भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1986, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1986

‘इस बुद्धिमान् राक्षसने अपने बाणोंद्वारा इन्द्रके वज्रको भी कुण्ठित कर दिया है तथा युद्धमें जलके स्वामी वरुणके पाशको भी सफल नहीं होने दिया है॥

‘राक्षसोंमें श्रेष्ठ यह बुद्धिमान् रावणकुमार अतिकाय बड़ा बलवान् तथा देवताओं और दानवोंके दर्पको भी दलन करनेवाला है॥ ३५ ॥

‘पुरुषोत्तम! अपने सायकोंसे यह सारी वानर-सेनाका संहार कर डाले, इसके पहले ही आप इस राक्षसको परास्त करनेका शीघ्र प्रयत्न कीजिये’॥ ३६ ॥

विभीषण और भगवान् श्रीराममें इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि बलवान् अतिकाय वानरोंकी सेनामें घुस आया और बारम्बार गर्जना करता हुआ अपने धनुषपर टंकार देने लगा॥ ३७ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ और भयंकर शरीरवाले उस राक्षसको रथपर बैठकर आते देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ आदि जो प्रधान-प्रधान महामनस्वी वानर थे, वे वृक्ष तथा पर्वतशिखर धारण किये एक साथ ही उसपर टूट पड़े॥ ३८-३९ ॥

परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी अतिकायने अपने सुवर्णभूषित बाणोंसे वानरोंके चलाये हुए वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको काट गिराया॥ ४० ॥

साथ ही उस बलवान् और भीमकाय निशाचरने युद्धस्थलमें सामने आये हुए उन समस्त वानरोंको लोहेके बाणोंसे बींध डाला॥ ४१ ॥

उसकी बाणवर्षासे आहत हो सबके शरीर क्षतवि क्षत हो गये। सबने हार मान ली और कोर्इ भी उस महासमरमें अतिकायका सामना करनेमें समर्थ न हो सके॥ ४२ ॥

जैसे जवानीके जोशसे भरा हुआ कुपित सिंह मृगोंके झुण्डको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार वह राक्षस वानरवीरोंकी उस सेनाको त्रास देने लगा॥ ४३ ॥

वानरोंके झुण्डमें विचरते हुए राक्षसराज अतिकायने किसी भी ऐसे योद्धाको नहीं मारा, जो उसके साथ युद्ध न कर रहा हो। धनुष और तरकस धारण किये वह निशाचर उछलकर श्रीरामके पास आ गया तथा बड़े गर्वसे इस प्रकार बोला—॥ ४४ ॥

‘मैं धनुष और बाण लेकर रथपर बैठा हूँ। किसी साधारण प्राणीसे युद्ध करनेका मेरा विचार नहीं है। जिसके अंदर शक्ति हो, साहस और उत्साह हो, वह शीघ्र यहाँ आकर मुझे युद्धका अवसर दे’॥ ४५ ॥

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