श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘दुष्ट घोड़ोंकी तरह विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियोंको उन विषयोंकी ओरसे हटाकर धैर्यपूर्वक उन्हें नियन्त्रणमें रखे॥ २३ ॥
‘मनुष्यको चाहिये कि वह अपने पास विचरनेवाले लोगोंकी मन, वाणी, क्रिया और दृष्टिद्वारा भलाऽइ ही करे। किसीसे द्वेष न रखे। ऐसा करनेसे वह पापसे लिप्त नहीं होता॥ २४ ॥
‘अपना दुष्ट मन जो अनिष्ट या अनर्थ कर सकता है, वैसा तीखी तलवार, पैरोंतले कुचला हुआ सर्प अथवा सदा क्रोधसे भरा रहनेवाला शत्रु भी नहीं कर सकता॥ २५ ॥
‘जिसे विनयकी शिक्षा मिली हो, उसकी भी प्रकृति नयी नहीं बनती है। कोऽइ अपनी दुष्ट प्रकृतिको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके कार्यमें उसकी दुष्टता निश्चय ही प्रकट हो जाती है’॥ २६ ॥
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर सर्वार्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने उनके निकट इस प्रकार कहा— ॥ २७ ॥
‘प्रभो! मेरा मन क्रोधसे भर गया था, इसलिये मैंने इसे डंडेसे मारा है। भिक्षाका समय बीत चुका था, तथापि भूखे रहनेके कारण भिक्षा माँगनेके लिये मैं द्वारद्वार घूम रहा था। यह कुत्ता बीच रास्तेमें खड़ा था। मैंने बार-बार कहा— ‘तुम रास्तेसे हट जाओ, हट जाओ’ फिर यह अपनी मौजसे चला और सड़कके बीचमें बेढंगे खड़ा हो गया॥ २८-२९ ॥
‘मैं भूखा तो था ही, क्रोध चढ़ आया। राजाधिराज रघुनन्दन! उस क्रोधसे ही प्रेरित होकर मैंने इसके सिरपर डंडा मार दिया। मैं अपराधी हूँ। आप मुझे दण्ड दीजिये। राजेन्द्र! आपसे दण्ड मिल जानेपर मुझे नरकमें पड़नेका डर नहीं रहेगा’॥ ३० १/२ ॥
तब श्रीरामने सभी सभासदोंसे पूछा— ‘आपलोग बतावें, इसके लिये क्या करना चाहिये? इसे कौन-सा दण्ड दिया जाय! क्योंकि भलीभाँति दण्डका प्रयोग होनेपर प्रजा सुरक्षित रहती है’॥ ३१-३२ ॥
उस सभामें भृगु, आङ्गिरस, कुत्स, वसिष्ठ और काश्यप आदि मुनि थे। धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले मुख्य-मुख्य विद्वान् उपस्थित थे। मन्त्री और महाजन मौजूद थे—ये तथा और बहुत-से पण्डित वहाँ एकत्र हुए थे। राजधर्मोंके ज्ञानमें परिनिष्ठित वे सभी विद्वान् श्रीरघुनाथजीसे बोले—‘भगवन्! ब्राह्मण दण्डद्वारा अवध्य है, उसे शारीरिक दण्ड नहीं मिलना चाहिये, यही समस्त शास्त्रज्ञोंका मत है’॥ ३३-३४ १/२ ॥