भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तिरानबेवाँ सर्ग

श्रीरामद्वारा राक्षससेनाका संहार

सभामें पहुँचकर राक्षसराज रावण अत्यन्त दुःखी एवं दीन हो श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठा और कुपित सिंहकी भाँति लम्बी साँस लेने लगा॥ १ ॥

वह महाबली रावण पुत्रशोकसे पीड़ित हो रहा था; अतः अपनी सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंसे हाथ जोड़कर बोला— ॥ २ ॥

‘वीरो! तुम सब लोग समस्त हाथी, घोड़े, रथसमुदाय तथा पैदल सैनिकोंसे घिरकर उन सबसे सुशोभित होते हुए नगरसे बाहर निकलो और समरभूमिमें एकमात्र रामको चारों ओरसे घेरकर मार डालो। जैसे वर्षाकालमें बादल जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार तुमलोग भी बाणोंकी वृष्टि करते हुए रामको मार डालनेका प्रयत्न करो॥ ३-४ ॥

‘अथवा मैं ही कल महासमरमें तुम्हारे साथ रहकर अपने तीखे बाणोंसे रामके शरीरको छिन्न-भिन्न करके सब लोगोंके देखते-देखते उन्हें मार डालूँगा'॥ ५ ॥

राक्षसराजकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके वे निशाचर शीघ्रगामी रथों तथा नाना प्रकारकी सेनाओंसे युक्त हो लङ्कासे निकले॥ ६ ॥

वे सब राक्षस वानरोंपर परिघ, पट्टिश, बाण, तलवार तथा फरसे आदि शरीरनाशक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करने लगे। इसी प्रकार वानर भी राक्षसोंपर वृक्षों और पत्थरोंकी वर्षा करने लगे॥ ७ १/२ ॥

सूर्योदयके समय राक्षसों और वानरोंके उस तुमुल युद्धने महाभयंकर रूप धारण किया॥ ८ १/२ ॥

वानर और राक्षस उस युद्धभूमिमें विचित्र गदाओं, भालों, तलवारों और फरसोंसे एक-दूसरेको मारने लगे॥

इस प्रकार युद्ध छिड़ जानेपर जो बहुत बड़ी धूलराशि उड़ रही थी, वह राक्षसों और वानरोंके रक्तका प्रवाह जारी होनेसे शान्त हो गयी। यह एक अद्भुत बात थी॥ १० १/२ ॥

रणभूमिमें खूनकी कितनी ही नदियाँ बह चलीं, जो काष्ठसमूहकी भाँति शरीरसमुदायको ही बहाये लिये जाती थीं। गिरे हुए हाथी और रथ उन नदियोंके किनारे जान पड़ते थे। बाण मत्स्यके