श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2264, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘दूसरोंको मान देनेवाले रघुवीर! उन सबको आया देख प्रजापतिने उन्हें वाणीद्वारा सम्बोधित करके हँसते हुए-से कहा— ‘जल-जन्तुओ! तुम यत्नपूर्वक इस जलकी रक्षा करो’॥ ११॥
‘वे सब जन्तु भूखे-प्यासे थे। उनमेंसे कुछने कहा— ‘हम इस जलकी रक्षा करेंगे’ और दूसरेने कहा— ‘हम इसका यक्षण (पूजन) करेंगे’, तब उन भूतोंकी सृष्टि करनेवाले प्रजापतिने उनसे कहा—॥ १२॥
‘तुममेंसे जिन लोगोंने रक्षा करनेकी बात कही है, वे राक्षस नामसे प्रसिद्ध हों और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया है, वे लोग यक्ष नामसे ही विख्यात हों’ (इस प्रकार वे जीव राक्षस और यक्ष— इन दो जातियोंमें विभक्त हो गये)॥ १३॥
‘उन राक्षसोंमें हेति और प्रहेति नामवाले दो भाई थे, जो समस्त राक्षसोंके अधिपति थे। शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ वे दोनों वीर मधु और कैटभके समान शक्तिशाली थे॥ १४॥
‘उनमें प्रहेति धर्मात्मा था; अतः वह तत्काल तपोवनमें जाकर तपस्या करने लगा। परंतु हेतिने विवाहके लिये बड़ा प्रयत्न किया॥ १५॥
‘वह अमेय आत्मबलसे सम्पन्न और बड़ा बुद्धिमान् था। उसने स्वयं ही याचना करके कालकी कुमारी भगिनी भयाके साथ विवाह किया। भया बड़ी भयानक थी॥ १६॥
‘राक्षसराज हेतिने भयाके गर्भसे एक पुत्रको उत्पन्न किया, जो विद्युत्केशके नामसे प्रसिद्ध था। उसे जन्म देकर हेति पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ समझा जाने लगा॥
‘हेतिपुत्र विद्युत्केश दीप्तिमान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था। वह महातेजस्वी बालक जलमें कमलकी भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा॥ १८॥
‘निशाचर विद्युत्केश जब बढ़कर उत्तम युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब उसके पिता राक्षसराज हेतिने अपने पुत्रका ब्याह कर देनेका निश्चय किया॥ १९॥
‘राक्षसराजशिरोमणि हेतिने अपने पुत्रको ब्याहनेके लिये संध्याकी पुत्रीका, जो प्रभावमें अपनी माता संध्याके ही समान थी, वरण किया॥ २०॥
‘रघुनन्दन! संध्याने सोचा— ‘कन्याका किसी दूसरेके साथ ब्याह तो अवश्य ही करना पड़ेगा, अतः इसीके साथ क्यों न कर दूँ?’ यह विचारकर उसने अपनी पुत्री विद्युत्केशको ब्याह दी॥ २१॥