श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंअड़तीसवाँ सर्ग
राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा यज्ञकी तैयारी
विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘वीर! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥ २ ॥
‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥ ३ ॥
‘सगरकी दूसरी पन्तीका नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यपकी पुत्री तथा गरुड़की बहिन थी॥ ४ ॥
‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे॥ ५ ॥
‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया॥ ६ ॥
‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी। पुरुषप्रवर! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥ ७ ॥
‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥ ८ ॥
‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा— ॥ ९ ॥
‘ब्रह्मन्! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं। आपकी वाणी सत्य हो’॥ १० ॥
‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा— ‘देवियो! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान्