श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा कहकर वह प्रज्वलित अग्निमें समा गयी। उस समय उसके चारों ओर आकाशसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी॥ ३४ १/२ ॥
तदनन्तर दूसरे जन्ममें वह कन्या पुनः एक कमलसे प्रकट हुई। उस समय उसकी कान्ति कमलके समान ही सुन्दर थी। उस राक्षसने पहलेकी ही भाँति फिर वहाँसे भी उस कन्याको प्राप्त कर लिया॥ ३५ १/२ ॥
कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर कान्तिवाली उस कन्याको लेकर रावण अपने घर गया। वहाँ उसने मन्त्रीको वह कन्या दिखायी॥ ३६ १/२ ॥
मन्त्री बालक-बालिकाओंके लक्षणोंको जाननेवाला था। उसने उसे अच्छी तरह देखकर रावणसे कहा— ‘राजन्! यह सुन्दरी कन्या यदि घरमें रही तो आपके वधका ही कारण होगी, ऐसा लक्षण देखा जाता है’॥ ३७ १/२ ॥
श्रीराम! यह सुनकर रावणने उसे समुद्रमें फेंक दिया। तत्पश्चात् वह भूमिको प्राप्त होकर राजा जनकके यज्ञमण्डपके मध्यवर्ती भूभागमें जा पहुँची। वहाँ राजाके हलके मुखभागसे उस भूभागके जोते जानेपर वह सती साध्वी कन्या फिर प्रकट हो गयी॥ ३८-३९ ॥
प्रभो! वही यह वेदवती महाराज जनककी पुत्रीके रूपमें प्रादुर्भूत हो आपकी पत्नी हुई है। महाबाहो! आप ही सनातन विष्णु हैं॥ ४० ॥
उस वेदवतीने पहले ही अपने रोषजनित शापके द्वारा आपके उस पर्वताकार शत्रुको मार डाला था, जिसे अब आपने आक्रमण करके मौतके घाट उतारा है। प्रभो! आपका पराक्रम अलौकिक है॥ ४१ ॥
इस प्रकार यह महाभागा देवी विभिन्न कल्पोंमें पुनः रावणवधके उद्देश्यसे मर्त्यलोकमें अवतीर्ण होती रहेगी। यज्ञवेदीपर अग्निशिखाके समान हलसे जोते गये क्षेत्रमें इसका आविर्भाव हुआ है॥ ४२ ॥
यह वेदवती पहले सत्ययुगमें प्रकट हुई थी। फिर त्रेतायुग आनेपर उस राक्षस रावणके वधके लिये मिथिलावर्ती राजा जनकके कुलमें सीतारूपसे अवतीर्ण हुई। सीता (हल जोतनेसे भूमिपर बनी हुई रेखा)-से उत्पन्न होनेके कारण मनुष्य इस देवीको सीता कहते हैं॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
१७ ॥