श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2067, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे आकाशमें दो ग्रह टकरा गये हों, उसी तरह वे दोनों वीर परस्पर जूझ रहे थे। उस युद्धस्थलमें वे इन्द्र और वृत्रासुरके समान दुर्धर्ष जान पड़ते थे॥ ३५ ॥
वे महामनस्वी नरश्रेष्ठ तथा राक्षसप्रवर वीर जैसे दो सिंह आपसमें लड़ रहे हों उसी प्रकार युद्ध करते थे और बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे। दोनों ही बड़े हर्ष और उत्साहके साथ एक-दूसरेका सामना करते थे॥ ३६ ॥
तदनन्तर दशरथनन्दन शत्रुसूदन लक्ष्मणने कुपित हुए सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए अपने धनुषपर अनेक बाण रखे और उन सबको राक्षसराज इन्द्रजित्पर चलाया॥ ३७ ॥
उनके धनुषकी डोरीसे प्रकट होनेवाली टंकारध्वनि सुनकर राक्षसराज इन्द्रजित्का मुँह उदास हो गया और वह चुपचाप लक्ष्मणकी ओर देखने लगा॥ ३८ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित्का मुँह उदास देखकर विभीषणने युद्धमें लगे हुए सुमित्राकुमारसे कहा— ॥ ३९ ॥
‘महाबाहो! इस समय रावणपुत्र इन्द्रजित्में मुझे जो लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि निःसंदेह इसका उत्साह भंग हो गया है; अतः आप इसके वधके लिये शीघ्रता करें’॥ ४० ॥
तब सुमित्राकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंको धनुषपर चढ़ाया और उन्हें इन्द्रजित्को लक्ष्य करके चला दिया। वे बाण क्या थे महाविषैले सर्प थे॥
उन बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह था। लक्ष्मणके चलाये हुए उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्रजित् दो घड़ीके लिये मूर्च्छित हो गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ विक्षुब्ध हो उठीं॥ ४२ ॥
थोड़ी देरमें जब होश हुआ और इन्द्रियाँ सुस्थिर हुईं, तब उसने रणभूमिमें दशरथकुमार वीर लक्ष्मणको खड़ा देखा। देखते ही उसके नेत्र रोषसे लाल हो गये और वह सुमित्राकुमारके सामने गया॥ ४३ ॥
वहाँ पहुँचकर वह उनसे कठोर वाणीमें बोला— ‘सुमित्राकुमार! पहले युद्धमें मैंने जो पराक्रम दिखाया था, उसे क्या तुम भूल गये? उस दिन तुमको और तुम्हारे भाईको भी मैंने बाँध लिया था। उस समय तुम युद्धभूमिमें पड़े-पड़े छटपटा रहे थे॥ ४४ ॥