भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2466

डेढ़ योजन (छः-छः कोस)-की भूमि घेरकर खूब रमणीय बना दी जाय। जबतक शापका समय बीतेगा, तबतक मैं वहीं सुखपूर्वक रहूँगा। उन गड्डोंमें प्रतिदिन सुगन्धित पुष्प संचित किये जायँ'॥ १०—१२ १/२ ॥

‘ऐसी व्यवस्था करके राजकुमार वसुको राजसिंहासनपर बिठाकर राजाने उस समय उनसे कहा— ‘बेटा! तुम प्रतिदिन धर्मपरायण रहकर क्षत्रियध र्मके अनुसार प्रजाका पालन करो॥ १३ १/२ ॥

‘दोनों ब्राह्मणोंने मुझपर जिस प्रकार शापद्वारा प्रहार किया है, वह तुम्हारी आँखोंके सामने है। नरश्रेष्ठ! वैसे थोड़े-से अपराधपर भी रुष्ट होकर उन्होंने मुझे शाप दे दिया है॥ १४ १/२ ॥

‘पुरुषप्रवर! तुम मेरे लिये संताप न करो। बेटा! जिसने मुझे व्यसनी बनाया—संकटमें डाला है, अपना किया हुआ वह प्राचीन कर्म ही अनुकूल-प्रतिकूल फल देनेमें समर्थ होता है॥ १५ १/२ ॥

‘वत्स! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके अनुसार मनुष्य उन्हीं वस्तुओंको पाता है, जिन्हें पानेका वह अधिकारी है। उन्हीं स्थानोंपर जाता है, जहाँ जाना उसके लिये अनिवार्य है तथा उन्हीं दुःखों और सुखोंको उपलब्ध करता है, जो उसके लिये नियत हैं; अतः तुम विषाद न करो’॥ १६-१७ ॥

‘नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर महायशस्वी नरपाल राजा नृगने अपने रहनेके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किये गये गड्ढेमें प्रवेश किया॥ १८ ॥

‘इस तरह उस रत्नविभूषित महान् गर्तमें प्रवेश करके उस समय महात्मा राजा नृगने ब्राह्मणोंद्वारा रोषपूर्वक दिये गये उस शापको भोगना आरम्भ किया’॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥