श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरावणके हाथसे छूटते ही वह शूल आकाशमें आकर चमक उठा। वह विद्युन्मालाओंसे व्याप्त-सा जान पड़ता था। आठ घंटोंसे युक्त होनेके कारण उससे गम्भीर घोष प्रकट हो रहा था॥ ५९ ॥
परम पराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने उस भयंकर एवं प्रज्वलित शूलको अपनी ओर आते देख धनुष तानकर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६० ॥
श्रीरघुनाथजीने बाणसमूहोंद्वारा अपनी ओर आते हुए शूलको उसी तरह रोकनेका प्रयास किया, जैसे देवराज इन्द्र ऊपरकी ओर उठती हुई प्रलयाग्निको संवर्तक मेघोंके बरसाये हुए जलप्रवाहके द्वारा शान्त करनेकी चेष्टा करते हैं॥ ६१ ॥
परंतु जैसे आग पतंगोंको जला देती है, उसी तरह रावणके उस महान् शूलने श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए समस्त बाणोंको जलाकर भस्म कर दिया॥ ६२ ॥
श्रीरघुनाथजीने जब देखा मेरे सायक अन्तरिक्षमें उस शूलका स्पर्श होते ही चूर-चूर हो राखके ढेर बन गये हैं, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ॥ ६३ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रघुकुलनन्दन रघुवीरने मातलिकी लायी हुई देवेन्द्रद्वारा सम्मानित शक्तिको हाथमें ले लिया॥ ६४ ॥
बलवान् श्रीरामके द्वारा उठायी हुई वह शक्ति प्रलयकालमें प्रज्वलित होनेवाली उल्काके समान प्रकाशमान थी। उसने समस्त आकाशको अपनी प्रभासे उद्भासित कर दिया तथा उससे घंटानाद प्रकट होने लगा॥ ६५ ॥
श्रीरामने जब उसे चलाया, तब वह शक्ति राक्षसराजके उस शूलपर ही पड़ी। उसके प्रहारसे टूक-टूक और निस्तेज हो वह महान् शूल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६६ ॥
इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने सीधे जानेवाले महावेगवान् वज्रतुल्य पैने बाणोंके द्वारा रावणके अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया॥ ६७ ॥
फिर अत्यन्त सावधान होकर उन्होंने तीन तीखे तीरोंसे रावणकी छाती छेद डाली और तीन पंखदार बाणोंसे उसके ललाटमें भी चोट पहुँचायी॥ ६८ ॥
उन बाणोंकी मारसे रावणके सारे अङ्ग क्षतवि क्षत हो गये। उसके सारे शरीरसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय अपने सैन्यसमूहमें खड़ा हुआ राक्षसराज रावण फूलोंसे भरे हुए अशोकवृक्षके समान शोभा पाने लगा॥ ६९ ॥