भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2426

वे बोले— ‘महाबाहु श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान आपके स्वभावमें सदा परम मधुरता रहती है। आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं’॥ १४ ॥

वानर और राक्षस जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय हनुमान्‌जी विनम्र होकर श्रीरघुनाथजीसे बोले— ॥

‘महाराज! आपके प्रति मेरा महान् स्नेह सदा बना रहे। वीर! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति रहे। आपके सिवा और कहीं मेरा आन्तरिक अनुराग न हो॥ १६ ॥

‘वीर श्रीराम! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें॥ १७ ॥

‘रघुकुलनन्दन नरश्रेष्ठ श्रीराम! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाया करें॥ १८ ॥

‘वीर प्रभो! आपके उस चरितामृतको सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठाको उसी तरह दूर करता रहूँगा, जैसे वायु बादलोंकी पंक्तिको उड़ाकर दूर ले जाती है’॥ १९ ॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने श्रेष्ठ सिंहासनसे उठकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा— ॥ २० ॥

‘कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं है। संसारमें मेरी कथा जबतक प्रचलित रहेगी, तबतक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीरमें प्राण भी रहेंगे ही। जबतक ये लोक बने रहेंगे, तबतक मेरी कथाएँ भी स्थिर रहेंगी॥ २१-२२ ॥

‘कपे! तुमने जो उपकार किये हैं, उनमेंसे एक-एकके लिये मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ। तुम्हारे शेष उपकारोंके लिये तो मैं ऋणी ही रह जाऊँगा॥ २३ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ। उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि पुरुषमें उपकारका बदला पानेकी योग्यता आपत्तिकालमें ही आती है (मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ)’॥ २४ ॥

इतना कहकर श्रीरघुनाथजीने अपने कण्ठसे एक चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार निकाला, जिसके मध्यभागमें वैदूर्यमणि थी। उसे उन्होंने हनुमान्‌जीके गलेमें बाँध दिया॥ २५ ॥