भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2444

लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मिथिलेशकुमारी सीताको रथपर चढ़ाया और श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाको ध्यानमें रखते हुए उस तेज घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर वे वनकी ओर चल दिये॥ १२½ ॥

उस समय सीताने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मणसे कहा ‘रघुनन्दन! मुझे बहुत-से अपशकुन दिखायी देते हैं। आज मेरी दायीं आँख फड़कती है और मेरे शरीरमें कम्प हो रहा है॥ १३-१४ ॥

‘सुमित्राकुमार! मैं अपने हृदयको अस्वस्थ-सा देख रही हूँ। मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है और मेरी अधीरता पराकाष्ठाको पहुँची हुई है॥ १५ ॥

‘विशाललोचन लक्ष्मण! मुझे पृथ्वी सूनी-सी ही दिखायी देती है। भ्रातृवत्सल! तुम्हारे भाई कुशलसे रहें॥ १६ ॥

‘वीर! मेरी सब सासुएँ समान रूपसे सानन्द रहें। नगर और जनपदमें भी समस्त प्राणी सकुशल रहें’॥ १७ ॥

ऐसा कहती हुई सीताने हाथ जोड़कर देवताओंसे प्रार्थना की। सीताकी बात सुनकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऊपरसे प्रसन्न हो मुरझाये हुए हृदयसे कहा—‘सबका कल्याण हो’॥ १८½ ॥

तदनन्तर गोमतीके तटपर पहुँचकर एक आश्रममें उन सबने रात बितायी। फिर प्रातःकाल उठकर सुमित्राकुमारने सारथिसे कहा—॥ १९½ ॥

‘सारथे! जल्दी रथ जोतो। आज मैं भागीरथीके जलको उसी प्रकार सिरपर धारण करूँगा; जैसे भगवान् शङ्करने अपने तेजसे उसे मस्तकपर धारण किया था’॥ २०½ ॥

सारथिने मनके समान वेगशाली चारों घोड़ोंको टहलाकर रथमें जोता और विदेहनन्दिनी सीतासे हाथ जोड़कर कहा—‘देवि! रथपर आरूढ़ होइये’॥ २१½ ॥

सूतके कहनेसे देवी सीता उस उत्तम रथपर सवार हुईं। इस प्रकार सुमित्राकुमार लक्ष्मण और बुद्धिमान् सुमन्त्रके साथ विशाललोचना सीतादेवी पापनाशिनी गङ्गाके तटपर जा पहुँचीं॥ २२-२३ ॥

दोपहरके समय भागीरथीकी जलधारातक पहुँचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुःखी हो उच्च स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे॥ २४ ॥