श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चौबीसवाँ सर्ग
चौबीसवाँ सर्ग
श्रीरामका लक्ष्मणसे लङ्काकी शोभाका वर्णन करके सेनाको व्यूहबद्ध खड़ी होनेके लिये आदेश देना, श्रीरामकी आज्ञासे बन्धनमुक्त हुए शुकका रावणके पास जाकर उनकी सैन्यशक्तिकी प्रबलता बताना तथा रावणका अपने बलकी डींग हाँकना
सुग्रीवने उस वीर वानरसेनाकी यथोचित व्यवस्था की थी। उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रोंसे युक्त शरत्कालकी पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो॥ १ ॥
वह विशाल सैन्य-समूह समुद्रके समान जान पड़ता था। उसके भारसे दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेगसे डोलने लगी॥ २ ॥
तदनन्तर वानरोंने लङ्कामें महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्गके गम्भीर घोषसे मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था॥ ३ ॥
उस तुमुलनादको सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साहमें भर गये और उसे न सह सकनेके कारण उससे भी बढ़कर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४ ॥
राक्षसोंने वानरोंकी वह गर्जना सुनी, जो दर्पमें भरकर सिंहनाद कर रहे थे। उनकी आवाज आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी॥ ५ ॥
दशरथनन्दन श्रीरामने विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित लङ्कापुरीको देखकर व्यथितचित्तसे मन-ही-मन सीताका स्मरण किया॥ ६ ॥
वे भीतर-ही-भीतर कहने लगे—‘हाय! यहीं वह मृगलोचना सीता रावणकी कैदमें पड़ी है। उसकी दशा मंगलग्रहसे आक्रान्त हुई रोहिणीके समान हो रही है’॥ ७ ॥
मन-ही-मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम-गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मणकी ओर देखते हुए अपने लिये समयानुकूल हितकर वचन बोले—॥ ८ ॥
‘लक्ष्मण! इस लङ्काकी ओर तो देखो। यह अपनी ऊँचाईसे आकाशमें रेखा खींचती हुई-सी जान पड़ती है। जान पड़ता है पूर्वकालमें विश्वकर्माने अपने मनसे ही इस पर्वत-शिखरपर लङ्कापुरीका निर्माण किया है॥ ९ ॥
‘पूर्वकालमें यह पुरी अनेक सतमंजले मकानोंसे भरी-पूरी बनायी गयी थी। इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनोंसे भगवान् विष्णुके चरणस्थापनका स्थानभूत आकाश आच्छादित-सा
हो गया॥ १० ॥
‘फूलोंसे भरे हुए चैत्ररथ वनके सदृश सुन्दर काननोंसे लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है। उन काननोंमें नाना प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलोंकी प्राप्ति करानेके कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं॥ ११ ॥
‘देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनोंको, जिनमें मतवाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौंरे पत्तों और फूलोंमें लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलोंके समूह एवं संगीतसे व्याप्त हैं, बारंबार कम्पित कर रहा है’॥
दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे ऐसा कहा और युद्धके शास्त्रीय नियमानुसार सेनाका विभाग किया॥ १३ ॥
उस समय श्रीरामने वानरसैनिकोंको यह आदेश दिया—‘इस विशाल सेनामेंसे अपनी सेनाको साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नीलके साथ वानरसेनाके पुरुषव्यूहमें हृदयके स्थानमें स्थित हों॥ १४ ॥
‘इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियोंके समुदायसे घिरे रहकर इस वानरवाहिनीके दाहिने पार्श्वमें खड़े रहें॥ १५ ॥
‘जो गन्धहस्तीके समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपिश्रेष्ठ गन्धमादन वानरवाहिनीके वाम पार्श्वमें खड़े हों॥ १६ ॥
‘मैं लक्ष्मणके साथ सावधान रहकर इस व्यूहके मस्तकके स्थानमें खड़ा होऊँगा। जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी—ये तीन महामनस्वी वीर जो रीछोंकी सेनाके प्रधान हैं, वे सैन्यव्यूहके कुक्षिभागकी रक्षा करें॥
‘वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनीके पिछले भागकी रक्षामें उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत्की पश्चिम दिशाका संरक्षण करते हैं’॥ १८ ॥
इस प्रकार सुन्दरतासे विभक्त हो विशाल व्यूहमें बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े-बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघोंसे घिरे हुए आकाशके समान जान पड़ती थी॥
वानरलोग पर्वतोंके शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्धके लिये लङ्कापर चढ़ आये। वे उस पुरीको पददलित करके धूलमें मिला देना चाहते थे॥ २० ॥
सभी वानरयूथपति ये ही मनसूबे बाँधते थे कि हम लङ्कापर पर्वत-शिखरोंकी वर्षा करें और लङ्कावासियोंको मुक्कोंसे मार-मारकर यमलोक पहुँचा दें॥ २१ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी रामने सुग्रीवसे कहा— 'हमलोगोंने अपनी सेनाओंको सुन्दर ढंगसे विभक्त करके उन्हें व्यूहबद्ध कर लिया है, अतः अब इस शुकको छोड़ दिया जाय'॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महाबली वानरराजने उनके आदेशसे रावणदूत शुकको बन्धनमुक्त करा दिया॥ २३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे छुटकारा पाकर वानरोंसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त भयभीत हुआ शुक राक्षसराजके पास गया॥ २४ ॥
उस समय रावणने हँसते हुए-से ही शुकसे कहा— 'ये तुम्हारी दोनों पाँखें बाँध क्यों दी गयी हैं। इससे तुम इस तरह दिखायी देते हो मानो तुम्हारे पंख नोच लिये गये हों। कहीं तुम उन चञ्चलचित्तवाले वानरोंके चंगुलमें तो नहीं फँस गये थे?'॥ २५ १/२ ॥
राजा रावणके इस प्रकार पूछनेपर भयसे घबराये हुए शुकने उस समय उस श्रेष्ठ राक्षसराजको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २६ ॥
'महाराज! मैंने समुद्रके उत्तर तटपर पहुँचकर आपका संदेश बहुत स्पष्ट शब्दोंमें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए सुनाया॥ २७ ॥
'किंतु मुझपर दृष्टि पड़ते ही कुपित हुए वानरोंने उछलकर मुझे पकड़ लिया और घूसोंसे मारना एवं पाँखें नोचना आरम्भ किया॥ २८ ॥
'राक्षसराज! वे वानर स्वभावसे ही क्रोधी और तीखे हैं। उनसे बात भी नहीं की जा सकती थी। फिर यह पूछनेका अवसर कहाँ था कि तुम मुझे क्यों मार रहे हो?॥ २९ ॥
'जो विराध, कबन्ध और खरका वध कर चुके हैं, वे श्रीराम सुग्रीवके साथ सीताके स्थानका पता पाकर उनका उद्धार करनेके लिये आये हैं॥ ३० ॥
'वे रघुनाथजी समुद्रपर पुल बाँध लवणसागरको पार करके राक्षसोंको तिनकोंके समान समझकर धनुष हाथमें लिये यहाँ पास ही खड़े हैं॥ ३१ ॥
'पर्वत और मेघोंके समान विशालकाय रीछों और वानर-समूहोंकी सहस्रों सेनाएँ इस पृथ्वीपर छा गयी हैं॥ ३२ ॥
‘देवता और दानवोंमें जैसे मेल होना असम्भव है, उसी प्रकार राक्षसों और वानरराज सुग्रीवके सैनिकोंमें संधि नहीं हो सकती॥ ३३ ॥
‘अतः जबतक वे लङ्कापुरीकी चहारदीवारीपर नहीं चढ़ आते, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दोमेंसे एक काम कर डालिये—या तो तुरंत ही उन्हें सीताको लौटा दीजिये या फिर सामने खड़े होकर युद्ध कीजिये’॥ ३४ ॥
शुककी यह बात सुनकर रावणकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं। वह इस तरह घूर-घूरकर देखने लगा, मानो अपनी दृष्टिसे उसको दग्ध कर देगा। वह बोला—॥
‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करनेको तैयार हो जायँ तथा सारे संसारके लोग मुझे भय दिखाने लगें तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा॥ ३६ ॥
‘जैसे मतवाले भ्रमर वसन्त-ऋतुमें फूलोंसे भरे हुए वृक्षपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे बाण कब उस रघुवंशीपर धावा करेंगे?॥ ३७ ॥
‘वह अवसर कब आयेगा जब मेरे धनुषसे छूटे हुए तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल होकर रामका शरीर लहूलुहान हो जायगा और जैसे जलती हुई लुकारीसे लोग हाथीको जलाते हैं, उसी तरह मैं उन बाणोंसे रामको दग्ध कर डालूँगा॥ ३८ ॥
‘जैसे सूर्य अपने उदयके साथ ही समस्त नक्षत्रोंकी प्रभा हर लेते हैं, उसी प्रकार मैं विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें खड़ा हो रामकी समस्त वानर-सेनाको आत्मसात् कर लूँगा॥ ३९ ॥
दशरथकुमार रामने अभी समरभूमिमें समुद्रके समान मेरे वेग और वायुके समान मेरे बलका अनुभव नहीं किया है, इसलिये वह मेरे साथ युद्ध करना चाहता है॥
‘मेरे तरकसमें सोये हुए बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं। रामने संग्राममें उन बाणोंको देखा ही नहीं है; इसलिये वह मुझसे जूझना चाहता है॥ ४१ ॥
‘पहले कभी युद्धमें रामका मेरे बल-पराक्रमसे पाला नहीं पड़ा है, इसीलिये वह मेरे साथ लड़नेका हौसला रखता है। मेरा धनुष एक सुन्दर वीणा है, जो बाणोंके कोनोंसे बजायी जाती है। उसकी प्रत्यञ्चासे जो टङ्कार-ध्वनि उठती है, वही उसकी भयंकर स्वरलहरी है। आर्तोंकी चीत्कार और पुकार ही उसपर उच्च स्वरसे गाया जानेवाला गीत है। नाराचोंको छोड़ते समय जो चट-चट शब्द होता है, वही मानो हथेलीपर दिया जानेवाला ताल है। बहती हुई नदीके समान जो शत्रुओंकी वाहिनी है, वही मानो उस संगीतोत्सवके लिये विशाल रंगभूमि है। मैं समराङ्गणमें उस रंगभूमिके भीतर प्रवेश करके अपनी वह भयंकर वीणा बजाऊँगा॥ ४२-४३ ॥
‘यदि महासमरमें सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् वरुण या स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर ही आ जायँ तो वे भी अपनी बाणाग्निसे मुझे पराजित नहीं कर सकते’॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४ ॥
पचीसवाँ सर्ग
पचीसवाँ सर्ग
रावणका शुक और सारणको गुप्तरूपसे वानरसेनामें भेजना, विभीषणद्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीरामकी कृपासे छुटकारा पाना तथा श्रीरामका संदेश लेकर लङ्कामें लौटकर उनका रावणको समझाना
दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जब सेनासहित समुद्र पार कर चुके, तब श्रीमान् रावणने अपने दोनों मन्त्री शुक और सारणसे फिर कहा— ॥ १ ॥
‘यद्यपि समुद्रको पार करना अत्यन्त कठिन था तो भी सारी वानरसेना उसे लाँघकर इस पार चली आयी। रामके द्वारा सागरपर सेतुका बाँधा जाना अभूतपूर्व कार्य है॥ २ ॥
‘लोगोंके मुँहसे सुननेपर भी मुझे किसी तरह यह विश्वास नहीं होता कि समुद्रपर पुल बाँधा गया होगा। वानरसेना कितनी है? इसका ज्ञान मुझे अवश्य प्राप्त करना चाहिये॥ ३ ॥
‘तुम दोनों इस तरह वानर-सेनामें प्रवेश करो कि तुम्हें कोई पहचान न सके। वहाँ जाकर यह पता लगाओ कि वानरोंकी संख्या कितनी है? उनकी शक्ति कैसी है? उनमें मुख्य-मुख्य वानर कौन-कौनसे हैं। श्रीराम और सुग्रीवके मनोऽनुकूल मन्त्री कौन-कौन हैं? कौन-कौन शूरवीर वानर-सेनाके आगे रहते हैं? अगाध जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें वह पुल किस तरह बाँधा गया? महामनस्वी वानरोंकी छावनी कैसे पड़ी है? श्रीराम और वीर लक्ष्मणका निश्चय क्या है?—वे क्या करना चाहते हैं? उनके बल-पराक्रम कैसे हैं? उन दोनोंके पास कौन-कौनसे अस्त्र-शस्त्र हैं? और उन महामना वानरोंका प्रधान सेनापति कौन है? इन सब बातोंकी तुमलोग ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो और सबका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर शीघ्र लौट आओ’॥
ऐसा आदेश पाकर दोनों वीर राक्षस शुक और सारण वानररूप धारण करके उस वानरी सेनामें घुस गये॥ ९ ॥
वानरोंकी वह सेना कितनी है? यह गिनना तो दूर रहा; मनसे उसका अंदाजा लगाना भी असम्भव था। उस अपार सेनाको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस समय शुक और सारण किसी तरह भी उसकी गणना नहीं कर सके॥ १० ॥
वह सेना पर्वतके शिखरोंपर, झरनोंके आसपास, गुफाओंमें, समुद्रके किनारे तथा वनों और उपवनोंमें भी फैली हुई थी। उसका कुछ भाग समुद्र पार कर रहा था, कुछ पार कर चुका था और कुछ सब प्रकारसे समुद्रको पार करनेकी तैयारीमें लगा था॥ ११ ॥
भयंकर कोलाहल करनेवाली वह विशाल सेना कुछ स्थानोंपर छावनी डाल चुकी थी और कुछ जगहोंपर डालती जा रही थी। दोनों निशाचरोंने देखा, वह वानरवाहिनी समुद्रके समान अक्षोभ्य थी॥ १२ ॥
वानरवेशमें छिपकर सेनाका निरीक्षण करते हुए दोनों राक्षस शुक और सारणको महातेजस्वी विभीषणने देखा, देखते ही पहचाना और उन दोनोंको पकड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १३ ॥
‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश्वर! ये दोनों लङ्कासे आये हुए गुप्तचर एवं राक्षसराज रावणके मन्त्री शुक तथा सारण हैं’॥ १४ ॥
वे दोनों राक्षस श्रीरामचन्द्रजीको देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और जीवनसे निराश हो गये। उन दोनोंके मनमें भय समा गया। वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले— ॥ १५ ॥
‘सौम्य! रघुनन्दन! हम दोनोंको रावणने भेजा है और हम इस सारी सेनाके विषयमें आवश्यक जानकारी प्राप्त करनेके लिये आये हैं’॥ १६ ॥
उन दोनोंकी वह बात सुनकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगे रहनेवाले दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम हँसते हुए बोले— ॥ १७ ॥
‘यदि तुमने सारी सेना देख ली हो, हमारी सैनिक-शक्तिका ज्ञान प्राप्त कर लिया हो तथा रावणके कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया हो तो अब तुम दोनों अपनी इच्छाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक लौट जाओ॥
‘अथवा यदि अभी कुछ देखना बाकी रह गया हो तो फिर देख लो। विभीषण तुम्हें सब कुछ पुनः पूर्णरूपसे दिखा देंगे॥ १९ ॥
‘इस समय जो तुम पकड़ लिये गये हो, इससे तुम्हें अपने जीवनके विषयमें कोई भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि शस्त्रहीन अवस्थामें पकड़े गये तुम दोनों दूत वधके योग्य नहीं हो॥ २० ॥
‘विभीषण! ये दोनों राक्षस रावणके गुप्तचर हैं और छिपकर यहाँका भेद लेनेके लिये आये हैं। ये अपने शत्रुपक्ष (वानरसेना)-में फूट डालनेका प्रयास कर रहे हैं। अब तो इनका भण्डा फूट ही गया; अतः इन्हें छोड़ दो॥ २१ ॥
‘शुक और सारण! जब तुम दोनों लङ्कामें पहुँचो, तब कुबेरके छोटे भाई राक्षसराज रावणको मेरी ओरसे यह संदेश सुना देना—॥ २२ ॥
‘रावण! जिस बलके भरोसे तुमने मेरी सीताका अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनोंसहित आकर इच्छानुसार दिखाओ॥ २३ ॥
‘कल प्रातःकाल ही तुम परकोटे और दरवाजोंके सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेनाका मेरे बाणोंसे विध्वंस होता देखोगे॥ २४ ॥
‘रावण! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सबेरे ही सेनासहित तुमपर अपना भयंकर क्रोध छोड़ूँगा’॥ २५ ॥
भगवान् श्रीरामका यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजीका ‘आपकी जय हो’, ‘आप चिरंजीवी हों’ इत्यादि वचनोंद्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरीमें आकर राक्षसराज रावणसे बोले—॥
‘राक्षसेश्वर! हमें तो विभीषणने वध करनेके लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीरामने देखा, तब हमें छुड़वा दिया॥ २७ १/२ ॥
‘दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव—ये चारों वीर लोकपालोंके समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं। जहाँ ये चारों पुरुषप्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है। और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजोंके सहित सारी लङ्कापुरीको उखाड़कर फेंक सकते हैं॥ २८—३० १/२ ॥
‘श्रीरामचन्द्रजीका जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरीका वध कर डालेंगे। भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें॥ ३१ १/२ ॥
‘महाराज! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह वानरोंकी सेना तो समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय है॥ ३२ ॥
‘महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करनेके लिये उत्सुक हैं। उनकी सेनाके सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं। अतः उनके साथ विरोध करनेसे आपको कोई लाभ नहीं होगा। इसलिये संधि कर लीजिये और श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको लौटा दीजिये’॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ सर्ग
छब्बीसवाँ सर्ग
सारणका रावणको पृथक्-पृथक् वानरयूथपतियोंका परिचय देना
(शुक और) सारणके ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावणने सारणसे कहा— ॥ १ ॥
‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीताको नहीं दूँगा॥ २ ॥
‘सौम्य! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरोंने बहुत तंग किया है। इसीसे भयभीत होकर तुम आज ही सीताको लौटा देना ठीक समझने लगे हो। भला, कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गणमें मुझे जीत सके’॥ ३ १/२ ॥
ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरोंकी सेनाका निरीक्षण करनेके लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फके समान श्वेत रंगकी अट्टालिकापर चढ़ गया॥ ४-५ ॥
उस समय रावण क्रोधसे तमतमा उठा था। उसने उन दोनों गुप्तचरोंके साथ जब समुद्र, पर्वत और वनोंपर दृष्टिपात किया, तब पृथिवीका सारा प्रदेश वानरोंसे भरा दिखायी दिया॥ ६ १/२ ॥
वानरोंकी वह विशाल सेना अपार और असह्य थी। उसे देखकर राजा रावणने सारणसे पूछा— ॥ ७ १/२ ॥
‘सारण! इन वानरोंमें कौन-कौनसे मुख्य हैं? कौन शूरवीर हैं और कौन बलमें बहुत बढ़े-चढ़े हैं?॥ ८ ॥
‘कौन-कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे-आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं? सारण! ये सारी बातें मुझे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है?’॥ ९ १/२ ॥
इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावणका वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरोंको जाननेवाले सारणने उन मुख्य वानरोंका परिचय देते हुए कहा— ॥ १० १/२ ॥
‘महाराज! यह जो लङ्काकी ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपोंसे घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जनाके अत्यन्त गम्भीर घोषसे परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनोंके
सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूँज उठी है, इसका नाम नील है। यह वीर यूथपतियोंमेंसे है। समस्त वानरोंके राजा महामना सुग्रीवकी सेनाके आगे यही खड़ा होता है॥ ११—१३ १/२ ॥
‘जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहोंको एक दूसरीसे पकड़कर दोनों पैरोंसे पृथ्वीपर टहल रहा है, लङ्काकी ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अँगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वतशिखरके समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसरके समान सुनहले रंगकी है, जो रोषसे भरकर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछके पटकनेकी आवाजसे दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं, यह युवराज अङ्गद है। वानरराज सुग्रीवने इसका युवराजके पदपर अभिषेक किया है। यह अपने साथ युद्धके लिये आपको ललकारता है॥ १४—१७ ॥
‘वालीका यह पुत्र अपने पिताके समान ही बलशाली है। सुग्रीवको यह सदा ही प्रिय है। जैसे वरुण इन्द्रके लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजीके लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करनेके लिये उद्यत है॥ १८ ॥
‘श्रीरघुनाथजीका हित चाहनेवाले वेगशाली हनुमान्जीने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गदकी ही सारी बुद्धि काम कर रही थी॥ १९ ॥
‘पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियोंके बहुत-से यूथ लिये अपनी सेनाके साथ आपको कुचल डालनेके लिये आ रहा है॥ २० ॥
‘अङ्गदके पीछे संग्रामभूमिमें जो वीर विशाल सेनासे घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है। यही सेतु-निर्माणका प्रधान हेतु है॥ २१ ॥
‘जो अपने अङ्गोंको सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनोंसे उठकर क्रोधपूर्वक अँगड़ाई लेते हैं, इनके वेगको सह लेना अत्यन्त कठिन है। ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं। इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है। ये सब वानर तथा चन्दनवनमें निवास करनेवाले वीर वानर इस यूथपति नलका ही अनुसरण करते हैं। यह नल भी अपनी सेनाद्वारा लङ्कापुरीको कुचल देनेका हौसला रखता है॥ २२-२३ १/२ ॥
‘यह जो चाँदीके समान सफेद रंगका चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है। यह भयंकर पराक्रम करनेवाला, बुद्धिमान्, शूरवीर और तीनों लोकोंमें विख्यात है। श्वेत बड़ी तेजीसे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है। यह वानरीसेनाका विभाग करता और सैनिकोंमें हर्ष तथा उत्साह भरता है॥ २४-२५ १/२ ॥
‘गोमतीके तटपर जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वतके चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्यका शासन करता था, वही यह कुमुद नामक यूथपति है॥
‘वह जो लाखों वानर-सैनिकोंको सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुममें बहुत बड़े-बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके बाल फैले हुए हैं और देखनेमें बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्धकी ही इच्छा रखता है, उस वानरका नाम चण्ड है। यह चण्ड भी अपनी सेनाद्वारा लङ्काको कुचल देनेकी इच्छा रखता है॥ २८-२९ ॥
‘राजन्! जो सिंहके समान पराक्रमी और कपिल वर्णका है, जिसकी गर्दनमें लंबे-लंबे बाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्काकी ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भ नामक यूथपति है। वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्णगिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतोंपर रहा करता है। जब वह युद्धके लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते हैं। वे सब-के-सब अपने बलसे लङ्काको मसल डालनेके लिये रम्भको सब ओरसे घेरे हुए आ रहे हैं॥ ३०—३२ ॥
‘जो कानोंको फैलाता है, बारंबार जँभाँऽइ लेता है, मृत्युसे भी नहीं डरता है और सेनाके पीछे न जाकर अर्थात् सेनाका भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोषसे काँप रहा है, तिरछी नजरसे देखता है और पूँछ फटकारकर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है। देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है॥ ३३-३४ ॥
‘इसका वेग महान् है। भय तो इसे छू तक नहीं गया है। राजन्! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वतपर निवास करता है॥ ३५ ॥
‘इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी ‘विहार’ संज्ञा है। वे बड़े बलवान् हैं। राजन्! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है॥ ३६ ॥
‘जो विशाल वानर मेघके समान आकाशको घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरोंके बीचमें ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओंमें इन्द्र हों, युद्धकी इच्छावाले वानरोंके बीचमें जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत-सी भेरियोंका तुमुल नाद हो रहा हो तथा जो युद्धमें दुःसह है, वह ‘पनस’ नामसे प्रसिद्ध यूथपति है। यह पनस परम उत्तम पारियात्र पर्वतपर निवास करता है। यूथपतियोंमें श्रेष्ठ पनसकी सेवामें पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने-अपने यूथ अलग-अलग हैं॥ ३७—४० ॥
‘जो समुद्रके तटपर स्थित हुँऽइ इस उछलती-कूदती भीषण सेनाको दूसरे मूर्तिमान् समुद्रकी भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुर पर्वतके समान विशालकाय वानर विनत नामसे प्रसिद्ध यूथपति है। वह नदियोंमें श्रेष्ठ वेणा नदीका पानी पीता हुआ विचरता है। साठ लाख वानर उसके सैनिक हैं॥ ४१-४२ १/२ ॥
‘जो युद्धके लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल-विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं और उन यूथपतियोंके पास पृथक्-पृथक् बहुत-से यूथ हैं, वह ‘क्रोधन’ नामसे प्रसिद्ध वानर है॥ ४३ १/२ ॥
‘वह जो गेरुके समान लाल रंगके शरीरका पोषण करता है, उस तेजस्वी वानरका नाम ‘गवय’ है। उसे अपने बलपर बड़ा घमंड है। वह सदा सब वानरोंका तिरस्कार किया करता है। देखिये, कितने रोषसे वह आपकी ओर बढ़ा आ रहा है। इसकी सेवामें सत्तर लाख वानर रहते हैं। यह भी अपनी सेनाके द्वारा लङ्काको धूलमें मिला देनेकी इच्छा रखता है॥ ४४—४६ ॥
‘ये सारे-के-सारे वानर दुःसह वीर हैं। इनकी गणना करना भी असम्भव है। यूथपतियोंमें श्रेष्ठ जो यूथप हैं, उन सबके अलग-अलग यूथ हैं’॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ सर्ग
सत्ताईसवाँ सर्ग
वानरसेनाके प्रधान यूथपतियोंका परिचय ८०७
(सारणने कहा—) 'राक्षसराज! आप वानर-सेनाका निरीक्षण कर रहे हैं, इसलिये मैं आपको उन यूथपतियोंका परिचय दे रहा हूँ, जो रघुनाथजीके लिये पराक्रम करनेको उद्यत हैं और अपने प्राणोंका मोह नहीं रखते हैं॥ १ ॥
'इधर यह हर नामका वानर है। भयंकर कर्म करनेवाले इस वानरकी लंबी पूँछपर लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके साढ़े तीन-तीन हाथ बड़े-बड़े चिकने रोएँ हैं। ये इधर-उधर फैले हुए रोम उठे होनेके कारण सूर्यकी किरणोंके समान चमक रहे हैं तथा चलते समय भूमिपर लोटते रहते हैं। इसके पीछे वानरराजके किंकररूप सैकड़ों और हजारों यूथपति उपस्थित हो वृक्ष उठाये सहसा लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये चले आ रहे हैं॥ २—४ ½ ॥
'उधर नील महामेघ और अञ्जनके समान काले रंगके जिन रीछोंको आप खड़े देख रहे हैं, वे युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं। समुद्रके दूसरे तटपर स्थित हुए बालुका-कणोंके समान इनकी गणना नहीं की जा सकती, इसीलिये पृथक्-पृथक् नाम लेकर इनके विषयमें कुछ बताना सम्भव नहीं है। ये सब पर्वतों, विभिन्न देशों और नदियोंके तटोंपर रहते हैं। राजन्! ये अत्यन्त भयंकर स्वभाववाले रीछ आपपर चढ़े आ रहे हैं। इनके बीचमें इनका राजा खड़ा है, जिसकी आँखें बड़ी भयानक और जो दूसरोंके देखनेमें भी बड़ा भयंकर जान पड़ता है। वह काले मेघोंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति चारों ओरसे इन रीछोंद्वारा घिरा हुआ है। इसका नाम धूम्र है। यह समस्त रीछोंका राजा और यूथपति है। यह रीछराज धूम्र पर्वतश्रेष्ठ ऋक्षवान्पर रहता और नर्मदाका जल पीता है॥ ५—९ ॥
'इस धूम्रके छोटे भाई जाम्बवान् हैं, जो महान् यूथपतियोंके भी यूथपति हैं। देखिये ये कैसे पर्वताकार दिखायी देते हैं। ये रूपमें तो अपने भाईके समान ही हैं; किंतु पराक्रममें उससे भी बढ़कर हैं। इनका स्वभाव शान्त है। ये बड़े भाई तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन रहते हैं और उनकी सेवा करते हैं। युद्धके अवसरोंपर इनका रोष और अमर्ष बहुत बढ़ जाता है॥ १०-११ ॥
'इन बुद्धिमान् जाम्बवान्ने देवासुर-संग्राममें इन्द्रकी बहुत बड़ी सहायता की थी और उनसे इन्हें बहुत-से वर भी प्राप्त हुए थे॥ १२ ॥
‘इनके बहुत-से सैनिक विचरते हैं, जिनके बल-पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है। इन सबके शरीर बड़ी-बड़ी रोमावलियोंसे भरे हुए हैं। ये राक्षसों और पिशाचोंके समान क्रूर हैं और बड़े-बड़े पर्वतशिखरोंपर चढ़कर वहाँसे महान् मेघोंके समान विशाल एवं विस्तृत शिलाखण्ड शत्रुओंपर छोड़ते हैं। इन्हें मृत्युसे कभी भय नहीं होता॥ १३-१४ ॥
‘जो खेल-खेलमें ही कभी उछलता और कभी खड़ा होता है, वहाँ खड़े हुए सब वानर जिसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखते हैं, जो यूथपतियोंका भी सरदार है और रोषसे भरा दिखायी देता है, यह दम्भ नामसे प्रसिद्ध यूथपति है। इसके पास बहुत बड़ी सेना है। राजन्! यह वानरराज दम्भ अपनी सेनाद्वारा ही सहस्राक्ष इन्द्रकी उपासना करता है—उनकी सहायताके लिये सेनाएँ भेजता रहता है॥ १५-१६ ॥
‘जो चलते समय एक योजन दूर खड़े हुए पर्वतको भी अपने पार्श्वभागसे छू लेता है और एक योजन ऊँचेकी वस्तुतक अपने शरीरसे ही पहुँचकर उसे ग्रहण कर लेता है, चौपायोंमें जिससे बड़ा रूप कहीं नहीं है, वह वानर संनादन नामसे विख्यात है। उसे वानरोंका पितामह कहा जाता है। उस बुद्धिमान् वानरने किसी समय इन्द्रको अपने साथ युद्धका अवसर दिया था, किंतु वह उनसे परास्त नहीं हुआ था, वही यह यूथपतियोंका भी सरदार है॥ १७—१९ ॥
‘युद्धके लिये जाते समय जिसका पराक्रम इन्द्रके समान दृष्टिगोचर होता है तथा देवताओं और असुरोंके युद्धमें देवताओंकी सहायताके लिये जिसे अग्निदेवने एक गन्धर्व-कन्याके गर्भसे उत्पन्न किया था, वही यह क्रथन नामक यूथपति है। राक्षसराज! बहुत-से किन्नर जिनका सेवन करते हैं, उन बड़े-बड़े पर्वतोंका जो राजा है और आपके भाई कुबेरको सदा विहारका सुख प्रदान करता है तथा जिसपर उगे हुए जामुनके वृक्षके नीचे राजाधिराज कुबेर बैठा करते हैं, उसी पर्वतपर यह तेजस्वी बलवान् वानरशिरोमणि श्रीमान् क्रथन भी रमण करता है। यह युद्धमें कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता और दस अरब वानरोंसे घिरा रहता है। यह भी अपनी सेनाके द्वारा लङ्काको रौंद डालनेका हौसला रखता है॥ २०—२४ ॥
‘जो हाथियों और वानरोंके पुराने* वैरका स्मरण करके गज-यूथपतियोंको भयभीत करता हुआ गङ्गाके किनारे विचरा करता है, जंगली पेड़ोंको तोड़-उखाड़कर उनके द्वारा हाथियोंको आगे बढ़नेसे रोक देता है, पर्वतोंकी कन्दरामें सोता और जोर-जोरसे गर्जना करता है, वानरयूथोंका स्वामी तथा संचालक है, वानरोंकी सेनामें जिसे प्रमुख वीर माना जाता है, जो गङ्गातटपर विद्यमान उशीरबीज नामक पर्वत तथा गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलका आश्रय लेकर रहता एवं रमण करता है और जो वानरोंमें उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान रखता है जैसे स्वर्गके देवताओंमें साक्षात् इन्द्र,
वही यह दुर्जय वीर प्रमाथी नामक यूथपति है। इसके साथ बल और पराक्रमपर गर्व रखकर गर्जना करनेवाले दस करोड़ वानर रहते हैं, जो अपने बाहुबलसे सुशोभित होते हैं। यह प्रमाथी इन सभी महात्मा वानरोंका नेता है। वायुके वेगसे उठे हुए मेघकी भाँति जिस वानरकी ओर आप बारंबार देख रहे हैं, जिससे सम्बन्ध रखनेवाले वेगशाली वानरोंकी सेना भी रोषसे भरी दिखायी देती है तथा जिसकी सेनाद्वारा उड़ायी गयी धूमिल रंगकी बहुत बड़ी धूलिराशि वायुसे सब ओर फैलकर जिसके निकट गिर रही है, वही यह प्रमाथी नामक वीर है॥ २५—३१ १/२ ॥
‘ये काले मुँहवाले लंगूरजातिके वानर हैं। इनमें महान् बल है। इन भयंकर वानरोंकी संख्या एक करोड़ है। महाराज! जिसने सेतु बाँधनेमें सहायता की है, उस लंगूरजातिके गवाक्ष नामक यूथपतिको चारों ओरसे घेरकर ये वानर चल रहे हैं और लङ्काको बलपूर्वक कुचल डालनेके लिये जोर-जोरसे गर्जना करते हैं॥ ३२-३३ १/२ ॥
‘जिस पर्वतपर सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले वृक्ष भ्रमरोंसे सेवित दिखायी देते हैं, सूर्यदेव अपने ही समान वर्णवाले जिस पर्वतकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, जिसकी कान्तिसे वहाँके मृग और पक्षी सदा सुनहरे रंगके प्रतीत होते हैं, महात्मा महर्षिगण जिसके शिखरका कभी त्याग नहीं करते हैं, जहाँके सभी वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंको फलके रूपमें प्रदान करते हैं और उनमें सदा फल लगे रहते हैं, जिस श्रेष्ठ शैलपर बहुमूल्य मधु उपलब्ध होता है, उसी रमणीय सुवर्णमय पर्वत महामेरुपर ये प्रमुख वानरोंमें प्रधान यूथपति केसरी रमण करते हैं॥ ३४—३७ १/२ ॥
‘साठ हजार जो रमणीय सुवर्णमय पर्वत हैं, उनके बीचमें एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम है सावणिर्मेरु। निष्पाप निशाचरपते! जैसे राक्षसोंमें आप श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पर्वतोंमें वह सावणिर्मेरु उत्तम है॥ ३८ १/२ ॥
‘वहाँ जो पर्वतका अन्तिम शिखर है, उसपर कपिल (भूरे), श्वेत, लाल मुँहवाले और मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले वानर निवास करते हैं, जिनके दाँत बड़े तीखे हैं और नख ही उनके आयुध हैं। वे सब सिंहके समान चार दाँतोंवाले, व्याघ्रके समान दुर्जय, अग्निके समान तेजस्वी और प्रज्वलित मुखवाले विषधर सर्पके समान क्रोधी होते हैं। उनकी पूँछ बहुत बड़ी ऊपरको उठी हुईं और सुन्दर होती है। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी, महान् पर्वतके समान ऊँचे और सुदृढ़ शरीरवाले तथा महान् मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले हैं। उनके नेत्र गोल-गोल एवं
पिङ्गल वर्णके होते हैं। उनके चलनेपर बड़ा भयानक शब्द होता है। वे सभी वानर यहाँ आकर इस तरह खड़े हैं, मानो आपकी लङ्काको देखते ही मसल डालेंगे॥ ३९—४२ १/२ ॥
‘देखिये उनके बीचमें यह उनका पराक्रमी सेनापति खड़ा है। यह बड़ा बलवान् है और विजयकी प्राप्तिके लिये सदा सूर्यदेवकी उपासना करता है। राजन्! यह वीर इस भूमण्डलमें शतबलिके नामसे विख्यात है॥ ४३-४४ ॥
‘बलवान्, पराक्रमी तथा शूरवीर यह शतबलि भी अपने ही पुरुषार्थके भरोसे युद्धके लिये खड़ा है और अपनी सेनाद्वारा लङ्कापुरीको मसल डालना चाहता है। यह वानरवीर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये अपने प्राणोंपर भी दया नहीं करता है॥ ४५ १/२ ॥
‘गज, गवाक्ष, गवय, नल और नील—इनमेंसे एक-एक सेनापति दस-दस करोड़ योद्धाओंसे घिरा हुआ है॥ ४६ १/२ ॥
‘इसी तरह विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाले और भी बहुत-से शीघ्र पराक्रमी श्रेष्ठ वानर हैं, जो अधिक होनेके कारण गिने नहीं जा सकते॥ ४७ ॥
‘महाराज! ये सभी वानर बड़े प्रभावशाली हैं। सभीके शरीर बड़े-बड़े पर्वतोंके समान विशाल हैं और सभी क्षणभरमें भूमण्डलके समस्त पर्वतोंको चूर-चूर करके सब ओर बिखेर देनेकी शक्ति रखते हैं’॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७ ॥
* हनुमान्जीके पिता वानरराज केसरीने शम्बसादन नामक राक्षसको, जो हाथीका रूप धारण करके आया था, मार डाला था। इसीसे पूर्वकालमें हाथियोंसे वानरोंका वैर बँध गया था।
अट्ठाइसवाँ सर्ग
अट्ठाइसवाँ सर्ग
शुकके द्वारा सुग्रीवके मन्त्रियोंका, मैन्द और द्विविदका, हनुमान्का, श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीवका परिचय देकर वानरसेनाकी संख्याका निरूपण करना
‘उस सारी वानरीसेनाका परिचय देकर जब सारण चुप हो गया, तब उसका कथन सुनकर शुकने राक्षसराज रावणसे कहा— ॥ १ ॥
‘राजन्! जिन्हें आप मतवाले महागजराजोंके समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं, जो गङ्गातटके वटवृक्षों और हिमालयके सालवृक्षोंके समान जान पड़ते हैं, इनका वेग दुस्सह है। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् हैं। दैत्यों और दानवोंके समान शक्तिशाली तथा युद्धमें देवताओंके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं॥ २-३ ॥
‘इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र, सहस्र शङ्कु और सौ वृन्द है*। ये सब-के-सब वानर सदा किष्किन्धामें रहनेवाले सुग्रीवके मन्त्री हैं। इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धर्वोंसे हुई है। ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं॥ ४-५ ॥
‘राजन्! आप इन वानरोंमें देवताओंके समान रूपवाले जिन दो वानरोंको खड़ा देख रहे हैं उनके नाम हैं मैन्द और द्विविद। युद्धमें उनकी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन दोनोंने अमृतपान किया है। ये दोनों वीर अपने बल-पराक्रमसे लङ्काको कुचल डालनेकी इच्छा रखते हैं॥ ६-७ ॥
‘इधर जिसे आप मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीकी भाँति खड़ा देख रहे हैं, जो वानर कुपित होनेपर समुद्रको भी विक्षुब्ध कर सकता है, जो लङ्कामें आपके पास आया था और विदेहनन्दिनी सीतासे मिलकर गया था, उसे देखिये। पहलेका देखा हुआ यह वानर फिर आया है। यह केसरीका बड़ा पुत्र है। पवनपुत्रके भी नामसे विख्यात है। उसे लोग हनुमान् कहते हैं। इसीने पहले समुद्र लाँघा था॥ ८—१० ॥
‘बल और रूपसे सम्पन्न यह श्रेष्ठ वानर अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण कर सकता है। इसकी गति कहीं नहीं रुकती। यह वायुके समान सर्वत्र जा सकता है॥ ११। ‘जब यह बालक था उस समयकी बात है, एक दिन इसको बहुत भूख लगी थी। उस समय उगते हुए सूर्यको देखकर यह तीन हजार योजन ऊँचा उछल गया था। उस समय मन-ही-मन यह निश्चय करके कि
‘यहाँके फल आदिसे मेरी भूख नहीं जायगी, इसलिये सूर्यको (जो आकाशका दिव्य फल है) ले आऊँगा’ यह बलाभिमानी वानर ऊपरको उछला था॥ १२-१३ ॥
‘देवर्षि और राक्षस भी जिन्हें परास्त नहीं कर सकते, उन सूर्यदेवतक न पहुँचकर यह वानर उदयगिरिपर ही गिर पड़ा॥ १४ ॥
‘वहाँके शिलाखण्डपर गिरनेके कारण इस वानरकी एक हनु (ठोढ़ी) कुछ कट गयी; साथ ही अत्यन्त दृढ़ हो गयी, इसलिये यह ‘हनुमान्’ नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ १५ ॥
‘विश्वसनीय व्यक्तियोंके सम्पर्कसे मैंने इस वानरका वृत्तान्त ठीक-ठीक जाना है। इसके बल, रूप और प्रभावका पूर्णरूपसे वर्णन करना किसीके लिये भी असम्भव है। यह अकेला ही सारी लङ्काको मसल देना चाहता है। जिसे आपने लङ्कामें रोक रखा था, उस अग्निको भी जिसने अपनी पूँछद्वारा प्रज्वलित करके सारी लङ्का जला डाली, उस वानरको आप भूलते कैसे हैं?॥ १६-१७ ॥
‘हनुमान्जीके पास ही जो कमलके समान नेत्रवाले साँवले शूरवीर विराज रहे हैं, वे इक्ष्वाकुवंशके अतिरथी हैं। इनका पौरुष सम्पूर्ण लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ १८ ॥
‘धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता। ये धर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते तथा ब्रह्मास्त्र और वेद दोनोंके ज्ञाता हैं। वेदवेत्ताओंमें इनका बहुत ऊँचा स्थान है॥ १९ ॥
‘ये अपने बाणोंसे आकाशका भी भेदन कर सकते हैं, पृथ्वीको भी विदीर्ण करनेकी क्षमता रखते हैं। इनका क्रोध मृत्युके समान और पराक्रम इन्द्रके तुल्य है॥ २० ॥
‘राजन्! जिनकी भार्या सीताको आप जनस्थानसे हर लाये हैं, वे ही ये श्रीराम आपसे युद्ध करनेके लिये सामने आकर खड़े हैं॥ २१ ॥
‘उनके दाहिने भागमें जो ये शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान्, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, कुछ-कुछ लाल नेत्रवाले तथा मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश धारण करनेवाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है। ये अपने भाऽके प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले हैं, राजनीति और युद्धमें कुशल हैं तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं॥ २२-२३ ॥
‘ये अमर्षशील, दुर्जय, विजयी, पराक्रमी, शत्रुको पराजित करनेवाले तथा बलवान् हैं। लक्ष्मण सदा ही श्रीरामके दाहिने हाथ और बाहर विचरनेवाले प्राण हैं॥
‘इन्हें श्रीरघुनाथजीके लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका भी ध्यान नहीं रहता। ये अकेले ही युद्धमें सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर देनेकी इच्छा रखते हैं॥ २५॥
‘श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर जो राक्षसोंसे घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं। राजाधिराज श्रीरामने इन्हें लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। अब ये आपपर कुपित होकर युद्धके लिये सामने आ गये हैं॥
‘जिन्हें आप सब वानरोंके बीचमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरोंके स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं॥ २८॥
‘जैसे हिमालय सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुलकी दृष्टिसे समस्त वानरोंमें सर्वोपरि विराजमान हैं॥ २९॥
‘ये गहन वृक्षोंसे युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफामें निवास करते हैं। पर्वतोंके कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। इनके साथ वहाँ प्रधान-प्रधान यूथपति भी रहते हैं॥ ३०॥
‘इनके गलेमें जो सौ कमलोंकी सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवीका निवास है। उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं॥ ३१॥
‘भगवान् श्रीरामने वालीको मारकर यह माला, तारा और वानरोंका राज्य—ये सब वस्तुएँ सुग्रीवको समर्पित कर दीं॥ ३२॥
‘मनीषी पुरुष सौ लाखकी संख्याको एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि (एक नील)-को एक शङ्कु कहा जाता है॥ ३३॥
‘एक लाख शङ्कुको महाशङ्कु नाम दिया गया है। एक लाख महाशङ्कुको वृन्द कहते हैं॥ ३४॥
‘एक लाख वृन्दका नाम महावृन्द है। एक लाख महावृन्दको पद्म कहते हैं॥ ३५॥
‘एक लाख पद्मको महापद्म माना गया है। एक लाख महापद्मको खर्व कहते हैं॥ ३६॥
‘एक लाख खर्वका महाखर्व होता है। एक सहस्र महाखर्वको समुद्र कहते हैं। एक लाख समुद्रको ओघ कहते हैं और एक लाख ओघकी महौघ संज्ञा है॥ ३७ १/२॥
‘इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शङ्कु, सहस्र महाशङ्कु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म, सौ खर्व, सौ समुद्र, सौ महौघ तथा समुद्र-सदृश (सौ) कोटि महौघ सैनिकोंसे, वीर विभीषणसे तथा अपने सचिवोंसे घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्धके लिये ललकारते