भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2059

उसी प्रकार वानर भी समराङ्गणमें सम्पूर्ण वृक्षों और पर्वतशिखरोंद्वारा समस्त राक्षसोंको मारने एवं हताहत करने लगे॥ १२ ॥

मुख्य-मुख्य महाकाय महाबली रीछों और वानरोंसे जूझते हुए राक्षसोंको महान् भय लगने लगा॥ १३ ॥

रावणकुमार इन्द्रजित् बड़ा दुर्धर्ष वीर था। उसने जब सुना कि मेरी सेना शत्रुओंद्वारा पीड़ित होकर बड़े दुःखमें पड़ गयी है, तब अनुष्ठान समाप्त होनेके पहले ही वह युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ॥ १४ ॥

उस समय उसके मनमें बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ था। वह वृक्षोंके अन्धकारसे निकलकर एक सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ, जो पहलेसे ही जोतकर तैयार रखा गया था। वह रथ बहुत ही सुदृढ़ था॥ १५ ॥

इन्द्रजित्के हाथमें भयंकर धनुष और बाण थे। वह काले कोयलेके ढेर-सा जान पड़ता था। उसके मुँह और नेत्र लाल थे। वह भयंकर राक्षस विनाशकारी मृत्युके समान प्रतीत होता था॥ १६ ॥

इन्द्रजित् रथपर बैठ गया, यह देखते ही लक्ष्मणके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले भयंकर वेगशाली राक्षसोंकी वह सेना उसके आसपास सब ओर खड़ी हो गयी॥ १७ ॥

उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने एक बहुत बड़े वृक्षको, जिसे तोड़ना या उखाड़ना कठिन था, उखाड़ लिया॥ १८ ॥

फिर तो वे वानरवीर प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे और युद्धस्थलमें राक्षसोंकी उस सेनाको दग्ध करते हुए बहुसंख्यक वृक्षोंकी मारसे अचेत करने लगे॥

पवनकुमार हनुमान्जी बड़े वेगसे राक्षस-सेनाका विध्वंस कर रहे हैं, यह देखते ही सहस्रों राक्षस उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ २० ॥

चमकीले शूल धारण करनेवाले राक्षस शूलोंसे, जिनके हाथोंमें तलवारें थीं वे तलवारोंसे, शक्तिधारी शक्तियोंसे और पट्टिशधारी राक्षस पट्टिशोंसे उनपर प्रहार करने लगे॥ २१ ॥

बहुत-से परिघों, गदाओं, सुन्दर भालों, सैकड़ों शतघ्नियों, लोहेके बने हुए मुद्गरों, भयानक फरसों, भिन्दिपालों, वज्रके समान मुक्कों और अशनितुल्य थप्पड़ोंसे वे समस्त राक्षस पास