भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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एक सौ सातवाँ सर्ग

वसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरामका पुरवासियोंको अपने साथ ले जानेका विचार तथा कुश और लवका राज्याभिषेक करना

लक्ष्मणका त्याग करके श्रीराम दुःख-शोकमें मग्न हो गये तथा पुरोहित, मन्त्री और महाजनोंसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘आज मैं अयोध्याके राज्यपर धर्मवत्सल वीर भाई भरतका राजाके पदपर अभिषेक करूँगा। उसके बाद वनको चला जाऊँगा॥ २ ॥

‘शीघ्र ही सब सामग्री जुटाकर ले आओ। अब अधिक समय नहीं बीतना चाहिये। मैं आज ही लक्ष्मणके पथका अनुसरण करूँगा’॥ ३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर प्रजावर्गके सभी लोग धरतीपर माथा टेककर पड़ गये और प्राणहीन-से हो गये॥ ४ ॥

श्रीरघुनाथजीकी वह बात सुनकर भरतका तो होश ही उड़ गया। वे राज्यकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥

‘राजन्! रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहिये, स्वर्गका भोग भी नहीं चाहिये॥ ६ ॥

‘राजन्! नरेश्वर! आप इन कुश और लवका राज्याभिषेक कीजिये। दक्षिण कोशलमें कुशको और उत्तर कोशलमें लवको राजा बनाइये॥ ७ ॥

‘तेज चलनेवाले दूत शीघ्र ही शत्रुघ्नके पास भी जायँ और उन्हें हमलोगोंकी इस महायात्राका वृत्तान्त सुनायें। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’॥ ८ ॥

भरतकी बात सुनकर तथा पुरवासियोंको नीचे मुख किये दुःखसे संतप्त होते देख महर्षि वसिष्ठने कहा— ॥

‘वत्स श्रीराम! पृथ्वीपर पड़े हुए इन प्रजाजनोंकी ओर देखो। इनका अभिप्राय जानकर इसीके अनुसार कार्य करो। इनकी इच्छाके विपरीत करके इन बेचारोंका दिल न दुखाओ’॥ १० ॥