श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2425, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंचालीसवाँ सर्ग
वानरों, रीछों और राक्षसोंकी बिदाई
इस तरह वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंमेंसे सुग्रीवको सम्बोधित करके महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘सौम्य! अब तुम देवताओं तथा असुरोंके लिये भी दुर्जय किष्किन्धापुरीको जाओ और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रहकर अपने निष्कण्टक राज्यका पालन करो॥ २ ॥
‘महाबाहो! अङ्गद और हनुमान्को भी तुम अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना। महाबली नल, अपने श्वशुर वीर सुषेण, बलवानोंमें श्रेष्ठ तार, दुर्धर्ष वीर कुमुद, महाबली नील, वीर शतबलि, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, महाबली शरभ, महान् बल-पराक्रमसे युक्त दुर्जय वीर ऋक्षराज जाम्बवान् तथा गन्धमादनपर भी तुम प्रेमपूर्ण दृष्टि रखना॥ ३—६ ॥
‘परम पराक्रमी ऋषभ, वानर, सुपाटल, केसरी, शरभ, शुम्भ तथा महाबली शङ्खचूडको भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना॥ ७ ॥
‘इनके सिवा जिन-जिन महामनस्वी वानरोंने मेरे लिये अपने प्राणोंकी बाजी लगा दी थी, उन सबपर तुम प्रेमदृष्टि रखना। कभी उनका अप्रिय न करना’॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीरामने सुग्रीवको बारम्बार हृदयसे लगाया और फिर मधुर वाणीमें विभीषणसे कहा—
‘राक्षसराज! तुम धर्मपूर्वक लङ्काका शासन करो। मैं तुम्हें धर्मज्ञ मानता हूँ। तुम्हारे नगरके लोग, सब राक्षस तथा तुम्हारे भाई कुबेर भी तुम्हें धर्मज्ञ ही समझते हैं॥ १० ॥
‘राजन्! तुम किसी तरह भी अधर्ममें मन न लगाना। जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वीका राज्य भोगते हैं॥ ११ ॥
‘राजन्! तुम सुग्रीवसहित मुझे सदा याद रखना। अब निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे जाओ’॥ १२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह भाषण सुनकर रीछों, वानरों और राक्षसोंने ‘धन्य-धन्य’ कहकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की॥ १३ ॥