भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2130

इस तरह विलाप करते हुए भगवान् श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं। उस समय सुषेणने उन्हें आश्वासन देते हुए यह उत्तम बात कही— ॥

‘पुरुषसिंह! व्याकुलता उत्पन्न करनेवाली इस चिन्तायुक्त बुद्धिका परित्याग कीजिये; क्योंकि युद्धके मुहानेपर की हुई चिन्ता बाणोंके समान होती है और केवल शोकको जन्म देती है॥ २४ १/२ ॥

‘आपके भाई शोभावर्द्धक लक्ष्मण मरे नहीं हैं। देखिये, इनके मुखकी आकृति अभी बिगड़ी नहीं है और न इनके चेहरेपर कालापन ही आया है। इनका मुख प्रसन्न एवं कान्तिमान् दिखायी दे रहा है॥ २५-२६ ॥

‘इनके हाथोंकी हथेलियाँ कमल-जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं। प्रजानाथ! मरे हुए प्राणियोंका ऐसा रूप नहीं देखा जाता है॥ २७ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! आप विषाद न करें। इनके शरीरमें प्राण हैं। वीर! ये सो गये हैं। इनका शरीर शिथिल होकर भूतलपर पड़ा है। साँस चल रही है और हृदय बारम्बार कम्पित हो रहा है—उसकी गति बंद नहीं हुई है। यह लक्षण इनके जीवित होनेकी सूचना दे रहा है’॥ २८ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् सुषेणने पास ही खड़े हुए महाकपि हनुमान्जीसे कहा— ॥ २९ १/२ ॥

‘सौम्य! तुम शीघ्र ही यहाँसे महोदय पर्वतपर, जिसका पता जाम्बवान् तुम्हें पहले बता चुके हैं, जाओ और उसके दक्षिण शिखरपर उगी हुई विशल्यकरणी^१, सावर्ण्यकरणी^२, संजीवकरणी^३ तथा संधानी^४ नामसे प्रसिद्ध महौषधियोंको यहाँ ले आओ। वीर! उन्हींसे वीरवर लक्ष्मणके जीवनकी रक्षा होगी’॥ ३०—३२ १/२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जी ओषधिपर्वत (महोदयगिरि)-पर गये; परंतु उन महौषधियोंको न पहचाननेके कारण वे चिन्तामें पड़ गये॥ ३३ ॥

इसी समय अमित तेजस्वी हनुमान्जीके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘मैं पर्वतके इस शिखरको ही ले चलूँ’॥ ३४ ॥

‘इसी शिखरपर वह सुखदायिनी ओषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात होता है; क्योंकि सुषेणने ऐसा ही कहा था॥ ३५ ॥