भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2453, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2453

श्रीरघुनाथजीकी प्रिय पत्नी सीताको अनाथकी-सी दशामें देखा॥ ८-९ ॥

शोकके भारसे पीड़ित हुई सीताको अपने तेजसे आह्लादित-सी करते हुए मुनिवर वाल्मीकि मधुर वाणीमें बोले— ॥ १० ॥

‘पतिव्रते! तुम राजा दशरथकी पुत्रवधू, महाराज श्रीरामकी प्यारी पटरानी और मिथिलाके राजा जनककी पुत्री हो। तुम्हारा स्वागत है॥ ११ ॥

‘जब तुम यहाँ आ रही थी, तभी अपनी धर्मसमाधिके द्वारा मुझे इसका पता लग गया था। तुम्हारे परित्यागका जो सारा कारण है, उसे मैंने अपने मनसे ही जान लिया है॥ १२ ॥

‘महाभागे! तुम्हारा सारा वृत्तान्त मैंने ठीक-ठीक जान लिया है। त्रिलोकीमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मुझे विदित है॥ १३ ॥

‘सीते! मैं तपस्याद्वारा प्राप्त हुई दिव्य-दृष्टिसे जानता हूँ कि तुम निष्पाप हो। अतः विदेहनन्दिनि! अब निश्चिन्त हो जाओ। इस समय तुम मेरे पास हो॥ १४ ॥

‘बेटी! मेरे आश्रमके पास ही कुछ तापसी स्त्रियाँ रहती हैं, जो तपस्यामें संलग्न हैं। वे अपनी बच्चीके समान सदा तुम्हारा पालन करेंगी॥ १५ ॥

‘यह मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण करो और

निश्चिन्त एवं निर्भय हो जाओ। अपने ही घरमें आ गयी हो, ऐसा समझकर विषाद न करो’॥ १६ ॥

महर्षिका यह अत्यन्त अद्भुत भाषण सुनकर सीताने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा— ‘जो आज्ञा’॥ १७ ॥

तब मुनि आगे-आगे चले और सीता हाथ जोड़े उनके पीछे हो लीं। विदेहनन्दिनीके साथ महर्षिको आते देख मुनिपत्नियाँ उनके पास आयीं और बड़ी प्रसन्नताके साथ इस प्रकार बोलीं— ॥ १८ ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। बहुत दिनोंके बाद यहाँ आपका शुभागमन हुआ है। हम सभी आपको अभिवादन करती हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें’॥ १९ ॥

उनका यह वचन सुनकर वाल्मीकिजी बोले— ‘ये परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामकी धर्मपत्नी सीता यहाँ आयी हैं॥ २० ॥