श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2507, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ऐसी बातें कहते हुए इन्द्रसे मान्धाताने पूछा— ‘देवराज! बताइये तो सही, इस पृथ्वीपर कहाँ मेरे आदेशकी अवहेलना होती है’?॥ १२ ॥
‘तब इन्द्रने कहा— ‘निष्पाप नरेश! मधुवनमें मधुका पुत्र लवणासुर रहता है। वह तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता’॥
‘इन्द्रकी कही हुई यह घोर अप्रिय बात सुनकर राजा मान्धाताका मुख लज्जासे झुक गया। वे कुछ बोल न सके॥ १४ ॥
‘वे नरेश इन्द्रसे विदा ले मुँह लटकाये वहाँसे चल दिये और पुनः इस मर्त्यलोकमें ही आ पहुँचे॥ १५ ॥
‘उन्होंने अपने हृदयमें अमर्ष भर लिया। फिर वे शत्रुदमन मान्धाता मधुके पुत्रको वशमें करनेके लिये सेवक, सेना और सवारियोंसहित उसकी राजधानीके समीप आये॥ १६ ॥
‘उन पुरुषप्रवर नरेशने युद्धकी इच्छासे लवणके पास अपना दूत भेजा॥ १७ ॥
‘दूतने वहाँ जाकर मधुके पुत्रको बहुत-से कटुवचन सुनाये। इस तरह कठोर बातें कहते हुए उस दूतको वह राक्षस तुरंत खा गया॥ १८ ॥
‘जब दूतके लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब राजा बड़े क्रुद्ध हुए और बाणोंकी वर्षा करके उस राक्षसको सब ओरसे पीड़ित करने लगे॥ १९ ॥
‘तब लवणासुरने हँसकर हाथसे वह शूल उठाया और सेवकोंसहित राजा मान्धाताका वध करनेके लिये उस उत्तम अस्त्रको उनके ऊपर छोड़ दिया॥ २० ॥
‘वह चमचमाता हुआ शूल सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा मान्धाताको भस्म करके फिर लवणासुरके हाथमें आ गया॥ २१ ॥
‘इस प्रकार सारी सेना और सवारियोंके साथ महाराज मान्धाता मारे गये। सौम्य! उस शूलकी शक्ति असीम और सबसे बढ़ी-चढ़ी है॥ २२ ॥
‘राजन्! कल सबेरे जबतक वह राक्षस उस अस्त्रको न ले, तबतक ही शीघ्रता करनेपर तुम निःसंदेह उसका वध कर सकोगे और इस प्रकार निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी॥ २३ ॥
‘तुम्हारे द्वारा यह कार्य सम्पन्न होनेपर समस्त लोकोंका कल्याण होगा। नरश्रेष्ठ! इस तरह मैंने तुम्हें दुरात्मा लवणका सारा बल बता दिया और उसके शूलकी भी घोर एवं असीम