श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1982, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर तो महापार्श्व जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे। इधर ऋषभ उस निशाचरकी यमदण्डके समान भयंकर गदाको शीघ्र ही हाथमें लेकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ६० ॥
देवद्रोही महापार्श्व दो घड़ीतक मुर्देकी भाँति पड़ा रहा। फिर होशमें आनेपर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उसका रक्तरंजित शरीर संध्याकालके बादलोंके समान लाल दिखायी देता था। उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी॥ ६१ ॥
उस चोटसे ऋषभ मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थलमें महापार्श्वकी उसी गदाको, जो किसी पर्वतराजकी चट्टानके समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचरपर दे मारा॥ ६२ ॥
उसकी उस भयंकर गदाने देवता, यज्ञ और ब्राह्मणसे शत्रुता रखनेवाले उस रौद्र-राक्षसके शरीरपर चोट करके उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया। फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओंसे मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगा॥ ६३ ॥
उस समय उस राक्षसने महामना ऋषभके हाथसे अपनी गदा लेनेके लिये उनपर धावा किया; किंतु ऋषभने उस भयानक गदाको हाथमें लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेगसे महापार्श्वपर आक्रमण किया। इस तरह उन महामनस्वी वानर-वीरने युद्धके मुहानेपर उस निशाचरकी जीवन-लीला समाप्त कर दी थी॥ ६४ १/२ ॥
अपनी ही गदाकी चोट खाकर महापार्श्वके दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं। वह वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया॥ ६५ १/२ ॥
जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसोंकी सेना सब ओर भाग चली॥ ६६ ॥
रावणके भा०इ महापार्श्वका वध हो जानेपर राक्षसोंकी वह समुद्रके समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचानेके लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
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