श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठहत्तरवाँ सर्ग
रावणकी आज्ञासे मकराक्षका युद्धके लिये प्रस्थान
निकुम्भ और कुम्भको मारा गया सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ। वह आगके समान जल उठा॥ १ ॥
रावणने क्रोध और शोक दोनोंसे व्याकुल हो विशाल नेत्रोंवाले खरपुत्र मकराक्षसे कहा—॥ २ ॥
‘बेटा! मेरी आज्ञासे विशाल सेनाके साथ जाओ और बंदरोंसहित उन दोनों भा०इ राम तथा लक्ष्मणको मार डालो’॥ ३ ॥
रावणकी यह बात सुनकर अपनेको शूरवीर माननेवाले खरपुत्र मकराक्षने हर्षपूर्वक कहा—‘बहुत अच्छा’। फिर उस बली वीरने निशाचरराज रावणको प्रणाम करके उसकी परिक्रमा की और उसकी आज्ञा लेकर वह उज्ज्वल राजभवनसे बाहर निकला॥ ४-५ ॥
पास ही सेनाध्यक्ष खड़ा था। खरके पुत्रने उससे कहा—‘सेनापते! शीघ्र रथ ले आओ और तुरंत ही सेनाको भी बुलवाओ’॥ ६ ॥
मकराक्षकी यह बात सुनकर निशाचर सेनापतिने रथ और सेना उसके पास लाकर खड़ी कर दी॥ ७ ॥
तब मकराक्षने रथकी प्रदक्षिणा की और उसपर आरूढ़ होकर सारथिको आदेश दिया—‘रथको शीघ्रता-पूर्वक ले चलो’॥ ८ ॥
इसके बाद मकराक्षने समस्त राक्षसोंसे कहा— ‘निशाचरो! तुमलोग मेरे आगे रहकर युद्ध करो॥ ९ ॥
‘मुझे महामना राक्षसराज रावणने समरभूमिमें राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको मारनेकी आज्ञा दी है॥
‘राक्षसो! आज मैं राम, लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव तथा दूसरे-दूसरे वानरोंका अपने उत्तम बाणोंद्वारा वध करूँगा॥ ११ ॥
‘जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है, उसी प्रकार आज मैं शूलोंकी मारसे सामने आयी हु०इ वानरोंकी विशाल वाहिनीको दग्ध कर डालूँगा’॥ १२ ॥