श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सौ आठवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजीका भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछोंके साथ परमधाम जानेका निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविदको इस भूतलपर ही रहनेका आदेश देना
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर शीघ्रगामी दूत शीघ्र ही मधुरापुरीको चल दिये। उन्होंने मार्गमें कहीं भी पड़ाव नहीं डाला॥ १ ॥
लगातार तीन दिन और तीन रात चलकर वे मधुरा पहुँचे और अयोध्याकी सारी बातें उन्होंने शत्रुघ्नसे यथार्थतः कह सुनायीं॥ २ ॥
श्रीरामकी प्रतिज्ञा, लक्ष्मणका परित्याग, श्रीरामके दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक और पुरवासियोंका श्रीरामके साथ जानेका निश्चय आदि सब बातें बताकर दूतोंने यह भी कहा कि ‘परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने कुशके लिये विन्ध्यपर्वतके किनारे कुशावती नामक रमणीय नगरीका निर्माण कराया है॥ ३-४ ॥
‘इसी तरह लवके लिये श्रावस्ती नामसे प्रसिद्ध सुन्दरपुरी बसायी है। श्रीरघुनाथजी और भरतजी दोनों महारथी वीर अयोध्याको सूनी करके साकेतधामको जानेके लिये उद्योग कर रहे हैं।’ इस प्रकार महात्मा शत्रुघ्नको शीघ्रतापूर्वक सब बातें बताकर दूतोंने कहा—‘राजन्! शीघ्रता कीजिये’ इतना कहकर वे चुप हो गये॥ ५-६ १/२ ॥
अपने कुलका भयंकर संहार उपस्थित हुआ सुनकर रघुनन्दन शत्रुघ्नने समस्त प्रजा तथा काञ्चन नामक पुरोहितको बुलाया और उनसे सब बातें यथावत् कह सुनायीं॥ ७-८ ॥
उन्होंने यह भी बताया कि भाइयोंके साथ मेरे शरीरका भी वियोग होनेवाला है। इसके बाद वीर राजा शत्रुघ्नने अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक किया॥ ९ ॥
सुबाहुने मधुराका राज्य पाया और शत्रुघातीने विदिशाका। मधुराकी सेनाके दो भाग करके राजा शत्रुघ्नने दोनों पुत्रोंको बाँट दिये तथा बाँटनेके योग्य धनका भी विभाजन करके उन दोनोंको दे दिया और उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें स्थापित कर दिया॥ १० ॥
इस प्रकार सुबाहुको मधुरामें तथा शत्रुघातीको विदिशामें स्थापित करके रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न एकमात्र रथके द्वारा अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए॥ ११ ॥