भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

वे बोले— ‘महाबाहु श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान आपके स्वभावमें सदा परम मधुरता रहती है। आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं’॥ १४ ॥

वानर और राक्षस जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय हनुमान्‌जी विनम्र होकर श्रीरघुनाथजीसे बोले— ॥

‘महाराज! आपके प्रति मेरा महान् स्नेह सदा बना रहे। वीर! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति रहे। आपके सिवा और कहीं मेरा आन्तरिक अनुराग न हो॥ १६ ॥

‘वीर श्रीराम! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें॥ १७ ॥

‘रघुकुलनन्दन नरश्रेष्ठ श्रीराम! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाया करें॥ १८ ॥

‘वीर प्रभो! आपके उस चरितामृतको सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठाको उसी तरह दूर करता रहूँगा, जैसे वायु बादलोंकी पंक्तिको उड़ाकर दूर ले जाती है’॥ १९ ॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने श्रेष्ठ सिंहासनसे उठकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा— ॥ २० ॥

‘कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं है। संसारमें मेरी कथा जबतक प्रचलित रहेगी, तबतक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीरमें प्राण भी रहेंगे ही। जबतक ये लोक बने रहेंगे, तबतक मेरी कथाएँ भी स्थिर रहेंगी॥ २१-२२ ॥

‘कपे! तुमने जो उपकार किये हैं, उनमेंसे एक-एकके लिये मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ। तुम्हारे शेष उपकारोंके लिये तो मैं ऋणी ही रह जाऊँगा॥ २३ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ। उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि पुरुषमें उपकारका बदला पानेकी योग्यता आपत्तिकालमें ही आती है (मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ)’॥ २४ ॥

इतना कहकर श्रीरघुनाथजीने अपने कण्ठसे एक चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार निकाला, जिसके मध्यभागमें वैदूर्यमणि थी। उसे उन्होंने हनुमान्‌जीके गलेमें बाँध दिया॥ २५ ॥

वक्षःस्थलसे सटे हुए उस विशाल हारसे हनुमान्‌जी उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे सुवर्णमय गिरिराज सुमेरुके शिखरपर चन्द्रमाका उदय हुआ हो॥ २६ ॥

श्रीरघुनाथजीके ये विदाईके शब्द सुनकर वे महाबली वानर एक-एक करके उठे और उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करके वहाँसे चल दिये॥ २७ ॥

सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्रीरामके हृदयसे लग गये और उनका गाढ़ आलिंगन करके विदा हुए। उस समय वे सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीरामके भावी विरहसे व्यथित हो उठे थे॥ २८ ॥

वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंशवर्धन श्रीरामको प्रणाम करके नेत्रोंमें वियोगके आँसू लिये अपने-अपने निवासस्थानको लौट गये॥ ३१ ॥

श्रीरामको छोड़कर जाते समय वे सभी दुःखसे किंकर्तव्यविमूढ़ तथा अचेत-से हो रहे थे। किसीके गलेसे आवाज नहीं निकलती थी और सभीके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे॥ २९ ॥

महात्मा श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार कृपा एवं प्रसन्नतापूर्वक विदा देनेपर वे सब वानर विवश हो उसी प्रकार अपने-अपने घरको गये, जैसे जीवात्मा विवशतापूर्वक शरीर छोड़कर परलोकको जाता है॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥

इकतालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

इकतालीसवाँ सर्ग

कुबेरके भेजे हुए पुष्पकविमानका आना और श्रीरामसे पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरतके द्वारा श्रीरामराज्यके विलक्षण प्रभावका वर्णन

रीछों, वानरों और राक्षसोंको विदा करके भाइयोंसहित सुख-स्वरूप महाबाहु श्रीराम सुख और आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे॥ १ ॥

एक दिन अपराह्नकालमें (दोपहरके बाद) अपने भाइयोंके साथ बैठे हुए महाप्रभु श्रीरघुनाथजीने आकाशसे यह मधुर वाणी सुनी—॥ २ ॥

‘सौम्य श्रीराम! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुखसे दृष्टिपात करनेकी कृपा करें। प्रभो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं कुबेरके भवनसे लौटा हुआ पुष्पकविमान हूँ॥ ३ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा मानकर मैं कुबेरकी सेवाके लिये उनके भवनमें गया था; परंतु उन्होंने मुझसे कहा—॥ ४ ॥

‘विमान! महात्मा महाराज श्रीरामने युद्धमें दुर्धर्ष राक्षसराज रावणको मारकर तुम्हें जीता है॥ ५ ॥

‘पुत्रों, बन्धु-बान्धवों तथा सेवकगणोंसहित उस दुरात्मा रावणके मारे जानेसे मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ ६ ॥

‘सौम्य! इस तरह परमात्मा श्रीरामने लङ्कामें रावणके साथ-साथ तुमको भी जीत लिया है; अतः मैं आज्ञा देता हूँ, तुम उन्हींकी सवारीमें रहो॥ ७ ॥

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं। तुम उनकी सवारीके काम आओ— यह मेरी सबसे बड़ी कामना है। इसलिये तुम निश्चिन्त होकर जाओ’॥ ८ ॥

‘इस प्रकार मैं महात्मा कुबेरकी आज्ञा पाकर ही आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझे निःशङ्क होकर ग्रहण करें॥ ९ ॥

‘मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हूँ और कुबेरकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ अपने प्रभावसे समस्त लोकोंमें विचरण करूँगा’॥ १० ॥

पुष्पकके ऐसा कहनेपर महाबली श्रीरामने उस विमानको पुनः आया देख उससे कहा—॥ ११ ॥

‘विमानराज पुष्पक! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। कुबेरकी अनुकूलता होनेसे हमें मर्यादाभङ्गका दोष नहीं लगेगा’॥ १२ ॥

ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामने लावा, फूल, धूप और चन्दन आदिके द्वारा पुष्पकका पूजन किया॥ १३ ॥

और कहा—‘अब तुम जाओ। जब मैं स्मरण करूँ, तब आ जाना। आकाशमें रहना और अपनेको मेरे वियोगसे दुःखी न होने देना (मैं यथासमय तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा)। स्वेच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें जाते समय तुम्हारी किसीसे टक्कर न हो अथवा तुम्हारी गति कहीं प्रतिहत न हो’॥ १४½ ॥

पुष्पकने ‘एवमस्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली। इस प्रकार श्रीरामने उसका पूजन करके जब उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँसे अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया॥ १५½ ॥

इस प्रकार पुण्यमय पुष्पकविमानके अदृश्य हो जानेपर भरतजीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥

‘वीरवर! आप देवस्वरूप हैं। इसीलिये आपके शासनकालमें मनुष्येतर प्राणी भी बारम्बार मनुष्योंके समान सम्भाषण करते देखे जाते हैं॥ १७½ ॥

‘राघव! आपके राज्यपर अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया, तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं। बूढ़े प्राणियोंके पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट सहे प्रसव करती हैं। सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं॥ १८-१९ ॥

‘राजन्! पुरवासियोंमें बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृतके समान जल गिराते हुए समयपर वर्षा करते हैं॥

‘हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन्! नगर और जनपदके लोग इस पुरीमें कहते हैं कि हमारे लिये चिरकालतक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें’॥ २१½ ॥

भरतकी कही हुई ये सुमधुर बातें सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥

बयालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

बयालीसवाँ सर्ग

अशोकवनिकामें श्रीराम और सीताका विहार, गर्भिणी सीताका तपोवन देखनेकी इच्छा प्रकट करना और श्रीरामका इसके लिये स्वीकृति देना

सुवर्णभूषित पुष्पक विमानको विदा करके महाबाहु श्रीरामने अशोकवनिका (अन्तःपुरके विहार योग्य उपवन) में प्रवेश किया॥ १ ॥

चन्दन, अगुरु, आम, तुङ्ग (नारियल), कालेयक (रक्तचन्दन) तथा देवदारु-वन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ २ ॥

चम्पा, अशोक, पुंनाग, महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले पारिजातसे वह वाटिका सुशोभित थी॥ ३ ॥

लोध्र, कदम्ब, अर्जुन, नागकेसर, छितवन, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली तथा गुल्मों और लताओंके समूह उसमें सब ओर व्याप्त थे॥ ४ ॥

प्रियङ्गु, धूलिकदम्ब, बकुल, जामुन, अनार और कोविदार आदि वृक्ष उस उपवनको सुशोभित करते थे॥ ५ ॥

सदा फूल और फल देनेवाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गन्धसे युक्त तथा नूतन अङ्कुर-पल्लवोंसे अलंकृत वृक्ष भी उस अशोकवनिकाकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ६ ॥

वृक्ष लगानेकी कलामें कुशल मालियोंद्वारा तैयार किये गये दिव्य वृक्ष, जिनमें मनोहर पल्लव तथा पुष्प शोभा पाते थे और जिनके ऊपर मतवाले भ्रमर छा रहे थे, उस उपवनकी श्री-वृद्धि कर रहे थे॥ ७ ॥

कोकिल, भृङ्गराज आदि रंग-बिरंगे सैकड़ों पक्षी उस वाटिकाकी शोभा थे, जो आम्रकी डालियोंके अग्रभागपर बैठकर वहाँ विचित्र सुषमाकी सृष्टि कर रहे थे॥ ८ ॥

कोई वृक्ष सुवर्णके समान पीले, कोई अग्निशिखाके समान उज्ज्वल और कोई नीले अञ्जनके समान श्याम थे, जो स्वयं सुशोभित होकर उस उपवनकी शोभा बढ़ाते थे॥ ९ ॥

वहाँ अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प और गुच्छ दृष्टिगोचर होते थे। उत्तम जलसे भरी हुई भाँति-भाँतिकी बावड़ियाँ देखी जाती थीं॥ १० ॥

जिनमें माणिक्यकी सीढ़ियाँ बनी थीं। सीढ़ियोंके बाद कुछ दूरतक जलके भीतरकी भूमि स्फटिक मणिसे बँधी हुई थी। उन बावड़ियोंके भीतर खिले हुए कमल और कुमुदोंके समूह शोभा पाते थे, चक्रवाक भी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११ ॥

पपीहे और तोते वहाँ मीठी बोली बोल रहे थे। हंसों और सारसोंके कलरव गूँज रहे थे। फूलोंसे चितकबरे दिखायी देनेवाले तटवर्ती वृक्ष उन्हें शोभासम्पन्न बना रहे थे॥ १२ ॥

वे भाँति-भाँतिके परकोटों और शिलाओंसे भी सुशोभित थीं। वहीं वनप्रान्तमें नीलमके समान रंगवाली हरी-हरी घासें उस वाटिकाका शृङ्गार कर रही थीं। वहाँके वृक्षोंका समुदाय फूलोंके भारसे लदा हुआ था॥ १३½ ॥

वहाँ मानो परस्पर होड़ लगाकर खिले हुए पुष्पशाली वृक्षोंके झड़े हुए फूलोंसे काले-काले प्रस्तर उसी तरह चितकबरे दिखायी देते थे, जैसे तारोंके समुदायसे अलंकृत आकाश॥ १४½ ॥

जैसे इन्द्रका नन्दन और ब्रह्माजीका बनाया हुआ कुबेरका चैत्ररथ वन सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुन्दर भवनोंसे विभूषित श्रीरामका वह क्रीडा-कानन शोभा पा रहा था॥ १५½ ॥

वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठनेके लिये बहुत-से आसन सजाये गये थे। वह वाटिका अनेक लतामण्डपोंसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उस समृद्धिशालिनी अशोकवनिकामें प्रवेश करके रघुकुलनन्दन श्रीराम पुष्पराशिसे विभूषित एक सुन्दर आसनपर बैठे, जिसपर कालीन बिछा था॥ १६-१७½ ॥

जैसे देवराज इन्द्र शचीको सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अपने हाथसे पवित्र पेय मधु लेकर सीताजीको पिलाया॥ १८½ ॥

सेवकगण श्रीरामके भोजनके लिये वहाँ तुरंत ही राजोचित भोग्य पदार्थ (भाँति-भाँतिकी रसोई) तथा नाना प्रकारके फल ले आये॥ १९½ ॥

उस समय राजा रामके समीप नृत्य और गीतकी कलामें निपुण अप्सराएँ और नाग-कन्याएँ किन्नरियोंके साथ मिलकर नृत्य करने लगीं॥ २०½ ॥

नाचने-गानेमें कुशल और चतुर बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ मधुपानजनित मदके वशीभूत हो श्रीरामचन्द्रजीके निकट अपनी नृत्य-कलाका प्रदर्शन करने लगीं॥ २१½ ॥

दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीराम सदा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित हुई उन मनोऽभिराम रमणियोंको उपहार आदि देकर संतुष्ट रखते थे॥ २२½ ॥

उस समय भगवान् श्रीराम सीतादेवीके साथ सिंहासनपर विराजमान हो अपने तेजसे अरुन्धतीके साथ बैठे हुए वसिष्ठजीके समान शोभा पाते थे॥ २३½ ॥

यों श्रीराम प्रतिदिन देवताके समान आनन्दित रहकर देवकन्याके समान सुन्दरी विदेहनन्दिनी सीताके साथ रमण करते थे॥ २४½ ॥

इस प्रकार सीता और रघुनाथजी चिरकालतक विहार करते रहे। इतनेहीमें सदा भोग प्रदान करनेवाला शिशिरऋतुका सुन्दर समय व्यतीत हो गया। भाँतिभाँतिके भोगोंका उपभोग करते हुए उन राजदम्पतिका वह शिशिरकाल बीत गया॥ २५-२६ ॥

धर्मज्ञ श्रीराम दिनके पूर्वभागमें धर्मके अनुसार धार्मिक कृत्य करते थे और शेष आधे दिन अन्तःपुरमें रहते थे॥ २७ ॥

सीताजी भी पूर्वाह्नकालमें देवपूजन आदि करके सब सासुओंकी समानरूपसे सेवा-पूजा करती थीं॥ २८ ॥

तत्पश्चात् विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो श्रीरामचन्द्रजीके पास चली जाती थीं। ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गमें शची सहस्त्राक्ष इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं॥ २९ ॥

इन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पत्नीको गर्भके मङ्गलमय चिह्नसे युक्त देखकर अनुपम हर्ष प्राप्त किया और कहा— ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’॥ ३० ॥

फिर वे देवकन्याके समान सुन्दरी सीतासे बोले— ‘विदेहनन्दिनि! तुम्हारे गर्भसे पुत्र प्राप्त होनेका यह समय उपस्थित है। वरारोहे! बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?’॥ ३१½ ॥

इसपर सीताजीने मुसकराकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘रघुनन्दन! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनोंको देखनेकी हो रही है। देव! गङ्गातटपर रहकर फल-मूल खानेवाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप (कुछ दिन) रहना चाहती हूँ। काकुत्स्थ! फल-मूलका आहार करनेवाले महात्माओंके तपोवनमें एक रात निवास करूँ, यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है’॥ ३२—३४½ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने सीताकी इस इच्छाको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा की और कहा— ‘विदेहनन्दिनि! निश्चिन्त रहो। कल ही वहाँ जाओगी, इसमें संशय नहीं है’॥ ३५ ॥

मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम अपने मित्रोंके साथ बीचके खण्डमें चले गये॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥

तैंतालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

तैंतालीसवाँ सर्ग

भद्रका पुरवासियोंके मुखसे सीताके विषयमें सुनी हुई अशुभ चर्चासे श्रीरामको अवगत कराना

वहाँ बैठे हुए महाराज श्रीरामके पास अनेक प्रकारकी कथाएँ कहनेमें कुशल हास्यविनोद करनेवाले सखा सब ओरसे आकर बैठते थे॥ १ ॥

उन सखाओंके नाम इस प्रकार हैं—विजय, मधुमत्त, काश्यप, मङ्गल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुमागध॥ २ ॥

ये सब लोग बड़े हर्षसे भरकर महात्मा श्रीरघुनाथजीके सामने अनेक प्रकारकी हास्य-विनोदपूर्ण कथाएँ कहा करते थे॥ ३ ॥

इसी समय किसी कथाके प्रसङ्गमें श्रीरघुनाथजीने पूछा— ‘भद्र! आजकल नगर और राज्यमें किस बातकी चर्चा विशेषरूपसे होती है?॥ ४ ॥

‘नगर और जनपदके लोग मेरे, सीताके, भरतके, लक्ष्मणके तथा शत्रुघ्न और माता कैकेयीके विषयमें क्या-क्या बातें करते हैं? क्योंकि राजा यदि आचारविचार से हीन हों तो वे अपने राज्यमें तथा वनमें (ऋषि-मुनियोंके आश्रममें) भी निन्दाके विषय बन जाते हैं— सर्वत्र उन्हींकी बुराइयोंकी चर्चा होती है’॥ ५-६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’॥ ७ ॥

‘सौम्य! पुरुषोत्तम! दशग्रीव-वधसम्बन्धी जो आपकी विजय है, उसको लेकर नगरमें सब लोग अधिक बातें किया करते हैं’॥ ८ ॥

भद्रके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा— ‘पुरवासी मेरे विषयमें कौन-कौन-सी शुभ या अशुभ बातें कहते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे पूर्णतः बताओ। इस समय उनकी शुभ बातें सुनकर जिन्हें वे शुभ मानते हैं उनका मैं आचरण करूँगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वे अशुभ समझते हैं, उन कृत्योंको त्याग दूँगा॥ ९-१० ॥

‘तुम विश्वस्त और निश्चिन्त होकर बेखटके कहो। पुरवासी और जनपदके लोग मेरे विषयमें किस प्रकार अशुभ चर्चाएँ करते हैं’॥ ११ ॥

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही— ॥ १२ ॥

‘राजन्! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजारमें, सड़कोंपर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषयमें किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं? यह बता रहा हूँ॥ १३ ॥

‘वे कहते हैं ‘श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है। ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा॥ १४ ॥

‘श्रीरामद्वारा दुर्धर्ष रावण सेना और सवारियोंसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये॥ १५ ॥

‘परंतु एक बात खटकती है, युद्धमें रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये। उनके मनमें सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ॥ १६ ॥

‘उनके हृदयमें सीता-सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोदमें उठाकर उनका अपहरण किया था, फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा-कानन अशोकवनिकामें रखा। इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं। अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है’॥ १७—१९ ॥

‘राजन्! इस प्रकार सारे नगर और जनपदमें पुरवासी मनुष्य बहुत-सी बातें कहते हैं’॥ २० ॥

भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा— ‘आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है’॥ २१ ॥

तब सबने धरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणीमें कहा— ‘प्रभो! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है’॥

सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको विदा कर दिया॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’॥ ७ ॥

‘सौम्य! पुरुषोत्तम! दशग्रीव-वधसम्बन्धी जो आपकी विजय है, उसको लेकर नगरमें सब लोग अधिक बातें किया करते हैं’॥ ८ ॥

भद्रके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा—‘पुरवासी मेरे विषयमें कौन-कौन-सी शुभ या अशुभ बातें कहते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे पूर्णतः बताओ। इस समय उनकी शुभ बातें सुनकर जिन्हें वे शुभ मानते हैं उनका मैं आचरण करूँगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वे अशुभ समझते हैं, उन कृत्योंको त्याग दूँगा॥ ९-१० ॥

‘तुम विश्वस्त और निश्चिन्त होकर बेखटके कहो। पुरवासी और जनपदके लोग मेरे विषयमें किस प्रकार अशुभ चर्चाएँ करते हैं’॥ ११ ॥

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही— ॥ १२ ॥

‘राजन्! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजारमें, सड़कोंपर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषयमें किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं? यह बता रहा हूँ॥ १३ ॥

‘वे कहते हैं ‘श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है। ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा॥ १४ ॥

‘श्रीरामद्वारा दुर्धर्ष रावण सेना और सवारियोंसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये॥ १५ ॥

‘परंतु एक बात खटकती है, युद्धमें रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये। उनके मनमें सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ॥ १६ ॥

‘उनके हृदयमें सीता-सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोदमें उठाकर उनका अपहरण किया था, फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा-कानन अशोकवनिकामें रखा। इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं। अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है’॥ १७—१९ ॥

‘राजन्! इस प्रकार सारे नगर और जनपदमें पुरवासी मनुष्य बहुत-सी बातें कहते हैं’॥ २० ॥

भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा—‘आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है’॥ २१ ॥

तब सबने धरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणीमें कहा—‘प्रभो! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है’॥

सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको विदा कर दिया॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥

चौवालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

चौवालीसवाँ सर्ग

श्रीरामके बुलानेसे सब भाइयोंका उनके पास आना

मित्रमण्डलीको विदा करके श्रीरघुनाथजीने बुद्धिसे विचारकर अपना कर्तव्य निश्चित किया और निकटवर्ती द्वारपालसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘तुम जाकर शीघ्र ही महाभाग भरत, सुमित्राकुमार शुभलक्षण लक्ष्मण तथा अपराजित वीर शत्रुघ्नको भी यहाँ बुला लाओ’॥ २ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर द्वारपालने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और लक्ष्मणके घर जाकर बेरोक-टोक उसके भीतर प्रवेश किया॥ ३ ॥

वहाँ हाथ जोड़ जय-जयकार करते हुए उसने महात्मा लक्ष्मणसे कहा—‘कुमार! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। अतः शीघ्र चलिये, विलम्ब न कीजिये’॥ ४ ॥

तब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीके आदेशको शिरोधार्य किया और तत्काल रथपर बैठकर वे श्रीरघुनाथजीके महलकी ओर तीव्रगतिसे चले॥ ५ ॥

लक्ष्मणको जाते देख द्वारपाल भरतके पास गया और उन्हें हाथ जोड़ वहाँ जय-जयकार करके विनीतभावसे बोला—‘प्रभो! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं’॥ ६½ ॥

श्रीरामके भेजे हुए द्वारपालके मुखसे यह बात सुनकर महाबली भरत तुरंत अपने आसनसे उठ खड़े हुए और पैदल ही चल दिये॥ ७½ ॥

भरतको जाते देख द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ शत्रुघ्नके भवनमें गया और हाथ जोड़कर बोला— ॥ ८½ ॥

‘रघुश्रेष्ठ! आइये, चलिये, राजा श्रीराम आपको देखना चाहते हैं। श्रीलक्ष्मणजी और महायशस्वी भरतजी पहले ही जा चुके हैं’॥ ९½ ॥

द्वारपालकी बात सुनकर शत्रुघ्न अपने उत्तम आसनसे उठे और धरतीपर माथा टेककर मन-ही-मन श्रीरामकी वन्दना करके तुरंत उनके निवासस्थानकी ओर चल दिये॥ १०½ ॥

द्वारपालने आकर श्रीरामसे हाथ जोड़कर निवेदन किया कि ‘प्रभो! आपके सभी भाई द्वारपर उपस्थित हैं’॥ ११½ ॥

कुमारोंका आगमन सुनकर चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियवाले श्रीरामने नीचे मुख किये दुःखी मनसे द्वारपालको आदेश दिया— 'तुम तीनों राजकुमारोंको जल्दी मेरे पास ले आओ। मेरा जीवन इन्हींपर अवलम्बित है। ये मेरे प्यारे प्राणस्वरूप हैं'॥ १२-१३½ ॥

महाराजकी आज्ञा पाकर वे श्वेत वस्त्रधारी कुमार सिर झुकाये हाथ जोड़े एकाग्रचित्त हो भवनके भीतर गये॥ १४½ ॥

उन्होंने श्रीरामका मुख इस तरह उदास देखा, मानो चन्द्रमापर ग्रह लग गया हो। वह संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रभाशून्य हो रहा था॥ १५½ ॥

उन्होंने बारम्बार देखा बुद्धिमान् श्रीरामके दोनों नेत्रोंमें आँसू भर आये थे और उनके मुखारविन्दकी शोभा छिन गयी थी॥ १६ ॥

तदनन्तर उन तीनों भाइयोंने तुरंत श्रीरामके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। फिर वे सब-के-सब प्रेममें समाधिस्थ-से होकर पड़ गये। उस समय श्रीराम आँसू बहा रहे थे॥ १७ ॥

महाबली रघुनाथजीने दोनों भुजाओंसे उठाकर उन सबका आलिङ्गन किया और कहा— 'इन आसनोंपर बैठो।' जब वे बैठ गये, तब उन्होंने फिर कहा— ॥ १८ ॥

'राजकुमारो! तुमलोग मेरे सर्वस्व हो। तुम्हीं मेरे जीवन हो और तुम्हारे द्वारा सम्पादित इस राज्यका मैं पालन करता हूँ॥ १९ ॥

'नरेश्वरो! तुम सभी शास्त्रोंके ज्ञाता और उनमें बताये कर्तव्यका पालन करनेवाले हो। तुम्हारी बुद्धि भी परिपक्व है। इस समय मैं जो कार्य तुम्हारे सामने उपस्थित करनेवाला हूँ, उसका तुम सबको मिलकर सम्पादन करना चाहिये'॥ २० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी भाई चौकन्ने हो गये। सबका चित्त उद्विग्न हो गया और सभी सोचने लगे— 'न जाने महाराज हमसे क्या कहेंगे?'॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

पैंतालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

पैंतालीसवाँ सर्ग

श्रीरामका भाइयोंके समक्ष सर्वत्र फैले हुए लोकापवादकी चर्चा करके सीताको वनमें छोड़ आनेके लिये लक्ष्मणको आदेश देना

‘सुमित्राकुमार! उस समय अपनी पवित्रताका इस प्रकार सब भाँइ दुःखी मनसे वहाँ बैठे हुए थे। उस समय श्रीरामने सूखे मुखसे उनके सामने यह बात कही—॥ १ ॥

‘बन्धुओ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरी बात सुनो। मनको इधर-उधर न ले जाओ। पुरवासियोंके यहाँ मेरे और सीताके विषयमें जैसी चर्चा चल रही है, उसीको बता रहा हूँ॥ २ ॥

‘इस समय पुरवासियों और जनपदके लोगोंमें सीताके सम्बन्धमें महान् अपवाद फैला हुआ है। मेरे प्रति भी उनका बड़ा घृणापूर्ण भाव है। उन सबकी वह घृणा मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण किये देती है॥ ३ ॥

‘मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। सीताने भी महात्मा जनकोंके उत्तम कुलमें जन्म लिया है॥ ४ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! तुम तो यह जानते ही हो कि किस प्रकार रावण निर्जन दण्डकारण्यसे उन्हें हरकर ले गया था और मैंने उसका विध्वंस भी कर डाला॥ ५

‘उसके बाद लङ्कामें ही जानकीके विषयमें मेरे अन्तःकरणमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि इनके इतने दिनोंतक यहाँ रह लेनेपर भी मैं इन्हें राजधानीमें कैसे ले जा सकूँगा॥ ६ ॥

विश्वास दिलानेके लिये सीताने तुम्हारे सामने ही अग्निमें प्रवेश किया था और देवताओंके समक्ष स्वयं अग्निदेवने उन्हें निर्दोष बताया था। आकाशचारी वायु, चन्द्रमा और सूर्यने भी पहले देवताओं तथा समस्त ऋषियोंके समीप जनकनन्दिनीको निष्पाप घोषित किया था॥ ७-८½ ॥

‘इस प्रकार विशुद्ध आचारवाली सीताको देवताओं और गन्धर्वोंके समीप साक्षात् देवराज इन्द्रने लङ्काद्वीपके अंदर मेरे हाथमें सौंपा था॥ ९½ ॥

‘मेरी अन्तरात्मा भी यशस्विनी सीताको शुद्ध समझती है। इसीलिये मैं इन विदेहनन्दिनीको साथ लेकर अयोध्या आया था॥ १०½ ॥

‘परंतु अब यह महान् अपवाद फैलने लगा है। पुरवासियों और जनपदके लोगोंमें मेरी बड़ी निन्दा हो रही है। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा शोक है॥ ११½ ॥

‘जिस किसी भी प्राणीकी अपकीर्ति लोकमें सबकी चर्चाका विषय बन जाती है, वह अधम लोकों (नरकों)-में गिर जाता है और जबतक उस अपयशकी चर्चा होती है तबतक वहीं पड़ा रहता है॥ १२½ ॥

‘देवगण लोकोंमें अपकीर्तिकी निन्दा और कीर्तिकी प्रशंसा करते हैं। समस्त श्रेष्ठ महात्माओंका सारा शुभ आयोजन उत्तम कीर्तिकी स्थापनाके लिये ही होता है॥ १३½ ॥

‘नरश्रेष्ठ बन्धुओ! मैं लोकनिन्दाके भयसे अपने प्राणोंको और तुम सबको भी त्याग सकता हूँ। फिर सीताको त्यागना कौन बड़ी बात है?॥ १४½ ॥

‘अतः तुमलोग मेरी ओर देखो। मैं शोकके समुद्रमें गिर गया हूँ। इससे बढ़कर कभी कोर्इ दुःख मुझे उठाना पड़ा हो, इसकी मुझे याद नहीं है॥ १५½ ॥

‘अतः सुमित्राकुमार! कल सबेरे तुम सारथि सुमन्त्रके द्वारा संचालित रथपर आरूढ़ हो सीताको भी उसीपर चढ़ाकर इस राज्यकी सीमाके बाहर छोड़ दो॥ १६½ ॥

‘गङ्गाके उस पार तमसाके तटपर महात्मा वाल्मीकिमुनिका दिव्य आश्रम है॥ १७½ ॥

‘रघुनन्दन! उस आश्रमके निकट निर्जन वनमें तुम सीताको छोड़कर शीघ्र लौट आओ। सुमित्रानन्दन! मेरी इस आज्ञाका पालन करो। सीताके विषयमें मुझसे किसी तरह कोर्इ दूसरी बात तुम्हें नहीं कहनी चाहिये॥ १८-१९ ॥

‘इसलिये लक्ष्मण! अब तुम जाओ। इस विषयमें कोर्इ सोच-विचार न करो। यदि मेरे इस निश्चयमें तुमने किसी प्रकारकी अड़चन डाली तो मुझे महान् कष्ट होगा॥ २० ॥

‘मैं तुम्हें अपने चरणों और जीवनकी शपथ दिलाता हूँ, मेरे निर्णयके विरुद्ध कुछ न कहो। जो मेरे इस कथनके बीचमें कूदकर किसी प्रकार मुझसे अनुनय-विनय करनेके लिये कुछ कहेंगे, वे मेरे अभीष्ट कार्यमें बाधा डालनेके कारण सदाके लिये मेरे शत्रु होंगे॥ २१½ ॥

‘यदि तुमलोग मेरा सम्मान करते हो और मेरी आज्ञामें रहना चाहते हो तो अब सीताको यहाँसे वनमें ले जाओ। मेरी इस आज्ञाका पालन करो॥ २२½ ॥

‘सीताने पहले मुझसे कहा था कि मैं गङ्गातटपर ऋषियोंके आश्रम देखना चाहती हूँ; अतः उनकी यह इच्छा भी पूर्ण की जाय’॥ २३½ ॥

इस प्रकार कहते-कहते श्रीरघुनाथजीके दोनों नेत्र आँसुओंसे भर गये। फिर वे धर्मात्मा श्रीराम अपने भाइयोंके साथ महलमें चले गये। उस समय उनका हृदय शोकसे व्याकुल था और वे हाथीके समान लम्बी साँस खींच रहे थे॥ २४-२५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥

छियालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

छियालीसवाँ सर्ग

लक्ष्मणका सीताको रथपर बिठाकर उन्हें वनमें छोड़नेके लिये ले जाना और गङ्गाजीके तटपर पहुँचना

तब सुमन्त्र ‘बहुत अच्छा’ कहकर तुरंत ही उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ एक सुन्दर रथ ले आये, जिसपर तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब लक्ष्मणने मन-ही-मन दुःखी हो सूखे मुखसे सुमन्त्रसे कहा— ॥ १ ॥

बिछा दो। मैं महाराजकी आज्ञासे सीतादेवीको पुण्यकर्मा महर्षियोंके आश्रमपर पहुँचा दूँगा। तुम शीघ्र रथ ले आओ’॥ २-३ ॥

‘सारथे! एक उत्तम रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतो और उस रथमें सीताजीके लिये सुन्दर आसन

सुखद शय्यासे युक्त सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था॥ ४ ॥

उसे लाकर वे मित्रोंका मान बढ़ानेवाले सुमित्रा-कुमारसे बोले— ‘प्रभो! यह रथ आ गया। अब जो कुछ करना हो कीजिये’॥ ५ ॥

सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण राजमहलमें गये और सीताजीके पास जाकर बोले— ॥ ६ ॥

‘देवि! आपने महाराजसे मुनियोंके आश्रमोंपर जानेके लिये वर माँगा था और महाराजने आपको आश्रमपर पहुँचानेके लिये प्रतिज्ञा की थी॥ ७ ॥

‘देवि! विदेहनन्दिनि! उस बातचीतके अनुसार मैं राजाकी आज्ञासे शीघ्र ही गङ्गातटपर ऋषियोंके सुन्दर आश्रमोंतक चलूँगा और आपको मुनिजनसेवित वनमें पहुँचाऊँगा’॥ ८½ ॥

महात्मा लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ ९½ ॥

बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न लेकर वैदेही सीता वनकी यात्राके लिये उद्यत हो गयीं और लक्ष्मणसे बोलीं— ‘ये सब बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न-धन मैं मुनि-पत्नियोंको दूँगी’॥ १०-११½ ॥

लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मिथिलेशकुमारी सीताको रथपर चढ़ाया और श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाको ध्यानमें रखते हुए उस तेज घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर वे वनकी ओर चल दिये॥ १२½ ॥

उस समय सीताने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मणसे कहा ‘रघुनन्दन! मुझे बहुत-से अपशकुन दिखायी देते हैं। आज मेरी दायीं आँख फड़कती है और मेरे शरीरमें कम्प हो रहा है॥ १३-१४ ॥

‘सुमित्राकुमार! मैं अपने हृदयको अस्वस्थ-सा देख रही हूँ। मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है और मेरी अधीरता पराकाष्ठाको पहुँची हुई है॥ १५ ॥

‘विशाललोचन लक्ष्मण! मुझे पृथ्वी सूनी-सी ही दिखायी देती है। भ्रातृवत्सल! तुम्हारे भाई कुशलसे रहें॥ १६ ॥

‘वीर! मेरी सब सासुएँ समान रूपसे सानन्द रहें। नगर और जनपदमें भी समस्त प्राणी सकुशल रहें’॥ १७ ॥

ऐसा कहती हुई सीताने हाथ जोड़कर देवताओंसे प्रार्थना की। सीताकी बात सुनकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऊपरसे प्रसन्न हो मुरझाये हुए हृदयसे कहा—‘सबका कल्याण हो’॥ १८½ ॥

तदनन्तर गोमतीके तटपर पहुँचकर एक आश्रममें उन सबने रात बितायी। फिर प्रातःकाल उठकर सुमित्राकुमारने सारथिसे कहा—॥ १९½ ॥

‘सारथे! जल्दी रथ जोतो। आज मैं भागीरथीके जलको उसी प्रकार सिरपर धारण करूँगा; जैसे भगवान् शङ्करने अपने तेजसे उसे मस्तकपर धारण किया था’॥ २०½ ॥

सारथिने मनके समान वेगशाली चारों घोड़ोंको टहलाकर रथमें जोता और विदेहनन्दिनी सीतासे हाथ जोड़कर कहा—‘देवि! रथपर आरूढ़ होइये’॥ २१½ ॥

सूतके कहनेसे देवी सीता उस उत्तम रथपर सवार हुईं। इस प्रकार सुमित्राकुमार लक्ष्मण और बुद्धिमान् सुमन्त्रके साथ विशाललोचना सीतादेवी पापनाशिनी गङ्गाके तटपर जा पहुँचीं॥ २२-२३ ॥

दोपहरके समय भागीरथीकी जलधारातक पहुँचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुःखी हो उच्च स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे॥ २४ ॥

लक्ष्मणको शोकसे आतुर देख धर्मज्ञा सीता अत्यन्त चिन्तित हो उनसे बोलीं— ‘लक्ष्मण! यह क्या? तुम रोते क्यों हो! गङ्गाके तटपर आकर तो मेरी चिरकालकी अभिलाषा पूर्ण हुई है। इस हर्षके समय तुम रोकर मुझे दुःखी क्यों करते हो?॥ २५-२६ ॥

‘पुरुषप्रवर! श्रीरामके पास तो तुम सदा ही रहते हो। क्या दो दिनतक उनसे बिछुड़ जानेके कारण तुम इतने शोकाकुल हो गये हो?॥ २७ ॥

‘लक्ष्मण! श्रीराम तो मुझे भी अपने प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हैं; परंतु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही हूँ। तुम ऐसे नादान न बनो॥ २८ ॥

‘मुझे गङ्गाके उस पार ले चलो और तपस्वी मुनियोंके दर्शन कराओ। मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूँगी॥ २९ ॥

‘तत्पश्चात् उन महर्षियोंका यथायोग्य अभिवादन करके वहाँ एक रात ठहरकर हम पुनः अयोध्यापुरीको लौट चलेंगे॥ ३० ॥

‘मेरा मन भी सिंहके समान वक्षःस्थल, कृश उदर और कमलके समान नेत्रवाले श्रीरामको, जो मनको रमानेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, देखनेके लिये उतावला हो रहा है’॥ ३१ ॥

सीताजीका यह वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपनी दोनों सुन्दर आँखें पोंछ लीं और नाविकोंको बुलाया। उन मल्लाहोंने हाथ जोड़कर कहा— ‘प्रभो! यह नाव तैयार है’॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥