भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2484

१० ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले रघुनन्दन! आप समस्त प्रमाणोंके भी प्रमाण हैं। सत्पुरुषोंने जिस धर्मका आचरण किया है, वह आपको भलीभाँति विदित ही है॥ ११ ॥

‘राजन्! आप धर्मोंके परम धाम और गुणोंके सागर हैं। नृपश्रेष्ठ! मैंने अज्ञानवश ही आपके सामने धर्मकी व्याख्या की है॥ १२ ॥

‘इसके लिये मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर क्षमा चाहता और आपके प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ। आप यहाँ मुझपर कुपित न हों।’ कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी बोले— ॥ १३ ॥

‘तुम निर्भय होकर बताओ। आज मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ। अपना काम बतानेमें विलम्ब न करो।’ श्रीरामकी यह बात सुनकर कुत्ता बोला— ॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन! राजा धर्मसे ही राज्य प्राप्त करे और धर्मसे ही निरन्तर उसका पालन करे। धर्मसे ही राजा सबको शरण देनेवाला और सबका भय दूर करनेवाला होता है। ऐसा जानकर आप मेरा जो कार्य है, उसे सुनिये॥ १५ १/२ ॥

‘प्रभो! सर्वार्थसिद्ध नामसे प्रसिद्ध एक भिक्षु है, जो ब्राह्मणोंके घरमें रहा करता है। उसने आज अकारण मुझपर प्रहार किया है। मैंने उसका कोऽइ अपराध नहीं किया था’॥ १६ १/२ ॥

कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरामने तत्काल एक द्वारपाल भेजा और उस सर्वार्थसिद्ध नामक विद्वान् भिक्षु ब्राह्मणको बुलवाया॥ १७ १/२ ॥

श्रीरामको देखकर उस महातेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणने पूछा—‘निष्पाप रघुनन्दन! मुझसे आपको क्या काम है ?’॥ १८ १/२ ॥

ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर श्रीराम बोले— ‘ब्रह्मन्! आपने इस कुत्तेके सिरपर जो यह प्रहार किया है, उसका क्या कारण है? विप्रवर! इसने आपका क्या अपराध किया था, जिसके कारण आपने इसे डंडा मारा है?॥ १९-२० ॥

‘क्रोध प्राणहारी शत्रु है। क्रोधको मित्रमुख* शत्रु बताया गया है। क्रोध अत्यन्त तीखी तलवार है तथा क्रोध सारे सद्गुणोंको खींच लेता है॥ २१ ॥

‘मनुष्य जो तप करता, यज्ञ करता और दान देता है, उन सबके पुण्यको वह क्रोधके द्वारा नष्ट कर देता है। इसलिये क्रोधको त्याग देना चाहिये॥ २२ ॥