग—अन्तरिक्षको, जो पक्षिराज गरुड़का सुन्दर गृह है, लाँघकर गङ्गा और यमुनाके वेगशाली संगमको पार करके शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर पराक्रमी हनुमान्जी निषादराज गुहसे मिले और बड़े हर्षके साथ सुन्दर वाणीमें बोले—॥ २१-२२ ॥
‘तुम्हारे मित्र ककुत्स्थकुलभूषण सत्यपराक्रमी श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आ रहे हैं और उन्होंने तुम्हें अपना कुशल-समाचार कहलाया है। वे प्रयागमें हैं और भरद्वाजमुनिके कहनेसे उन्हींके आश्रममें आज पञ्चमीकी रात बिताकर कल उनकी आज्ञा ले वहाँसे चलेंगे। तुम्हें यहीं श्रीरघुनाथजीका दर्शन होगा’॥ २३-२४ ॥
गुहसे यों कहकर महातेजस्वी और वेगशाली हनुमान्जी बिना कोई सोच-विचार किये बड़े वेगसे आगेको उड़ चले। उस समय उनके सारे अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया था॥ २५
॥
मार्गमें उन्हें परशुराम-तीर्थ, वालुकिनी नदी, वरूथी, गोमती और भयानक सालवनके दर्शन हुए॥ २६ ॥
कँइ सहस्र प्रजाओं तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी तीव्रगतिसे दूरतकका रास्ता लाँघ गये और नन्दिग्रामके समीपवर्ती खिले हुए वृक्षोंके पास जा पहुँचे। वे वृक्ष देवराज इन्द्रके नन्दनवन और कुबेरके चैत्ररथ-वनके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे॥ २७-२८ ॥
उनके आस-पास बहुत-सी स्त्रियाँ अपने उन पुत्रों और पौत्रोंके साथ, जो वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे, विचरती और उनके पुष्पोंका चयन करती थीं। अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर उन्होंने आश्रमवासी भरतको देखा, जो चीर-वस्त्र और काला मृगचर्म धारण किये दुःखी एवं दुर्बल दिखायी देते थे। उनके सिरपर जटा बढ़ी हुँइ थी, शरीरपर मैल जम गयी थी, भाँइके वनवासके दुःखने उन्हें बहुत ही कृश कर दिया था, फल-मूल ही उनका भोजन था, वे इन्द्रियोंका दमन करके तपस्यामें लगे हुए थे और धर्मका आचरण करते थे। सिरपर जटाका भार बहुत ही ऊँचा दिखायी देता था, वल्कल और मृगचर्मसे उनका शरीर ढका था। वे बड़े नियमसे रहते थे। उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे ब्रह्मर्षिके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। रघुनाथजीकी दोनों चरणपादुकाओंको आगे रखकर वे पृथ्वीका शासन करते थे॥ २९—३२ ॥
भरतजी चारों वर्णोंकी प्रजाओंको सब प्रकारके भयसे सुरक्षित रखते थे। उनके पास मन्त्री, पुरोहित और सेनापति भी योगयुक्त होकर रहते और गेरुए वस्त्र पहनते थे॥ ३३ १/२ ॥
अयोध्याके वे धर्मानुरागी पुरवासी भी उन चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले राजकुमार भरतको उस दशामें छोड़कर स्वयं भोग भोगनेकी इच्छा नहीं करते थे॥ ३४ १/२ ॥
मनुष्यदेह धारण करके आये हुए दूसरे धर्मकी भाँति उन धर्मज्ञ भरतके पास पहुँचकर पवनकुमार हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले— ॥ ३५ १/२ ॥
‘देव! आप दण्डकारण्यमें चीरवस्त्र और जटा धारण करके रहनेवाले जिन श्रीरघुनाथजीके लिये निरन्तर चिन्तित रहते हैं, उन्होंने आपको अपना कुशल-समाचार कहलाया है और आपका भी पूछा है। अब आप इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दीजिये। मैं आपको बड़ा प्रिय समाचार सुना रहा हूँ। आप शीघ्र ही अपने भाँइ श्रीरामसे मिलेंगे॥ ३६-३७ १/२ ॥
‘भगवान् श्रीराम रावणको मारकर मिथिलेशकुमारीको वापस ले सफलमनोरथ हो अपने महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं। उनके साथ महातेजस्वी लक्ष्मण और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता भी हैं। जैसे देवराज इन्द्रके साथ शची शोभा पाती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके साथ पूर्णकामा सीताजी सुशोभित हो रही हैं’॥ ३८-३९॥
हनुमान्जीके ऐसा कहते ही कैकेयी-कुमार भरत सहसा आनन्दविभोर हो पृथ्वीपर गिर पड़े और हर्षसे मूर्च्छित हो गये॥ ४०॥
तत्पश्चात् दो घड़ीके बाद उन्हें होश हुआ और वे उठकर खड़े हो गये। उस समय रघुकुलभूषण श्रीमान् भरतने प्रियवादी हनुमान्जीको बड़े वेगसे पकड़कर दोनों भुजाओंमें भर लिया और शोक-संसर्गसे शून्य परमानन्दजनित विपुल अश्रुबिन्दुओंसे वे उन्हें नहलाने लगे। फिर इस प्रकार बोले—॥ ४१-४२॥
‘भैया! तुम कोई देवता हो या मनुष्य, जो मुझपर कृपा करके यहाँ पधारे हो? सौम्य! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तुम्हें कौन-सी प्रिय वस्तु प्रदान करूँ? (मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखायी देता, जो इस प्रिय संवादके तुल्य हो)॥
‘(तथापि) मैं तुम्हें इसके लिये एक लाख गौएँ, सौ उत्तम गाँव तथा उत्तम आचार-विचारवाली सोलह कुमारी कन्याएँ पत्नीरूपमें समर्पित करता हूँ। उन कन्याओंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान होगी। उनकी नासिका सुघड़, ऊरु मनोहर और मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर होंगे। वे कुलीन होनेके साथ ही सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होंगी’॥ ४४-४५॥
उन प्रमुख वानर-वीर हनुमान्जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका अद्भुत समाचार सुनकर राजकुमार भरतको श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे अत्यन्त हर्ष हुआ और उस हर्षातिरेकसे ही वे फिर इस प्रकार बोले—
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२५ ॥