भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2046, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 2046

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तिरासीवाँ सर्ग

सीताके मारे जानेकी बात सुनकर श्रीरामका शोकसे मूर्च्छित होना और लक्ष्मणका उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थके लिये उद्यत होना

भगवान् श्रीरामने भी राक्षसों और वानरोंके उस महान् युद्धघोषको सुनकर जाम्बवान्‌से कहा—॥ १॥

‘सौम्य! निश्चय ही हनुमान्‌जीने अत्यन्त दुष्कर कर्म आरम्भ किया है; क्योंकि उनके आयुधोंका यह महाभयंकर शब्द स्पष्ट सुनायी पड़ता है॥ २॥

‘अतः ऋक्षराज! तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र जाओ और जूझते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌की सहायता करो’॥ ३॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर अपनी सेनासे घिरे हुए ऋक्षराज जाम्बवान् लङ्काके पश्चिम द्वारपर, जहाँ वानरवीर हनुमान्‌जी विराजमान थे, आये॥ ४॥

वहाँ ऋक्षराजने युद्ध करके लौटे और लम्बी साँस खींचते हुए वानरोंके साथ हनुमान्‌जीको आते देखा॥ ५॥

हनुमान्‌जीने भी मार्गमें नील मेघके समान भयंकर ऋक्षसेनाको युद्धके लिये उद्यत देख उसे रोका और सबके साथ ही वे लौट आये॥ ६॥

महायशस्वी हनुमान्‌जी उस सेनाके साथ शीघ्र भगवान् श्रीरामके निकट आये और दुःखी होकर बोले—॥ ७॥

‘प्रभो! हमलोग युद्ध करनेमें लगे थे, उसी समय समरभूमिमें रावणपुत्र इन्द्रजित्‌ने हमारे देखते-देखते रोती हुई सीताको मार डाला है॥ ८॥

‘शत्रुदमन! उन्हें उस अवस्थामें देख मेरा चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है। मैं विषादमें डूब गया हूँ। इसलिये मैं आपको यह समाचार बतानेके लिये आया हूँ’॥ ९॥

हनुमान्‌जीकी यह बात सुनकर श्रीरामजी उस समय शोकसे मूर्च्छित हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १०॥

देवतुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीको भूमिपर पड़ा देख समस्त श्रेष्ठ वानर सब ओरसे उछलकर वहाँ आ पहुँचे॥

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