श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2060, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकर सब ओरसे पर्वताकार हनुमान्जीपर प्रहार करने लगे। हनुमान्जीने कुपित होकर उनका भी महान् संहार किया॥ २२—२४ ॥
इन्द्रजित्ने देखा, कपिवर पवनकुमार हनुमान् पर्वतके समान अचल हो निःशङ्कभावसे अपने शत्रुओंका संहार कर रहे हैं॥ २५ ॥
यह देखकर उसने अपने सारथिसे कहा— ‘जहाँ यह वानर युद्ध करता है, वहीं चलो। यदि उसकी उपेक्षा की गयी तो यह हम सब राक्षसोंका विनाश ही कर डालेगा’॥ २६ ॥
उसके ऐसा कहनेपर सारथि रथपर बैठे हुए अत्यन्त दुर्जय वीर इन्द्रजित्को ढोता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान थे॥ २७ ॥
वहाँ पहुँचकर उस दुर्जय राक्षसने हनुमान्जीके मस्तकपर बाणों, तलवारों, पट्टिशों और फरसोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ २८ ॥
उन भयानक शस्त्रोंको अपने शरीरपर झेलकर पवनपुत्र हनुमान्जी महान् रोषसे भर गये और इस प्रकार बोले— ॥ २९ ॥
‘दुर्बुद्धि रावणकुमार! यदि बड़े शूरवीर हो तो आओ, मेरे साथ मल्लयुद्ध करो। इस वायुपुत्रसे भिड़कर जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ३० ॥
‘दुर्मते! अपनी भुजाओंद्वारा मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करो। इस बाहुयुद्धमें यदि मेरा वेग सह लो तो तुम राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर समझे जाओगे’॥ ३१ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित् धनुष उठाकर हनुमान्जीका वध करना चाहता था। इसी अवस्थामें विभीषणने लक्ष्मणको उसका परिचय दिया— ॥ ३२ ॥
‘सुमित्रानन्दन! रावणका जो पुत्र इन्द्रको भी जीत चुका है, वही यह रथपर बैठकर हनुमान्जीका वध करना चाहता है। अतः आप शत्रुओंका विदारण करनेवाले, अनुपम आकार-प्रकारसे युक्त एवं प्राणान्तकारी भयंकर बाणोंद्वारा उस रावणकुमारको मार डालिये’॥ ३३-३४ ॥
शत्रुओंको भयभीत करनेवाले विभीषणके ऐसा कहनेपर उस समय महात्मा लक्ष्मणने रथपर बैठे हुए उस भयंकर बलशाली पर्वताकार दुर्जय राक्षसको देखा॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८६ ॥