भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2256

‘जहाँ ब्रह्मर्षि पुलस्त्य रहते थे, वह स्थान तो और भी रमणीय था; इसलिये वे सती-साध्वी कन्याएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, बजाती तथा नाचती थीं। इस प्रकार उन तपस्वी मुनिके तपमें विघ्न डाला करती थीं॥ ११ १/२ ॥

‘इससे वे महातेजस्वी महामुनि पुलस्त्य कुछ रुष्ट हो गये और बोले— ‘कलसे जो लड़की यहाँ मेरे दृष्टिपथमें आयेगी, वह निश्चय ही गर्भ धारण कर लेगी’॥ १२ १/२ ॥

‘उन महात्माकी यह बात सुनकर वे सब कन्याएँ ब्रह्मशापके भयसे डर गयीं और उन्होंने उस स्थानपर आना छोड़ दिया॥ १३ १/२ ॥

‘परंतु राजर्षि तृणबिन्दुकि कन्याने इस शापको नहीं सुना था; इसलिये वह दूसरे दिन भी बेखटके आकर उस आश्रममें विचरने लगी॥ १४ १/२ ॥

‘वहाँ उसने अपनी किसी सखीको आयी हुई नहीं देखा। उस समय प्रजापतिके पुत्र महातेजस्वी महर्षि पुलस्त्य अपनी तपस्यासे प्रकाशित हो वहाँ वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे॥ १५-१६ ॥

‘उस वेदध्वनिको सुनकर वह कन्या उसी ओर गयी और उसने तपोनिधि पुलस्त्यजीका दर्शन किया। महर्षिकी दृष्टि पड़ते ही उसके शरीरपर पीलापन छा गया और गर्भके लक्षण प्रकट हो गये॥ १७ ॥

‘अपने शरीरमें यह दोष देखकर वह घबरा उठी और ‘मुझे यह क्या हो गया?’ इस प्रकार चिन्ता करती हुई पिताके आश्रमपर जाकर खड़ी हुई॥ १८ ॥

‘अपनी कन्याको उस अवस्थामें देखकर तृणबिन्दुने पूछा— ‘तुम्हारे शरीरकी ऐसी अवस्था कैसे हुई? तुम अपने शरीरको जिस रूपमें धारण कर रही हो, यह तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य एवं अनुचित है’॥ १९ ॥

वह बेचारी कन्या हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिसे बोली— ‘पिताजी! मैं उस कारणको नहीं समझ पाती, जिससे मेरा रूप ऐसा हो गया है॥ २० ॥

‘अभी थोड़ी देर पहले मैं पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि पुलस्त्यके दिव्य आश्रमपर अपनी सखियोंको खोजनेके लिये अकेली गयी थी॥ २१ ॥

‘वहाँ देखती हूँ तो कोई भी सखी उपस्थित नहीं है। साथ ही मेरा रूप पहलेसे विपरीत अवस्थामें पहुँच गया है; यह सब देखकर मैं भयभीत हो यहाँ आ गयी हूँ’॥ २२ ॥