श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2482, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें॥
‘वे ही चन्द्रमा हैं, वे ही मृत्यु हैं, वे ही यम, कुबेर, अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वरुण हैं॥ २४ ॥
‘सुमित्रानन्दन! श्रीरघुनाथजी प्रजापालक हैं। आप उनसे कहिये। मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना इस भवनमें प्रवेश करना नहीं चाहता’॥ २५ ॥
यह सुनकर महातेजस्वी महाभाग लक्ष्मणने दयावश राजभवनमें प्रवेश करके कहा— ॥ २६ ॥
‘कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरघुनाथजी! मेरा यह निवेदन सुनिये। आपने जो आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने बाहर जाकर कार्यार्थीको पुकारा॥ २७ ॥
‘इस समय आपके द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो कार्यार्थी होकर आया है।’ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर श्रीरामने कहा—‘यहाँ जो भी कार्यार्थी होकर खड़ा है, उसे शीघ्र इस सभाके भीतर ले आओ’॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ॥
१॥
* कुछ प्रतियोंमें यहाँ तीन सर्ग और मिलते हैं, जिनपर संस्कृत-टीकाकारोंकी व्याख्या न मिलनेसे इन्हें प्रक्षिप्त बताया गया है। इनमेंसे दो सर्ग उपयोगी होनेके कारण यहाँ अनुवादसहित दिये जा रहे हैं।