भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2596

वे दोनों नगर धन-धान्य एवं रत्नसमूहोंसे भरे थे। अनेकानेक कानन उनकी शोभा बढ़ाते थे। गुणविस्तारकी दृष्टिसे वे मानो परस्पर होड़ लगाकर संघर्षपूर्वक आगे बढ़ रहे थे॥ १२ ॥

दोनों नगरोंकी शोभा परम मनोहर थी। दोनों स्थानोंका व्यवहार (व्यापार) निष्कपट, शुद्ध एवं सरल था। दोनों ही नगर उद्यानों (बाग-बगीचों) तथा नाना प्रकारकी सवारियोंसे भरे-पूरे थे। उनके भीतर अलग-अलग कई बाजार थे॥ १३ ॥

दोनों श्रेष्ठ पुरोंकी रमणीयता देखते ही बनती थी। अनेक ऐसे विस्तृत पदार्थ उनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनका नाम अभीतक नहीं लिया गया है। सुन्दर श्रेष्ठ गृह तथा बहुत-से सतमहले मकान वहाँकी श्रीवृद्धि कर रहे थे॥ १४ ॥

अनेकानेक शोभासम्पन्न देवमन्दिरों तथा ताल, तमाल, तिलक और मौलसिरी आदिके वृक्षोंसे भी उन दोनों नगरोंकी शोभा एवं रमणीयता बढ़ गयी थी॥ १५ ॥

पाँच वर्षोंमें उन राजधानियोंको अच्छी तरह आबाद करके श्रीरामके छोटे भाई कैकेयीकुमार महाबाहु भरत फिर अयोध्यामें लौट आये॥ १६ ॥

वहाँ पहुँचकर श्रीमान् भरतने द्वितीय धर्मराजके समान महात्मा श्रीरघुनाथजीको उसी तरह प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीको प्रणाम करते हैं॥ १७ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने गन्धर्वोंके वध और उस देशको अच्छी तरह आबाद करनेका यथावत् समाचार कह सुनाया। सुनकर श्रीरघुनाथजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२ ॥