भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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छियासीवाँ सर्ग

वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमान्जीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्को द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना

उस अवस्थामें रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाली तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी॥ १ ॥

वे बोले—'लक्ष्मण! यह सामने जो मेघोंकी काली घटाके समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ शिलारूपी आयुध धारण करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें। इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा॥ २-३ ॥

'अतः आप इस हवन-कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्रतुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये॥ ४ ॥

'वीर! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर है; अतः इसका वध कीजिये'॥ ५ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६ ॥

साथ ही बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस-सेनापर एक साथ ही टूट पड़े॥ ७ ॥

उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे॥ ८ ॥

इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा। उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी॥ ९ ॥

नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत-शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया॥ १० ॥

विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानरयूथ पतियोंपर (नाना प्रकारके) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया॥ ११ ॥