श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2483, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रक्षिप्त सर्ग २
कुत्तेके प्रति श्रीरामका न्याय, उसकी इच्छाके अनुसार उसे मारनेवाले ब्राह्मणको मठाधीश बना देना और कुत्तेका मठाधीश होनेका दोष बताना
श्रीरामका यह वचन सुनकर बुद्धिमान् लक्ष्मणने तत्काल उस कुत्तेको बुलाया और श्रीरामको उसके आनेकी सूचना दी॥ १ ॥
वहाँ आये हुए कुत्तेकी ओर देखकर श्रीरामने कहा— ‘सारमेय! तुम्हें जो कुछ कहना है, उसे मेरे सामने कहो। यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है’॥ २ ॥
कुत्तेका मस्तक फट गया था। उसने राजसभामें बैठे हुए महाराज श्रीरामकी ओर देखा और देखकर इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
‘राजा ही समस्त प्राणियोंका उत्पादक और नायक है। राजा सबके सोते रहनेपर भी जागता है और प्रजाओंका पालन करता है॥ ४ ॥
‘राजा सबका रक्षक है। वह उत्तम नीतिका प्रयोग करके सबकी रक्षा करता है। यदि राजा पालन न करे तो समस्त प्रजाएँ शीघ्र नष्ट हो जाती हैं॥ ५ ॥
‘राजा कर्ता, राजा रक्षक और राजा सम्पूर्ण जगत्का पिता है। राजा काल और युग है तथा राजा यह सम्पूर्ण जगत् है॥ ६ ॥
‘धर्म सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है, इसीलिये उसका नाम धर्म है। धर्मने ही समस्त प्रजाको धारण कर रखा है; क्योंकि वही चराचर प्राणियोंसहित सारी त्रिलोकीका आधार है॥ ७ ॥
‘राजा अपने द्रोहियोंको भी धारण करता है (अथवा वह दुष्टोंको भी मर्यादामें स्थापित करता है) तथा वह धर्मके द्वारा प्रजाको प्रसन्न रखता है; इसलिये उसके शासनरूप कर्मको धारण कहा गया है और धारण ही धर्म है, यह शास्त्रका सिद्धान्त है॥ ८ ॥
‘रघुनन्दन! यह प्रजापालनरूप परम धर्म राजाको परलोकमें उत्तम फल देनेवाला होता है। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि धर्मसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ९ ॥
‘श्रीराम! दान, दया, सत्पुरुषोंका सम्मान और व्यवहारमें सरलता यह परम धर्म है। प्रजाजनोंकी रक्षासे होनेवाला उत्कृष्ट धर्म इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाला होता है॥