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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इक्यासीवाँ सर्ग

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इक्यासीवाँ सर्ग

इन्द्रजित्के द्वारा मायामयी सीताका वध

महात्मा रघुनाथजीके मनोभावको समझकर इन्द्रजित् युद्धसे निवृत्त हो लङ्कापुरीमें चला गया॥ १ ॥

वहाँ जानेपर बलवान् राक्षसोंके वधका स्मरण हो आनेसे शूरवीर रावणकुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह पुनः युद्धके लिये निकला॥ २ ॥

पुलस्त्यकुलमें उत्पन्न महापराक्रमी इन्द्रजित् देवताओंके लिये कण्टकरूप था। वह राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर नगरके पश्चिम द्वारसे पुनः बाहर आया॥ ३ ॥

दोनों भाई वीर श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रजित्ने उस समय माया प्रकट की॥ ४ ॥

उसने मायामयी सीताका निर्माण करके उसे अपने रथपर बिठा लिया और विशाल सेनाके घेरेमें रखकर उसका वध करनेका विचार किया॥ ५ ॥

उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी। उसने सबको मोहमें डालनेका विचार करके मायासे बनी हुई सीताको मारनेका निश्चय किया। इसी अभिप्रायसे वह वानरोंके सामने गया॥

उसे युद्धके लिये निकलते देख सभी वानर क्रोधसे भर गये और हाथमें शिला उठाये युद्धकी इच्छासे उसके ऊपर टूट पड़े॥ ७ ॥

कपिकुञ्जर हनुमान्जी उन सबके आगे-आगे चले। उन्होंने पर्वतका एक बहुत बड़ा शिखर ले रखा था, जिसे उठाना दूसरेके लिये नितान्त कठिन था॥ ८ ॥

उन्होंने इन्द्रजित्के रथपर सीताको देखा। उनकी खुशी मारी गयी थी। वे एक वेणी धारण किये बहुत दुःखी दिखायी देती थीं और उपवास करनेके कारण उनका मुख दुबला-पतला हो गया था॥ ९ ॥

उनके शरीरपर एक ही मलिन वस्त्र था। श्रीरघुनाथजीकी प्रिया सीताके अङ्गोंमें उबटन आदि नहीं लगे थे। उनके सारे शरीरमें धूल और मैल भरी थी तो भी वे श्रेष्ठ और सुन्दर दिखायी देती थीं॥ १० ॥

हनुमान्जी कुछ देरतक उनकी ओर देखते रहे। अन्तमें यह निश्चय किया कि ये मिथिलेशकुमारी ही हैं। उन्होंने जनककिशोरीको थोड़े ही दिन पहले देखा था, इसलिये वे शीघ्र ही उन्हें पहचान सके थे॥ ११ ॥

राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्के पास रथपर बैठी हुई तपस्विनी सीता शोकसे पीड़ित, दीन एवं आनन्दशून्य हो रही थीं॥ १२ ॥

सीताको वहाँ देखकर महाकपि हनुमान्जी यह सोचने लगे कि आखिर इस राक्षसका अभिप्राय क्या है? फिर वे मुख्य-मुख्य वानरोंको साथ लेकर रावणपुत्रकी ओर दौड़े॥ १३ ॥

वानरोंकी उस सेनाको अपनी ओर आती देख रावणकुमारके क्रोधकी सीमा न रही। उसने तलवारको म्यानसे बाहर निकाला और सीताके सिरके केश पकड़कर उन्हें घसीटा॥ १४ ॥

मायाद्वारा रथपर बैठायी हुई वह स्त्री ‘हा राम, हा राम’ कहकर चिल्ला रही थी और वह राक्षस उन सबके देखते-देखते उस स्त्रीको पीट रहा था॥ १५ ॥

सीताका केश पकड़ा गया देख हनुमान्जीको बड़ा दुःख हुआ। वे पवनकुमार हनुमान् अपने नेत्रोंसे दुःखजनित आँसू बहाने लगे॥ १६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी सर्वाङ्गसुन्दरी प्यारी पटरानी सीताको उस अवस्थामें देख हनुमान्जी कुपित हो उठे और उस राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्से कठोर वाणीमें बोले— ॥ १७ ॥

‘दुरात्मन्! तू अपने विनाशके लिये ही तुला हुआ है, तभी सीताके केशोंका स्पर्श कर रहा है। तेरा जन्म ब्रह्मर्षियोंके कुलमें हुआ है तथापि तूने राक्षस-जातिके स्वभावका ही आश्रय लिया है॥ १८ ॥

‘अरे! तेरी बुद्धि ऐसी बिगड़ी हुई है? धिक्कार है तुझ-जैसे पापाचारीको! नृशंस! अनार्य! दुराचारी तथा पापपूर्ण पराक्रम करनेवाले नीच! तेरी यह करतूत नीच पुरुषोंके ही योग्य है। निर्दयी! तेरे हृदयमें तनिक भी दया नहीं है॥ १९ ॥

‘बेचारी मिथिलेशकुमारी घरसे, राज्यसे और श्रीरामचन्द्रजीके करकमलोंके आश्रयसे भी बिछड़ गयी हैं। निष्ठुर! इन्होंने तेरा क्या अपराध किया है, जो तू इन्हें इतनी निर्दयतासे मार रहा है?॥ २० ॥

‘सीताको मारकर तू अधिक कालतक किसी तरह जीवित नहीं रह सकेगा। वधके योग्य नीच! तू अपने पापकर्मके कारण मेरे हाथमें पड़ गया है (अब तेरा जीना कठिन है)॥ २१ ॥

‘लोकमें अपने पापके कारण वधके योग्य माने गये जो चोर आदि हैं, वे भी जिन लोकोंकी निन्दा करते हैं तथा जो स्त्री-हत्यारोंको ही मिलते हैं, तू यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करके उन्हीं नरक-लोकोंमें जायगा’॥ २२ ॥

ऐसी बातें कहते हुए हनुमान्जी अत्यन्त कुपित हो शिला आदि आयुध धारण करनेवाले वानरवीरोंके साथ राक्षसराजकुमारपर टूट पड़े॥ २३ ॥

वानरोंके उस महापराक्रमी सैन्य-समुदायको आक्रमण करते देख इन्द्रजित्ने भयानक क्रोधवाले राक्षसोंकी सेनाके द्वारा उसे आगे बढ़नेसे रोका॥ २४ ॥

फिर सहस्रों बाणोंद्वारा उस वानरवाहिनीमें हलचल मचाकर इन्द्रजित्ने कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीसे कहा—॥ २५ ॥

‘वानर! सुग्रीव, राम और तुम सब लोग जिसके लिये यहाँतक आये हो, उस विदेहकुमारी सीताको मैं अभी तुम्हारे देखते-देखते मार डालूँगा। इसे मारकर मैं क्रमशः राम-लक्ष्मणका, तुम्हारा, सुग्रीवका तथा उस अनार्य विभीषणका भी वध कर डालूँगा॥ २६-२७ ॥

‘बंदर! तुम जो यह कह रहे थे कि स्त्रियोंको मारना नहीं चाहिये, उसके उत्तरमें मुझे यह कहना है कि जिस कार्यके करनेसे शत्रुओंको अधिक कष्ट पहुँचे, वह कर्तव्य ही माना गया है॥ २८ ॥

हनुमान्जीसे ऐसा कहकर इन्द्रजित्ने स्वयं ही तेज धारवाली तलवारसे उस रोती हुई मायामयी सीतापर घातक प्रहार किया॥ २९ ॥

शरीरमें यज्ञोपवीत धारण करनेका जो स्थान है, उसी जगहसे उस मायामयी सीताके दो टुकड़े हो गये और वह स्थूल कटिप्रदेशवाली प्रियदर्शना तपस्विनी पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ३० ॥

उस स्त्रीका वध करके इन्द्रजित्ने हनुमान्से कहा—‘देख लो, मैंने रामकी इस प्यारी पत्नीको तलवारसे काट डाला। यह रही कटी हुई विदेह-राजकुमारी सीता। अब तुमलोगोंका युद्धके लिये परिश्रम व्यर्थ है’॥ ३१ ॥

इस प्रकार स्वयं इन्द्रजित् विशाल खड्गसे उस मायामयी स्त्रीका वध करके रथपर बैठा-बैठा बड़े हर्षके साथ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा॥ ३२ ॥

पास ही खड़े हुए वानरोंने उसकी उस गर्जनाको सुना। वह उस दुर्गम रथपर बैठकर मुँह बाये विकट सिंहनाद करता था॥ ३३ ॥

रावणके उस पुत्रकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। उसने इस प्रकार मायामयी सीताका वध करके अपने मनमें बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। उसे हर्षसे उत्फुल्ल देख वानर विषादग्रस्त हो भाग खड़े हुए॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८१ ॥

बयासीवाँ सर्ग

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बयासीवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीके नेतृत्वमें वानरों और निशाचरोंका युद्ध, हनुमान्‌जीका श्रीरामके पास लौटना और इन्द्रजित्‌का निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर होम करना

इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान उस भयंकर सिंहनादको सुनकर वानर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए जोर-जोरसे भागने लगे॥ १ ॥

उन सबको विषादग्रस्त, दीन एवं भयभीत होकर भागते देख पवनकुमार हनुमान्‌जीने कहा—॥ २ ॥

‘वानरो! तुम क्यों मुखपर विषाद लिये युद्धवि षयक उत्साह छोड़कर भागे जा रहे हो? तुम्हारा वह शौर्य कहाँ चला गया?॥ ३ ॥

‘मैं युद्धमें आगे-आगे चलता हूँ। तुम सब लोग मेरे पीछे आ जाओ। उत्तम कुलमें उत्पन्न शूरवीरोंके लिये युद्धमें पीठ दिखाना सर्वथा अनुचित है’॥ ४ ॥

बुद्धिमान् वायुपुत्रके ऐसा कहनेपर वानरोंका चित्त प्रसन्न हो गया और राक्षसोंके प्रति अत्यन्त कुपित हो उन्होंने हाथोंमें पर्वतशिखर और वृक्ष उठा लिये॥ ५ ॥

वे श्रेष्ठ वानरवीर उस महासमरमें हनुमान्‌जीको चारों ओरसे घेरकर उनके पीछे-पीछे चले और जोर-जोरसे गर्जना करते हुए वहाँ राक्षसोंपर टूट पड़े॥ ६ ॥

उन श्रेष्ठ वानरोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए हनुमान्‌जी ज्वालामालाओंसे युक्त प्रज्वलित अग्निकी भाँति शत्रु-सेनाको दग्ध करने लगे॥ ७ ॥

वानर-सैनिकोंसे घिरे हुए उन महाकपि हनुमान्‌जीने प्रलयकालके संहारकारी यमराजके समान राक्षसोंका संहार आरम्भ किया॥ ८ ॥

सीताके वधसे उनके मनमें बड़ा शोक हो रहा था और इन्द्रजित्‌का अत्याचार देखकर उनका क्रोध भी बहुत बढ़ गया था; इसलिये हनुमान्‌जीने रावणकुमारके रथपर एक बहुत बड़ी शिला फेंकी॥ ९ ॥

उसे अपने ऊपर आती देख सारथिने तत्काल ही अपने अधीन रहनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए उस रथको बहुत दूर हटा दिया॥ १० ॥

अतः सारथिसहित रथपर बैठे हुए इन्द्रजित्के पासतक न पहुँचकर वह शिला धरती फोड़कर उसके भीतर समा गयी। उसके चलानेका सारा उद्योग व्यर्थ हो गया॥ ११ ॥

उस शिलाके गिरनेपर उस राक्षस-सेनाको बड़ी पीड़ा हुई। गिरती हुई उस शिलाने बहुतेरे राक्षसोंको कुचल डाला॥ १२ ॥

तत्पश्चात् सैकड़ों विशालकाय वानर हाथोंमें वृक्ष एवं पर्वत-शिखर उठाये गर्जना करते हुए इन्द्रजित्की ओर दौड़े॥ १३ ॥

वे भयानक पराक्रमी वानरवीर युद्धस्थलमें इन्द्रजित्पर उन वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको फेंकने लगे। वृक्षों और शैलशिखरोंकी बड़ी भारी वृष्टि करते हुए वे वानर शत्रुओंका संहार करने और भाँति-भाँतिकी आवाजमें गर्जने लगे॥ १४ १/२ ॥

उन महाभयंकर वानरोंने वृक्षोंद्वारा घोररूपधारी निशाचरोंको बलपूर्वक मार गिराया। वे रणभूमिमें गिरकर छटपटाने लगे॥ १५ १/२ ॥

अपनी सेनाको वानरोंद्वारा पीड़ित हुई देख इन्द्रजित् क्रोधपूर्वक अस्त्र-शस्त्र लिये शत्रुओंके सामने गया॥ १६ १/२ ॥

अपनी सेनासे घिरे हुए उस सुदृढ़ पराक्रमी वीर निशाचरने बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए शूल, वज्र, तलवार, पट्टिश तथा मुद्गरोंकी मारसे बहुत-से वानरवीरोंको हताहत कर दिया॥ १७-१८ ॥

वानरोंने भी युद्धस्थलमें इन्द्रजित्के अनुचरोंको मारा। महाबली हनुमान्जी सुन्दर शाखाओं और डालियोंवाले सालवृक्षों तथा शिलाओंद्वारा भीमकर्मा राक्षसोंका संहार करने लगे॥ १९ १/२ ॥

इस तरह शत्रुसेनाका वेग रोककर हनुमान्जीने वानरोंसे कहा— ‘बन्धुओ! अब लौट चलो, अब हमें इस सेनाके संहार करनेकी आवश्यकता नहीं रह गयी है॥ २० १/२ ॥

‘हमलोग जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर प्राणोंका मोह छोड़ पूरी चेष्टाके साथ युद्ध करते थे, वे जनककिशोरी सीता मारी गयीं॥

‘अब इस बातकी सूचना भगवान् श्रीराम और सुग्रीवको दे देनी चाहिये। फिर वे दोनों इसके लिये जैसा प्रतीकार सोचेंगे, वैसा ही हम भी करेंगे’॥ २२ १/२ ॥

ऐसा कहकर वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने सब वानरोंको युद्धसे मना कर दिया और धीरे-धीरे सारी सेनाके साथ निर्भय होकर लौट आये॥ २३ १/२ ॥

हनुमान्जीको श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते देख दुरात्मा इन्द्रजित् होम करनेकी इच्छासे निकुम्भिलादेवीके मन्दिरमें गया॥ २४ १/२ ॥

निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर उस निशाचर इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति दी। तदनन्तर यज्ञभूमिमें भी जाकर उस राक्षसने अग्निदेवको होमके द्वारा तृप्त किया। वे होमशोणितभोजी आभिचारिक अग्निदेवता आहुति पाते ही होम और शोणितसे तृप्त हो प्रज्वलित हो उठे और ज्वालाओंसे आवृत्त दिखायी देने लगे। वे तीव्र तेजवाले अग्निदेवता संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रकट हुए थे॥

इन्द्रजित् यज्ञके विधानका ज्ञाता था। उसने समस्त राक्षसोंके अभ्युदयके लिये विधिपूर्वक हवन करना आरम्भ किया। उस होमको देखकर महायुद्धके अवसरोंपर नीति-अनीति—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञाता राक्षस खड़े हो गये॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८२ ॥

तिरासीवाँ सर्ग

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तिरासीवाँ सर्ग

सीताके मारे जानेकी बात सुनकर श्रीरामका शोकसे मूर्च्छित होना और लक्ष्मणका उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थके लिये उद्यत होना

भगवान् श्रीरामने भी राक्षसों और वानरोंके उस महान् युद्धघोषको सुनकर जाम्बवान्‌से कहा—॥ १॥

‘सौम्य! निश्चय ही हनुमान्‌जीने अत्यन्त दुष्कर कर्म आरम्भ किया है; क्योंकि उनके आयुधोंका यह महाभयंकर शब्द स्पष्ट सुनायी पड़ता है॥ २॥

‘अतः ऋक्षराज! तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र जाओ और जूझते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌की सहायता करो’॥ ३॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर अपनी सेनासे घिरे हुए ऋक्षराज जाम्बवान् लङ्काके पश्चिम द्वारपर, जहाँ वानरवीर हनुमान्‌जी विराजमान थे, आये॥ ४॥

वहाँ ऋक्षराजने युद्ध करके लौटे और लम्बी साँस खींचते हुए वानरोंके साथ हनुमान्‌जीको आते देखा॥ ५॥

हनुमान्‌जीने भी मार्गमें नील मेघके समान भयंकर ऋक्षसेनाको युद्धके लिये उद्यत देख उसे रोका और सबके साथ ही वे लौट आये॥ ६॥

महायशस्वी हनुमान्‌जी उस सेनाके साथ शीघ्र भगवान् श्रीरामके निकट आये और दुःखी होकर बोले—॥ ७॥

‘प्रभो! हमलोग युद्ध करनेमें लगे थे, उसी समय समरभूमिमें रावणपुत्र इन्द्रजित्‌ने हमारे देखते-देखते रोती हुई सीताको मार डाला है॥ ८॥

‘शत्रुदमन! उन्हें उस अवस्थामें देख मेरा चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है। मैं विषादमें डूब गया हूँ। इसलिये मैं आपको यह समाचार बतानेके लिये आया हूँ’॥ ९॥

हनुमान्‌जीकी यह बात सुनकर श्रीरामजी उस समय शोकसे मूर्च्छित हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १०॥

देवतुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीको भूमिपर पड़ा देख समस्त श्रेष्ठ वानर सब ओरसे उछलकर वहाँ आ पहुँचे॥

वे कमल और उत्पलकी सुगन्धसे युक्त जल ले आकर उनके ऊपर छिड़कने लगे। उस समय वे सहसा प्रज्वलित होकर दहन-कर्म करनेवाली और बुझायी न जा सकनेवाली अग्निके समान दिखायी देते थे॥ १२ ॥

भाईकी यह अवस्था देखकर लक्ष्मणको बड़ा दुःख हुआ। वे उन्हें दोनों भुजाओंमें भरकर बैठ गये और अस्वस्थ हुए श्रीरामसे यह युक्तियुक्त एवं प्रयोजनभरी बात बोले— ॥ १३ ॥

‘आर्य! आप सदा शुभ मार्गपर स्थिर रहनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, तथापि धर्म आपको अनर्थोंसे बचा नहीं पाता है। इसलिये वह निरर्थक ही जान पड़ता है॥ १४ ॥

‘स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्म कारण नहीं है (क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्ममें उनका अधिकार ही है)। अतः धर्म सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है॥ १५ ॥

‘जैसे स्थावर भूत धर्माधिकारी न होनेपर भी सुखी देखा जाता है, उसी प्रकार जङ्गम प्राणी (पशु आदि) भी सुखी है, यह बात स्पष्ट ही समझमें आती है। यदि कहें, जहाँ धर्म है, वहाँ सुख अवश्य है तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उस दशामें आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषको विपत्तिमें नहीं पड़ना चाहिये॥ १६ ॥

‘यदि अधर्मकी भी सत्ता होती अर्थात् अधर्म अवश्य ही दुःखका साधन होता तो रावणको नरकमें पड़े रहना चाहिये था और आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषपर संकट नहीं आना चाहिये था॥ १७ ॥

‘रावणपर तो कोई संकट नहीं है और आप संकटमें पड़ गये हैं; अतः धर्म और अधर्म दोनों परस्परविरोधी हो गये हैं—धर्मात्माको दुःख और पापात्माको सुख मिलने लगा है॥ १८ ॥

‘यदि धर्मसे धर्मका फल (सुख) और अधर्मसे अधर्मका फल (दुःख) ही मिलनेका नियम होता तो जिन रावण आदिमें अधर्म ही प्रतिष्ठित है, वे अधर्मके फलभूत दुःखसे ही युक्त होते और जो लोग अधर्ममें रुचि नहीं रखते हैं, वे धर्मसे—धर्मके फलभूत सुखसे कभी वञ्चित न होते। धर्ममार्गसे चलनेवाले इन धर्मात्मा पुरुषोंको केवल धर्मका फल—सुख ही प्राप्त होता॥ १९-२० ॥

‘किंतु जिनमें अधर्म प्रतिष्ठित है, उनके तो धन बढ़ रहे हैं और जो स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले हैं, वे क्लेशमें पड़े हुए हैं। इसलिये ये धर्म और अधर्म—दोनों निरर्थक हैं॥ २१ ॥

‘रघुनन्दन! यदि पापाचारी पुरुष धर्म या अधर्मसे मारे जाते हैं तो धर्म या अधर्म क्रियारूप होनेके कारण (आदि, मध्य और अन्त) तीन ही क्षणोंतक रह सकता है। चतुर्थ क्षणमें तो वह स्वयं ही नष्ट हो जायगा; फिर नष्ट हुआ वह धर्म या अधर्म किसका वध करेगा?॥ २२ ॥

‘अथवा यह जीव यदि विधिपूर्वक किये गये कर्मविशेष (श्येनयाग आदि)-के द्वारा मारा जाता है या स्वयं वैसा कर्म करके दूसरेको मारता है तो विधि (विहित कर्मजनित अदृष्ट)-को ही हत्याके दोषसे लिप्त होना चाहिये, कर्मका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका उस पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं होना चाहिये। (क्योंकि पुत्रके किये हुए अपराधका दण्ड पिताको नहीं मिलता है)॥

‘शत्रुसूदन! जो चेतन न होनेके कारण प्रतीकारज्ञानसे शून्य है, अव्यक्त है और असत्के समान विद्यमान है, उस धर्मके द्वारा दूसरे (पापात्मा)-को वध्यरूपसे प्राप्त करना कैसे सम्भव है?॥ २४ ॥

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ रघुवीर! यदि सत्कर्मजनित अदृष्ट सत् या शुभ ही होता तो आपको कुछ भी अशुभ या दुःख नहीं प्राप्त होता। यदि आपको ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है तो सत्कर्म-जनित अदृष्ट सत् ही है, इस कथनकी संगति नहीं बैठती*॥ २५ ॥

‘यदि दुर्बल और कातर (स्वतः कार्य-साधनमें असमर्थ) होनेके कारण धर्म पुरुषार्थका अनुसरण करता है, तब तो दुर्बल और फलदानकी मर्यादासे रहित धर्मका सेवन ही नहीं करना चाहिये—यह मेरी स्पष्ट राय है॥ २६ ॥

‘यदि धर्म बल अथवा पुरुषार्थका अङ्ग या उपकरणमात्र है तो धर्मको छोड़कर पराक्रमपूर्ण बर्ताव कीजिये। जैसे आप धर्मको प्रधान मानकर धर्ममें लगे हैं, उसी प्रकार बलको प्रधान मानकर बल या पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होइये॥ २७ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन! यदि आप सत्यभाषणरूप धर्मका पालन करते हैं अर्थात् पिताकी आज्ञाको स्वीकार करके उनके सत्यकी रक्षारूप धर्मका अनुष्ठान करते हैं तो आप ज्येष्ठ पुत्रके प्रति युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी जो बात पिताने कही थी, उस सत्यका पालन न करनेपर पिताको जो असत्यरूप अधर्म प्राप्त हुआ, उसीके कारण वे आपसे वियुक्त होकर मर गये। ऐसी दशामें क्या आप राजाके पहले कहे हुए अभिषेक-सम्बन्धी सत्य वचनसे नहीं बँधे हुए थे? उस सत्यका पालन करनेके लिये बाध्य नहीं थे (यदि आपने पिताके पहले कहे हुए वचनका ही पालन करके युवराजपदपर अपना अभिषेक करा लिया होता तो न पिताकी मृत्यु हुई होती और न सीता-हरण आदि अनर्थ ही संघटित हुए होते)॥ २८ ॥

‘शत्रुदमन महाराज! यदि केवल धर्म अथवा अधर्म ही प्रधानरूपसे अनुष्ठानके योग्य होता तो वज्रधारी इन्द्र पौरुषद्वारा विश्वरूप मुनिकी हत्या (अधर्म) करके फिर यज्ञ (धर्म)-का अनुष्ठान नहीं करते॥ २९॥

‘रघुनन्दन! धर्मसे भिन्न जो पुरुषार्थ है, उससे मिला हुआ धर्म ही शत्रुओंका नाश करता है। अतः काकुत्स्थ! प्रत्येक मनुष्य आवश्यकता एवं रुचिके अनुसार इन सबका (धर्म एवं पुरुषार्थका) अनुष्ठान करता है॥ ३०॥

‘तात राघव! इस प्रकार समयानुसार धर्म एवं पुरुषार्थमेंसे किसी एकका आश्रय लेना धर्म ही है; ऐसा मेरा मत है। आपने उस दिन राज्यका त्याग करके धर्मके मूलभूत अर्थका उच्छेद कर डाला॥ ३१॥

‘जैसे पर्वतोंसे नदियाँ निकलती हैं, उसी तरह जहाँ-तहाँसे संग्रह करके लाये और बढ़े हुए अर्थसे सारी क्रियाएँ (चाहे वे योगप्रधान हों या भोगप्रधान) सम्पन्न होती हैं (निष्काम भाव होनेपर सभी क्रियाएँ योगप्रधान हो जाती हैं और सकाम भाव होनेपर भोगप्रधान)॥ ३२॥

‘जो मन्दबुद्धि मानव अर्थसे वञ्चित है, उसकी सारी क्रियाएँ उसी तरह छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें छोटी-छोटी नदियाँ सूख जाती हैं॥ ३३॥

‘जो पुरुष सुखमें पला हुआ है, वह यदि प्राप्त हुए अर्थको त्यागकर सुख चाहता है तो उस अभीष्ट सुखके लिये अन्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करनेमें प्रवृत्त होता है; इसलिये उसे ताड़न, बन्धन आदि दोष प्राप्त होते हैं॥ ३४॥

‘जिसके पास धन है, उसीके अधिक मित्र होते हैं। जिसके पास धनका संग्रह है, उसीके सब लोग भार्इ-बन्धु बनते हैं। जिसके यहाँ पर्याप्त धन है, वही संसारमें श्रेष्ठ पुरुष कहलाता है और जिसके पास धन है, वही विद्वान् समझा जाता है॥ ३५॥

‘जिसके यहाँ धनराशि एकत्र है, वह पराक्रमी कहा जाता है। जिसके पास धनकी अधिकता है, वह बुद्धिमान् माना जाता है। जिसके यहाँ अर्थसंग्रह है, वह महान् भाग्यशाली कहलाता है तथा जिसके यहाँ धन-सम्पत्ति है, वह गुणोंमें भी बढ़ा-चढ़ा समझा जाता है॥ ३६॥

‘अर्थका त्याग करनेसे जो मित्रका अभाव आदि दोष प्राप्त होते हैं, उनका मैंने स्पष्टरूपसे वर्णन किया है। आपने राज्य छोड़ते समय क्या लाभ सोचकर अपनी बुद्धिमें अर्थ-त्यागकी भावनाको स्थान दिया, यह मैं नहीं जानता॥ ३७॥

‘जिसके पास धन है, उसके धर्म और कामरूप सारे प्रयोजन सिद्ध होते हैं। उसके लिये सब कुछ अनुकूल बन जाता है। जो निर्धन है, वह अर्थकी इच्छा रखकर उसका अनुसंधान करनेपर भी पुरुषार्थके बिना उसे नहीं पा सकता॥ ३८ ॥

‘नरेश्वर! हर्ष, काम, दर्प, धर्म, क्रोध, शम और दम—ये सब धन होनेसे ही सफल होते हैं॥ ३९ ॥

‘जो धर्मका आचरण करनेवाले और तपस्यामें लगे हुए हैं, उन पुरुषोंका यह लोक (ऐहिक पुरुषार्थ) अर्थाभावके कारण ही नष्ट हो जाता है; यह स्पष्ट देखा जाता है। वही अर्थ इस दुर्दिनमें आपके पास उसी तरह नहीं दिखायी देता है, जैसे आकाशमें बादल घिर आनेपर ग्रहोंके दर्शन नहीं होते हैं॥ ४० ॥

‘वीर! आप पूज्य पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये राज्य छोड़कर वनमें चले आये और सत्यके पालनपर ही डटे रहे; परंतु राक्षसने आपकी पत्नीको, जो आपको प्राणोंसे भी अधिक प्यारी थी, हर लिया॥ ४१ ॥

‘वीर रघुनन्दन! आज इन्द्रजित्ने हमलोगोंको जो महान् दुःख दिया है, उसे मैं अपने पराक्रमसे दूर करूँगा; अतः चिन्ता छोड़कर उठिये॥ ४२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाबाहो! उठिये। आप परम बुद्धिमान् और परमात्मा हैं, इस रूपमें अपने-आपको क्यों नहीं समझ रहे हैं?॥ ४३ ॥

‘निष्पाप रघुवीर! यह मैंने आपसे जो कुछ कहा है, वह सब आपका प्रिय करनेके लिये—आपका ध्यान शोककी ओरसे हटाकर पुरुषार्थकी ओर आकृष्ट करनेके लिये कहा है। अब जनकनन्दिनीकी मृत्युका वृत्तान्त जानकर मेरा रोष बढ़ गया है, अतः आज अपने बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े, रथ और राक्षसराज रावणसहित सारी लङ्काको धूलमें मिला दूँगा’॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३ ॥


* इस अध्यायके १४ वेंसे २५ वें श्लोकतक लक्ष्मणजीने जो धर्म और अधर्मकी सत्ताका खण्डन किया है, वह श्रीरामको दुःखी देखकर स्वयं उनसे भी अधिक दुःखी होकर ही किया है। जिस प्रकार परात्पर श्रीरामके लिये अपनी प्रियाकी माया-मूर्तिके वधको देखकर शोकसे अभिभूत हो जाना प्रेमकी लीलामात्र है, उसी प्रकार प्रियतम प्रभुके दुःखको देखकर दुःखावेशकी लीलासे इस प्रकारकी असंगत-सी लगनेवाली बातें कहना भी प्रेमजनित कातरताका ही परिचायक है। आगे चलकर दुःखका आवेश कुछ कम हो जानेपर तो स्वयं लक्ष्मणजीने ही ४४ वें श्लोकमें स्पष्ट कहा है कि श्रीरामका शोकापनोदन करके उन्हें युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये ही उन्होंने ये सब बातें कही थीं। —सम्पादक

चौरासीवाँ सर्ग

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चौरासीवाँ सर्ग

विभीषणका श्रीरामको इन्द्रजित्की मायाका रहस्य बताकर सीताके जीवित होनेका विश्वास दिलाना और लक्ष्मणको सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें भेजनेके लिये अनुरोध करना

भ्रातृभक्त लक्ष्मण जब श्रीरामको इस प्रकार आश्वासन दे रहे थे, उसी समय विभीषण वानरसैनिकोंको अपने-अपने स्थानपर स्थापित करके वहाँ आये॥ १ ॥

नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये चार निशाचर वीर, जो काली कज्जल-राशिके समान काले शरीरवाले यूथपति गजराजोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे॥ २ ॥

वहाँ आकर उन्होंने देखा महात्मा लक्ष्मण शोकमें मग्न हैं तथा वानरोंके नेत्रोंमें भी आँसू भरे हुए हैं॥ ३ ॥

साथ ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन महात्मा श्रीरघुनाथजीपर भी उनकी दृष्टि पड़ी, जो मूर्च्छित हो लक्ष्मणकी गोदमें लेटे हुए थे॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको लज्जित तथा शोकसे संतप्त देख विभीषणका हृदय आन्तरिक दुःखसे दीन हो गया। उन्होंने पूछा— ‘यह क्या बात है?’॥ ५ ॥

तब लक्ष्मणने विभीषणके मुँहकी ओर देखकर तथा सुग्रीव और दूसरे-दूसरे वानरोंपर दृष्टिपात करके आँसू बहाते हुए मन्दस्वरमें कहा—॥ ६ ॥

‘सौम्य! हनुमान्‌जीके मुँहसे यह सुनकर कि ‘इन्द्रजित्‌ने सीताजीको मार डाला’ श्रीरघुनाथजी तत्काल मूर्च्छित हो गये हैं’॥ ७ ॥

इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मणको विभीषणने रोका और अचेत पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे यह निश्चित बात कही—॥ ८ ॥

‘महाराज! हनुमान्‌जीने दुःखी होकर जो आपको समाचार सुनाया है, उसे मैं समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव मानता हूँ॥ ९ ॥

‘महाबाहो! दुरात्मा रावणका सीताके प्रति क्या भाव है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। वह उनका वध कदापि नहीं करने देगा॥ १० ॥

‘मैंने उसका हित करनेकी इच्छासे अनेक बार यह अनुरोध किया कि विदेहकुमारीको छोड़ दो; किंतु उसने मेरी बात नहीं मानी॥ ११ ॥

‘सीताको दूसरा कोई पुरुष साम, दाम और भेदनीतिके द्वारा भी नहीं देख सकता; फिर युद्धके द्वारा कैसे देख सकता है?॥ १२ ॥

‘महाबाहो! राक्षस इन्द्रजित् वानरोंको मोहमें डालकर चला गया है। जिसका उसने वध किया था, वह मायामयी जानकी थीं, ऐसा निश्चित समझिये॥ १३ ॥

‘वह इस समय निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर होम करेगा और जब होम करके लौटेगा, उस समय उस रावणकुमारको संग्राममें परास्त करना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी कठिन होगा॥ १४ १/२ ॥

‘निश्चय ही उसने हमलोगोंको मोहमें डालनेके लिये ही यह मायाका प्रयोग किया है। उसने सोचा होगा— यदि वानरोंका पराक्रम चलता रहा तो मेरे इस कार्यमें विघ्न पड़ेगा (इसीलिये उसने ऐसा किया है)॥ १५ १/२ ॥

‘जबतक उसका होमकर्म समाप्त नहीं होता, उसके पहले ही हमलोग सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें चले चलें। नरश्रेष्ठ! झूठे ही प्राप्त हुए इस संतापको त्याग दीजिये॥ १६ १/२ ॥

‘प्रभो! आपको शोकसे संतप्त होते देख सारी सेना दुःखमें पड़ी हुई है। आप तो धैर्यमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अतः स्वस्थचित्त होकर यहीं रहिये और सेनाको लेकर जाते हुए हमलोगोंके साथ लक्ष्मणजीको भेज दीजिये॥

‘ये नरश्रेष्ठ लक्ष्मण अपने पैने बाणोंसे मारकर रावणकुमारको वह होमकर्म त्याग देनेके लिये विवश कर देंगे। इससे वह मारा जा सकेगा॥ १९ ॥

‘लक्ष्मणके ये पैने बाण जो पक्षियोंके अङ्गभूत परोंसे युक्त होनेके कारण बड़े वेगशाली हैं, कंक आदि क्रूर पक्षियोंके समान इन्द्रजित्के रक्तका पान करेंगे॥ २० ॥

‘अतः महाबाहो! जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंके वधके लिये वज्रका प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार आप उस राक्षसके विनाशके लिये शुभलक्षण-सम्पन्न लक्ष्मणको जानेकी आज्ञा दीजिये॥ २१ ॥

‘नरेश्वर! शत्रुका विनाश करनेमें अब यह कालक्षेप करना उचित नहीं है। इसलिये आप शत्रुवधके लिये उसी तरह लक्ष्मणको भेजिये, जैसे देवद्रोही दैत्योंके विनाशके लिये देवराज इन्द्र वज्रका प्रयोग करते हैं॥

‘वह राक्षसशिरोमणि इन्द्रजित् जब अपना अनुष्ठान पूरा कर लेगा, तब समराङ्गणमें देवता और असुर भी उसे देख नहीं सकेंगे। अपना कर्म पूरा करके जब वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिमें खड़ा होगा, उस समय देवताओंको भी अपने जीवनकी रक्षाके विषयमें महान् संदेह होने लगेगा' ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८४ ॥

पचासीवाँ सर्ग

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पचासीवाँ सर्ग

विभीषणके अनुरोधसे श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मणको इन्द्रजित्के वधके लिये जानेकी आज्ञा देना और सेनासहित लक्ष्मणका निकुम्भिला-मन्दिरके पास पहुँचना

भगवान् श्रीराम शोकसे पीड़ित थे, अतः राक्षस विभीषणने जो कुछ कहा, उनकी उस बातको सुनकर भी वे उसे स्पष्टरूपसे समझ न सके—उसपर पूरा ध्यान न दे सके॥ १ ॥

तदनन्तर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम धैर्य धारण करके हनुमान्जीके समीप बैठे हुए विभीषणसे बोले— ॥ २ ॥

‘राक्षसराज विभीषण! तुमने अभी-अभी जो बात कही है, उसे मैं फिर सुनना चाहता हूँ। बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?’॥ ३ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर बातचीतमें कुशल विभीषणने, वह जो बात कही थी, उसे पुनः दोहराते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥

‘महाबाहो! आपने जो सेनाओंको यथास्थान स्थापित करनेकी आज्ञा दी थी, वीर! वह काम तो मैंने आपकी आज्ञा होते ही पूरा कर दिया॥ ५ ॥

‘उन सब सेनाओंको विभक्त करके सब ओरके दरवाजोंपर स्थापित किया और यथोचित रीतिसे वहाँ अलग-अलग यूथपतियोंको भी नियुक्त कर दिया है॥

‘महाराज! अब पुनः मुझे जो बात आपकी सेवामें निवेदन करनी है, उसे भी सुन लीजिये। बिना किसी कारणके आपके संतप्त होनेसे हमलोगोंके हृदयमें भी बड़ा संताप हो रहा है॥ ७ ॥

‘राजन्! मिथ्या प्राप्त हुए इस शोक और संतापको त्याग दीजिये; साथ ही इस चिन्ताको भी अपने मनसे निकाल दीजिये; क्योंकि यह शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली है॥ ८ ॥

‘वीर! यदि आप सीताको पाना और निशाचरोंका वध करना चाहते हैं तो उद्योग कीजिये; हर्ष और उत्साहका सहारा लीजिये॥ ९ ॥

‘रघुनन्दन! मैं एक आवश्यक बात बताता हूँ, मेरी इस हितकर बातको सुनिये। रावणकुमार इन्द्रजित् निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर गया है, अतः ये सुमित्राकुमार लक्ष्मण विशाल सेना साथ लेकर अभी उसपर आक्रमण करें—युद्धमें उस रावणपुत्रका वध करनेके लिये उसपर चढ़ाई कर दें—यही अच्छा होगा॥ १० १/२ ॥

‘युद्धविजयी महाधनुर्धर लक्ष्मण अपने मण्डलाकार धनुषद्वारा छोड़े गये विषधर सर्पोंके तुल्य भयानक बाणोंसे रावणपुत्रका वध करनेमें समर्थ हैं॥ ११ १/२ ॥

‘उस वीरने तपस्या करके ब्रह्माजीके वरदानसे ब्रह्मशिर नामक अस्त्र और मनचाही गतिसे चलनेवाले घोड़े प्राप्त किये हैं॥ १२ ॥

‘निश्चय ही इस समय सेनाके साथ वह निकुम्भिलामें गया है। वहाँसे अपना हवन-कर्म समाप्त करके यदि वह उठेगा तो हम सब लोगोंको उसके हाथसे मरा ही समझिये॥ १३ ॥

‘महाबाहो! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजीने उसे वरदान देते हुए कहा था—‘इन्द्रशत्रो! निकुम्भिला नामक वटवृक्षके पास पहुँचने तथा हवन-सम्बन्धी कार्य पूर्ण करनेके पहले ही जो शत्रु तुझ आततायी (शस्त्रधारी)-को मारनेके लिये आक्रमण करेगा, उसीके हाथसे तुम्हारा वध होगा।’ राजन्! इस प्रकार बुद्धिमान् इन्द्रजित्की मृत्युका विधान किया गया है॥ १४-१५ ॥

‘इसलिये श्रीराम! आप इन्द्रजित्का वध करनेके लिये महाबली लक्ष्मणको आज्ञा दीजिये। उसके मारे जानेपर रावणको अपने सुहृदोंसहित मरा ही समझिये’॥

विभीषणके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी शोकका परित्याग करके बोले—‘सत्यपराक्रमी विभीषण! उस भयंकर राक्षसकी मायाको मैं जानता हूँ॥ १७ ॥

‘वह ब्रह्मास्त्रका ज्ञाता, बुद्धिमान्, बहुत बड़ा मायावी और महान् बलवान् है। वरुणसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी वह युद्धमें अचेत कर सकता है॥ १८ ॥

‘महायशस्वी वीर! जब इन्द्रजित् रथसहित आकाशमें विचरने लगता है, उस समय बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी गतिका कुछ पता ही नहीं चलता।’ विभीषणसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीरामने अपने शत्रु दुरात्मा इन्द्रजित्की मायाशक्तिको जानकर यशस्वी वीर लक्ष्मणसे यह बात कही—॥ १९-२० ॥

‘लक्ष्मण! वानरराज सुग्रीवकी जो भी सेना है, वह सब साथ ले हनुमान् आदि यूथपतियों, ऋक्षराज जाम्बवान् तथा अन्य सैनिकोंसे घिरे रहकर तुम मायाबलसे सम्पन्न राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्का वध करो॥ २१-२२ ॥

‘ये महामना राक्षसराज विभीषण उसकी मायाओंसे अच्छी तरह परिचित हैं, अतः अपने मन्त्रियोंके साथ ये भी तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे’॥ २३ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर विभीषण-सहित भयानक पराक्रमी लक्ष्मणने अपना श्रेष्ठ धनुष हाथमें लिया॥ २४ ॥

वे युद्धकी सब सामग्री लेकर तैयार हो गये। उन्होंने कवच धारण किया, तलवार बाँध ली और उत्तम बाण तथा बायें हाथमें धनुष ले लिये। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीके चरण छूकर हर्षसे भरे हुए सुमित्राकुमारने कहा— ॥ २५ ॥

‘आर्य! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावणकुमारको विदीर्ण करके उसी तरह लङ्कामें गिरेंगे, जैसे हंस कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें उतरते हैं॥ २६ ॥

‘इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज ही उस भयंकर राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसे कालके गालमें डाल देंगे’॥ २७ ॥

इन्द्रजित्के वधकी अभिलाषा रखनेवाले तेजस्वी लक्ष्मण अपने भाईके सामने ऐसी बात कहकर तुरंत वहाँसे चल दिये॥ २८ ॥

पहले उन्होंने अपने बड़े भाईके चरणोंमें प्रणाम किया, फिर उनकी परिक्रमा करके रावणकुमारद्वारा पालित निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया॥ २९ ॥

भाई श्रीरामद्वारा स्वस्तिवाचन किये जानेके पश्चात् विभीषणसहित प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण बड़ी उतावलीके साथ चले॥ ३० ॥

कई हजार वानरवीरोंके साथ हनुमान् और मन्त्रियोंसहित विभीषण भी लक्ष्मणके पीछे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए॥ ३१ ॥

विशाल वानर-सेनासहित घिरे हुए लक्ष्मणने वेगपूर्वक आगे बढ़कर मार्गमें खड़ी हुई ऋक्षराज जाम्बवान्की सेनाको देखा॥ ३२ ॥

दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमारने कुछ दूरसे ही देखा, राक्षसराज रावणकी सेना मोर्चा बाँधे खड़ी है॥ ३३ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण हाथमें धनुष ले ब्रह्माजीके निश्चित किये हुए विधानके अनुसार उस मायावी राक्षसको जीतनेके लिये निकुम्भिला नामक स्थानमें पहुँचकर एक जगह खड़े हो गये॥ ३४ ॥

उस समय प्रतापी राजकुमार लक्ष्मणके साथ विभीषण, वीर अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान् भी थे॥

चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे जो प्रकाशित हो रही थी, ध्वजों और महारथियोंके कारण गहन दिखायी देती थी, जिसके वेगका कोई माप नहीं था तथा जो अनेक प्रकारकी वेश-भूषामें दृष्टिगोचर होती थी, अन्धकारके समान काली उस शत्रुसेनामें विभीषण आदिके साथ लक्ष्मणने प्रवेश किया॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५ ॥

छियासीवाँ सर्ग

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छियासीवाँ सर्ग

वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमान्जीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्को द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना

उस अवस्थामें रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाली तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी॥ १ ॥

वे बोले—'लक्ष्मण! यह सामने जो मेघोंकी काली घटाके समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ शिलारूपी आयुध धारण करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें। इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा॥ २-३ ॥

'अतः आप इस हवन-कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्रतुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये॥ ४ ॥

'वीर! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर है; अतः इसका वध कीजिये'॥ ५ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६ ॥

साथ ही बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस-सेनापर एक साथ ही टूट पड़े॥ ७ ॥

उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे॥ ८ ॥

इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा। उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी॥ ९ ॥

नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत-शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया॥ १० ॥

विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानरयूथ पतियोंपर (नाना प्रकारके) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया॥ ११ ॥