श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवक्षःस्थलसे सटे हुए उस विशाल हारसे हनुमान्जी उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे सुवर्णमय गिरिराज सुमेरुके शिखरपर चन्द्रमाका उदय हुआ हो॥ २६ ॥
श्रीरघुनाथजीके ये विदाईके शब्द सुनकर वे महाबली वानर एक-एक करके उठे और उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करके वहाँसे चल दिये॥ २७ ॥
सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्रीरामके हृदयसे लग गये और उनका गाढ़ आलिंगन करके विदा हुए। उस समय वे सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीरामके भावी विरहसे व्यथित हो उठे थे॥ २८ ॥
वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंशवर्धन श्रीरामको प्रणाम करके नेत्रोंमें वियोगके आँसू लिये अपने-अपने निवासस्थानको लौट गये॥ ३१ ॥
श्रीरामको छोड़कर जाते समय वे सभी दुःखसे किंकर्तव्यविमूढ़ तथा अचेत-से हो रहे थे। किसीके गलेसे आवाज नहीं निकलती थी और सभीके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे॥ २९ ॥
महात्मा श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार कृपा एवं प्रसन्नतापूर्वक विदा देनेपर वे सब वानर विवश हो उसी प्रकार अपने-अपने घरको गये, जैसे जीवात्मा विवशतापूर्वक शरीर छोड़कर परलोकको जाता है॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥