श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सौ छब्बीसवाँ सर्ग
हनुमान्जीका भरतको श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके वनवाससम्बन्धी सारे वृत्तान्तोंको सुनाना
‘मेरे स्वामी श्रीरामको विशाल वनमें गये बहुत वर्ष बीत गये। इतने वर्षोंके बाद आज मुझे उनकी आनन्ददायिनी चर्चा सुननेको मिली है॥ १ ॥
‘आज यह कल्याणमयी लौकिक गाथा मुझे यथार्थ जान पड़ती है— मनुष्य यदि जीता रहे तो उसे कभी-न-कभी हर्ष और आनन्दकी प्राप्ति होती ही है, भले ही वह सौ वर्षों बाद हो॥ २ ॥
‘सौम्य! श्रीरघुनाथजीका और वानरोंका यह मेल-जोल कैसे हुआ? किस देशमें और किस कारणको लेकर हुआ? यह मैं जानना चाहता हूँ। मुझे ठीक-ठीक बताओ’॥
राजकुमार भरतके इस प्रकार पूछनेपर कुशासनपर बैठाये हुए हनुमान्जीने श्रीरामका वनवासविषयक सारा चरित्र उनसे कह सुनाया—॥ ४ ॥
‘प्रभो! महाबाहो! जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दिया गया, जिस तरह आपकी माताको दो वर प्रदान किये गये, जैसे पुत्रशोकसे राजा दशरथकी मृत्यु हुई, जिस प्रकार आप राजगृहसे दूतोंद्वारा शीघ्र ही बुलाये गये, जिस तरह अयोध्यामें प्रवेश करके आपने राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की और सत्पुरुषोंके धर्मका आचरण करते हुए चित्रकूट-पर्वतपर जाकर अपने शत्रुसूदन भाईको आपने राज्य लेनेके लिये निमन्त्रित किया, फिर उन्होंने जिस प्रकार राजा दशरथके वचनका पालन करनेमें दृढ़तापूर्वक स्थित होकर राज्यको त्याग दिया तथा जिस प्रकार अपने बड़े भाईकी चरणपादुकाएँ लेकर आप फिर लौट आये—ये सब बातें तो आपको यथावत् रूपसे विदित ही हैं। आपके लौट आनेके बाद जो वृत्तान्त घटित हुआ, वह बता रहा हूँ, मुझसे सुनिये—॥ ५—९ ॥
‘आपके लौट आनेपर वह वन सब ओरसे अत्यन्त क्षीण-सा हो चला। वहाँके पशु-पक्षी भयसे घबरा उठे थे, तब उस वनको छोड़कर श्रीरामने विशाल दण्डकारण्यमें प्रवेश किया, जो निर्जन था। उस घोर वनको हाथियोंने रौंद डाला था। उसमें सिंह, व्याघ्र और मृग भरे हुए थे॥ १०-११ ॥
‘उस गहन वनमें जाते हुए इन तीनोंके आगे महान् गर्जना करता हुआ बलवान् राक्षस विराध दिखायी दिया॥ १२ ॥