श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1985, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इसकी बाँहोंमें सोनेके बाजूबंद बँधे हुए हैं। उन भुजाओंके द्वारा यह विशालकाय निशाचर दो ऊँचे शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पाता है॥ २३ ॥
‘इसका अत्यन्त भीषण मुखमण्डल दोनों कुण्डलोंसे मण्डित हो पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रोंके बीच स्थित हुए परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा है॥ २४ ॥
‘महाबाहो! तुम मुझे इस श्रेष्ठ राक्षसका परिचय दो, जिसे देखते ही सब वानर भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं’॥ २५ ॥
अमित तेजस्वी राजकुमार श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी विभीषणने रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ २६ ॥
‘भगवन्! जो कुबेरका छोटा भाई, महातेजस्वी, महाकाय, भयानक कर्म करनेवाला तथा राक्षसोंका स्वामी दशमुख राजा रावण है, उसके एक बड़ा पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बलमें रावणके ही समान है। वह वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाला, वेद-शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है॥ २७-२८ ॥
‘हाथी-घोड़ोंकी सवारी करने, तलवार चलाने, धनुषपर बाणोंका संधान करने, प्रत्यञ्चा खींचने, लक्ष्य बेधने, साम और दानका प्रयोग करने तथा न्याययुक्त बर्ताव एवं मन्त्रणा देनेमें वह सबके द्वारा सम्मानित है॥ २९ ॥
‘उसीके बाहुबलका आश्रय लेकर लङ्कापुरी सदा निर्भय रहती आयी है। वही यह वीर निशाचर है। यह रावणकी दूसरी पत्नी धान्यमालिनीका पुत्र है। इसे लोग अतिकायके नामसे जानते हैं॥ ३० ॥
‘तपस्यासे विशुद्ध अन्तःकरणवाले इस अतिकायने दीर्घकालतक ब्रह्माजीकी आराधना की थी। इसने ब्रह्माजीसे अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं और उनके द्वारा बहुत-से शत्रुओंको पराजित किया है॥ ३१ ॥
‘ब्रह्माजीने इसे देवताओं और असुरोंसे न मारे जानेका वरदान दिया है। ये दिव्य कवच और सूर्यके समान तेजस्वी रथ भी उन्हींके दिये हुए हैं॥ ३२ ॥
‘इसने देवता और दानवोंको सैकड़ों बार पराजित किया है, राक्षसोंकी रक्षा की है और यक्षोंको मार भगाया है॥ ३३ ॥