श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा सर्ग
महर्षि अगस्त्यके द्वारा पुलस्त्यके गुण और तपस्याका वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनिकी उत्पत्तिका कथन
महात्मा रघुनाथजीका वह प्रश्न सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि अगस्त्यने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘श्रीराम! इन्द्रजित्के महान् बल और तेजके उद्देश्यसे जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे बताता हूँ, सुनो। जिस बलके कारण वह तो शत्रुओंको मार गिराता था, परंतु स्वयं किसी शत्रुके हाथसे मारा नहीं जाता था; उसका परिचय दे रहा हूँ॥ २ ॥
‘रघुनन्दन! इस प्रस्तुत विषयका वर्णन करनेके लिये मैं पहले आपको रावणके कुल, जन्म तथा वरदान-प्राप्ति आदिका प्रसङ्ग सुनाता हूँ॥ ३ ॥
‘श्रीराम! प्राचीनकाल—सत्ययुगकी बात है, प्रजापति ब्रह्माजीके एक प्रभावशाली पुत्र हुए, जो ब्रह्मर्षि पुलस्त्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजीके समान ही तेजस्वी हैं॥ ४ ॥
‘उनके गुण, धर्म और शीलका पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका इतना ही परिचय देना पर्याप्त होगा कि वे प्रजापतिके पुत्र हैं॥ ५ ॥
‘प्रजापति ब्रह्माके पुत्र होनेके कारण ही देवतालोग उनसे बहुत प्रेम करते हैं। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और अपने उज्ज्वल गुणोंके कारण ही सब लोगोंके प्रिय हैं॥ ६ ॥
‘एक बार मुनिवर पुलस्त्य धर्माचरणके प्रसङ्गसे महागिरि मेरुके निकटवर्ती राजर्षि तृणबिन्दुके आश्रममें गये और वहीं रहने लगे॥ ७ ॥
‘उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता था। वे इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करते और तपस्यामें लगे रहते थे। परंतु कुछ कन्याएँ उनके आश्रममें जाकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालने लगीं। ऋषियों, नागों तथा राजर्षियोंकी कन्याएँ और जो अप्सराएँ हैं, वे भी प्रायः क्रीडा करती हुईं उनके आश्रमकी ओर आ जाती थीं॥ ८-९ ॥
‘वहाँका वन सभी ऋतुओंमें उपभोगमें लानेके योग्य और रमणीय था, इसलिये वे कन्याएँ प्रतिदिन उस प्रदेशमें जाकर भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करती थीं॥ १० ॥