श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2323, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जब मैं बड़ी हुर्इ, तब देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी पिताजीके पास जा- जाकर उनसे मुझे माँगने लगे॥ १० १/२ ॥
‘महाबाहु राक्षसेश्वर! पिताजीने उनके हाथमें मुझे नहीं सौंपा। इसका क्या कारण था, मैं बता रही हूँ, सुनिये॥ ११ १/२ ॥
‘पिताजीकी इच्छा थी कि तीनों लोकोंके स्वामी देवेश्वर भगवान् विष्णु मेरे दामाद हों। इसीलिये वे दूसरे किसीके हाथमें मुझे नहीं देना चाहते थे। उनके इस अभिप्रायको सुनकर बलाभिमानी दैत्यराज शम्भु उनपर कुपित हो उठा और उस पापीने रातमें सोते समय मेरे पिताजीकी हत्या कर डाली॥ १२—१४ ॥
‘इससे मेरी महाभागा माताको बड़ा दुःख हुआ और वे पिताजीके शवको हृदयसे लगाकर चिताकी आगमें प्रविष्ट हो गयीं॥ १५ ॥
‘तबसे मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि भगवान् नारायणके प्रति पिताजीका जो मनोरथ था, उसे मैं सफल करूँगी। इसलिये मैं उन्हींको अपने हृदय-मन्दिरमें धारण करती हूँ॥ १६ ॥
‘यही प्रतिज्ञा करके मैं यह महान् तप कर रही हूँ। राक्षसराज! आपके प्रश्नके अनुसार यह सब बात मैंने आपको बता दी॥ १७ ॥
‘नारायण ही मेरे पति हैं। उन पुरुषोत्तमके सिवा दूसरा कोर्इ मेरा पति नहीं हो सकता। उन नारायणदेवको प्राप्त करनेके लिये ही मैंने इस कठोर व्रतका आश्रय लिया है॥ १८ ॥
‘राजन्! पौलस्त्यनन्दन! मैंने आपको पहचान लिया है। आप जाइये। त्रिलोकीमें जो कोर्इ भी वस्तु विद्यमान है, वह सब मैं तपस्याद्वारा जानती हूँ’॥ १९ ॥
यह सुनकर रावण कामबाणसे पीड़ित हो विमानसे उतर गया और उस उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली कन्यासे फिर बोला—॥ २० ॥
‘सुश्रोणि! तुम गर्वीली जान पड़ती हो, तभी तो तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गयी है। मृगशावकलोचने! इस तरह पुण्यका संग्रह बूढ़ी स्त्रियोंको ही शोभा देता है, तुम-जैसे युवतीको नहीं॥ २१ ॥
‘तुम तो सर्वगुणसम्पन्न एवं त्रिलोकीकी अद्वितीय सुन्दरी हो। तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। भीरु! तुम्हारी जवानी बीती जा रही है॥ २२ ॥